" /> चाइनीज वायरस की तोड़, चॉकलेट वालेबप्पा!, मुंबई महानगर क्षेत्र में विराजेंगे २५,००० से ज्यादा चॉकलेट गणपति

चाइनीज वायरस की तोड़, चॉकलेट वालेबप्पा!, मुंबई महानगर क्षेत्र में विराजेंगे २५,००० से ज्यादा चॉकलेट गणपति

चाइनीज कोरोना वायरस ने सभी पर्व-त्योहारों को प्रभावित किया है। आज से गणेशोत्सव शुरू हो रहा है और बप्पा का आगमन हो रहा है। कोरोना के कारण इस बार पहले जैसी रौनक नहीं है। बप्पा की मूर्ति लाने से लेकर विसर्जन तक भीड़ से बचना मुश्किल है मगर मुंबईकरों ने इस चाइनीज वायरस का तोड़ भी खोज लिया है। ये हैं चॉकलेट वाले बप्पा। मुंबई में ऐसे २५,००० बप्पा घरों में विराजने जा रहे हैं और सबसे खास बात यह है कि इनके विसर्जन के लिए घर से बाहर जाने का झंझट नहीं है। घर के भीतर दूध में ही इनका विसर्जन किया जाता है।

सांताक्रुज में रहनेवाली रिंटू राठौर ने सबसे पहले इन चॉकलेट मूर्तियों का निर्माण शुरू किया था। मगर इस बार चाइनीज वायरस के कारण चूंकि लोग बाहर काफी कम निकल रहे हैं इसलिए लोगों के बीच घरों में चॉकलेट के बप्पा को स्थापित करने का क्रेज बढ़ा है। रिंटू राठौर कहती हैं, ‘जब हमने २०११ में इसे बनाना शुरू किया तो पहले पहल बहुत परेशानी हुई। उस वर्ष हम सिर्फ डेढ़ इंच की ही चॉकलेट की मूर्ति बना पाए। इसके बाद जब इसकी मांग बढ़ने लगी तो इसकी ऊंचाई भी बढ़ने लगी। हमने सबसे बड़ी ५ फिट की भी मूर्ति बनाई। पहले लोग अपने घरों के लिए ही ऑर्डर करते थे लेकिन अब सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडलवाले भी मांग करने लगे हैं। इस वर्ष भी बहुत इनक्वायरी आई लेकिन हमने उन्हें मना कर दिया। क्यों? पूछने पर रिंटू राठौर कहती हैं, ‘चॉकलेट से बनी मूर्तियों के विसर्जन को लेकर बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है क्योंकि इन मूर्तियों का विसर्जन दूध में किया जाता है और यह प्रसाद लोगों के पेट में जाता है। अगर कुछ लापरवाही हुई तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? इसलिए हमने सभी ऑर्डर वैंâसिल कर दिए। इस बार वैश्विक कोरोना महामारी के चलते ४५ देशों के २,४०० लोगों ने हमसे संपर्क किया। सभी ने ऑनलाइन जानकारी लेकर अपने घरों में चॉकलेट से मूर्ति बनाकर उनकी पूजा का मन बनाया है।’ इस वर्ष मालाड, कांदिवली, बोरीवली, सांताक्रुज सहित मुंबई के विभिन्न क्षेत्रों में लोग चॉकलेट से बनी मूर्तियों की स्थापना कर उनकी पूजा करेंगे।

इसी तरह चॉकलेट से मूर्ति बनानेवाली अदिति गर्ग कांदिवली में रहती हैं। उन्होंने बताया कि जब वे एक बार समुद्र किनारे घूम रही थीं तो वहां बप्पा की विसर्जित मूर्तियों के अंगों को छिन्न-भिन्न अवस्था में देखकर काफी दुख हुआ। तब उनके बेटे ने इकोप्रâेंडली मूर्ति बनाने का सुझाव दिया। फिर उन्होंने सांताक्रुज में रहनेवाली रिंटू राठौर से चॉकलेट की गणपति मूर्ति बनाना सीखा और उसी साल से उनकी स्थापना शुरू कर दी। अदिति बताती हैं, ‘पहले साल हमने ६ इंच की ही चॉकलेट की गणेश मूर्ति बनाई थी लेकिन अब हम २ फिट की गणपति मूर्ति बनाकर स्थापना करते हैं। पांच दिन बाद बप्पा की मूर्ति का दूध के टब में विसर्जन कर चॉकलेट वाला दूध लोगों में प्रसाद के रूप में बांट देते हैं।’