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चुनिया, ये ओली-ओली क्या है?

अब तक हमने चीन परस्त नेपाल के कुछ राजाओं और उसके बाद माओवादी कम्युनिस्ट विचारधारा के नेता से प्रधानमंत्री बने पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ पर विस्तार से चर्चा की। इस दौरान थोड़ा बहुत जिक्र के.पी. शर्मा ओली का भी हुआ। दरअसल, राजशाही के बाद गणतांत्रिक नेपाल में किसी ने चीनी हस्तक्षेप बढ़वाने का शिद्दत से काम किया है तो इन्हीं दो कम्युनिस्ट प्रधानमंत्रियों ने। लिहाजा, हिंदुस्थान की मीडिया में इन दिनों नेपाल के ‘ताजा’ कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री ही छाए हुए हैं। आज से पहले नेपाल के किसी प्रधानमंत्री ने हिंदुस्थानी मीडिया में इतनी जगह नहीं बना पाई थी। फिर ये के.पी. शर्मा ओली भला क्या चीज हैं, जो आए दिन अपने विवादित पैâसलों व ऊलजुलूल बयानों से सुर्खियां बटोर रहे हैं? चलिए, ‘थोड़ी’ बात नेपाल के इन्हीं ४१ वें प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की। थोड़ा विस्तार से…

बॉलीवुड में जब फिल्म ‘खलनायक’ पर काम चल रहा था, उसी दरमियान एक फिल्म बनी और रिलीज भी हो गई। नाम था ‘सौदागर’। इस मेगा फिल्म के निर्माता-निर्देशक भी सुभाष घई ही थे। फिल्म दो जिगरी दोस्तों पर आधारित थी, जिसमें ‘जमींदार’ भी था और ‘चुनिया’ नाम का एक चालाक ‘खलनायक’ भी। जो दोनों दोस्तों के बीच खाई गहरी करने के लिए लगातार चालें चलता था और समय-समय पर उन्हें प्रत्यक्ष नुकसान भी पहुंचाता था। आज ‘सौदागर’ फिल्म का टाइटल और चुनिया वाला वो चरित्र चीन पर एकदम सटीक बैठता है। जो येन-केन-प्रकारेण नेपाल के कम्युनिस्टों का ‘सौदागर’ बना हुआ है। जबकि हिंदुस्थान और नेपाल, पटकथा के वो दो जिगरी दोस्त हैं, जिनके परिवारों में बेतहाशा प्रेम भी है और ‘चुनिया छाप’ थोड़ी-सी ‘जानी’ दुश्मनी भी।
असल में हिंदुस्थान और नेपाल की ताजा तनातनी का कारण कोई गंभीर नहीं है पर कोई ‘चुनिया’ अर्से से इसे गंभीर बनाकर दो जिगरी देशों के बीच कड़वाहट पैदा करने के मंसूबों पर काम कर रहा है। १९९० के उसी दौर से जिस दौर में फिल्म ‘सौदागर’ का निर्माण हुआ था। अपने मंसूबों को अंजाम तक ले जाने के लिए उस ‘सौदागर’ चीन ने नेपाल में कुछ प्यादे भी चुन रखे थे। उनसे सियासी ‘सौदे’ भी कर रखे थे। आज उन्हीं सौदों की आड़ में चीन, हिंदुस्थान और नेपाल जैसे मित्र देशों में आपसी संबध बिगाड़ने का काम कर रहा है।
प्रचंड का पतन!
चीन को नेपाल में उसकी सहूलियत वाली कथित विचारधारा के कुछ चेहरे चाहिए थे, जिनका इस्तेमाल करके वो नेपाल को हिंदुस्थान से दूर ले जाने के मंसूबे पाले था। उसकी खोज प्रचंड के रूप में तकरीबन पूरी भी हो चुकी थी। इस दरम्यान प्रचंड के २०१६ वाले दूसरे प्रधानमंत्रित्व काल में चीन को थोड़ी-सी निराशा क्या हाथ लगी, उसने अपना पूरा ध्यान ओली पर केंद्रित कर दिया। शुरुआती दौर में ओली का हिंदुस्थान की ओर झुकाव था। १९९६ में हिंदुस्थान और नेपाल के बीच हुई ऐतिहासिक महाकाली संधि में ओली की बड़ी भूमिका मानी जाती है। उस दौर में ओली के हिंदुस्थान से काफी अच्छे ताल्लुकात थे। तब तक चीन का नेपाल में अपेक्षाकृत सियासी प्रभाव कम था, उस पर ओली पर प्रभाव काफी सीमित। उस दौर तक चीन के चहेते प्रचंड ही हुआ करते थे, लेकिन प्रचंड को तब नेपाल में संवैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं थी। २००६ में हिंदुस्थान के सहयोग से शांति समझौते की बदौलत प्रचंड को नेपाल में वैधानिकता क्या मिली उनके और चीन के इरादों के पर खुल गए। उधर, इस घटनाक्रम से नेपाल में भी कम्युनिस्ट राजनीति की धुरी बदलने लगी थी। थोड़े ही वक्त में प्रचंड नेपाल की राजनीति में प्रचंड हो चुके थे। अब कम्युनिस्ट राजनीति में एक और सशक्त दावेदार था। इससे ओली समेत नेपाल के कई दिग्गज कम्युनिस्ट नेताओं को बैकफुट पर आना पड़ा। कुछ ने संघर्ष किया तो कुछ ने चीन की गोद में बैठकर सफलता का आसान रास्ता अपना लिया। ओली का झुकाव भी चीन की ओर बढ़ने लगा। चीन वैसे भी ओली को बीच-बीच में साधता ही रहता था। उसे ओली अब ज्यादा भरोसेमंद लगने लगे थे। ओली को प्रचंड की तुलना में राजनीतिक और कूटनीतिक अनुभव भी अधिक था। लिहाजा, चीन ने प्रचंड की पहली पारी के पतन के साथ ही ओली पर दांव लगा दिया था।
ओली का अतीत
ओली झापा जिले के कई संसदीय क्षेत्रों से १९९१, १९९४ और १९९९ में संसद सदस्य चुने जा चुके थे। झापा से ही १९६६ में उन्होंने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी। फिर लंबे अर्से तक झापा आंदोलन के चलते जेल काटने के बाद वे संवैधानिक राजनीति में आ गए। दरअसल, राजशाही विरोधी आंदोलन के वक्त के.पी. शर्मा ओली की भूमिका कोई विशेष नहीं थी, फिर भी झापा आंदोलन में उनकी अहम भूमिका के चलते वे नेपाल की संसदीय राजनीति में अचानक से प्रासंगिक हो गए। जब नेपाल में मनमोहन अधिकारी की सरकार बनी तो ओली, अधिकारी वैâबिनेट में गृहमंत्री बन गए। उसके बाद २००६ में नेपाल के संघीय लोकतांत्रिक गठबंधन बनने पर बनी अंतरिम सरकार में वे उप प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री बने। यद्यपि नए चुनाव में ओली की पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा और वह तीसरे नंबर पर पहुंच गई, लेकिन तब भी उन्होंने सीपीएन-यूएमएल के उम्मीदवार के रूप में २०१३ में संविधान सभा के चुनाव में सीट जीती और फिर २०१४ में ओली, झालानाथ खनल को पराजित कर संसदीय दल के नेता और फिर सीपीएन-यूएमएल के चेयरमैन बनने में कामयाब हो ही गए। ओली तब तक चीन के गहरे प्रभाव में आ चुके थे, बल्कि ये कहें कि चीन ने तब तक ओली का चयन नेपाल में पुख्ता तौर पर सुनिश्चित कर लिया था। लिहाजा, ओली ने अपने अगले चुनावी अभियान में चीन के साथ सहयोग बढ़ाने और हिंदुस्थान पर निर्भरता कम करने की बात कहना शुरू कर दिया। २०१५ में सुशील कोइराला को पराजित कर जब वे पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री पद पर आसीन हुए तो उन्होंने चीन के प्रति अपनी वफादारी का खुलकर प्रदर्शन किया। अपने पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री ओली २०१६ में चीन गए और वहां उन्होंने कई व्यापारिक व नीतिगत समझौते किए। नेपाल को हिंदुस्थान से दूर ले जाने की दिशा में यह उनकी पहली संवैधानिक पहल कही जा सकती है। हिंदुस्थान विरोधी अपने रुख और नेपाली राष्ट्रवाद के मुद्दों की बदौलत २०१८ के चुनाव में ओली-प्रचंड की पार्टी ने नेपाल में बड़ी जीत हासिल कर ली और यही से तेज हुआ उनका हिंदुस्थान विरोधी अभियान। वही अभियान जिसकी चीन से डील पक्की करके वे सत्ता में आए थे।
ये तेरी डील, ये मेरी डील
२०१८ के चुनाव से पहले प्रचंड और ओली ने अपने मतभेदों को दरकिनार करके नई पावर शेयरिंग और पार्टी मर्जिंग डील की थी, ताकि दोनों बारी-बारी से सत्ता का नेतृत्व कर सकें। यद्यपि प्रधानमंत्री बनते ही ओली ने उस ‘प्रचंड’ डील को ही दरकिनार कर दिया। न तो ओली ने प्रधानमंत्री पद छोड़ा, न ही पार्टी का अध्यक्ष पद। उसी ‘नेपाल कम्यूनिस्ट पार्टी’ का, जो दोनों ने अपने दलों का विलय करके बनाई थी। प्रचंड के लाख दबावों के बावजूद ओली आज भी अड़े हुए हैं। २०१६ में भी ओली ने प्रचंड के सामने यही अडिग रुख अपनाया था। तब तो प्रचंड द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद भी ओली त्यागपत्र देने को तैयार नहीं थे। संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर लगातार ३ दिनों तक बहस के बाद अंतत: प्रधानमंत्री ओली ने पदत्याग किया था। इस बीच वे चीन की मदद से सत्ता में बने रहने की हर मुमकिन संभावना तलाशते रहे। उन्हें तब भी चीन की कम्युनिस्ट पार्टी पर पूरा भरोसा था और आज भी है। चीन ने भी कभी ओली के भरोसे को टूटने नहीं दिया। मौजूदा दौर में भी चीन ओली की कुर्सी बचाने के लिए हरसंभव प्रयत्न कर रहा है, क्योंकि वो नेपाल में ओली जैसा समर्थक आसानी से खोना नहीं चाहता। जो उसकी विस्तारवादी चालों को आंख मूंदकर स्वीकार करता हो। इसलिए ओली के खिलाफ जब-जब नेपाल में विरोध शुरू होता है, चीन सबसे पहले सक्रिय हो जाता है। मई के पहले हफ्ते में भी ओली की कुर्सी जानेवाली थी, तब भी चीन ने अपनी राजदूत होउ यांग्की को एक्टिव कर ओली के मुख्य विरोधी प्रचंड समेत कई अन्य नेताओं को साधने में सफलता पाई थी। तब जाकर किसी तरह ओली की सरकार बची थी। २००९ में ओली ने नेपाल की ‘प्रचंड’ सरकार गिराने में बड़ा रोल अदा किया था तो २०१६ में प्रचंंड ने ओली की। २०१६ में ही प्रचंड ने नेपाली कांग्रेस के साथ पावर शेयरिंग डील की। पहले खुद प्रधानमंत्री बने, फिर २०१७ में पदत्याग करके कांगेस के शेर बहादुर देऊबा का रास्ता साफ कर दिया पर ओली की तरह वादाखिलाफी नहीं की।
खैर, ओली को बचाने के लिए इस बार तो चीन ने एक ऐसी चाल चल दी कि शक के घेरे में खुद प्रचंड ही आ गए हैं। उन पर ओली के साथ ‘गुप्त’ डील के आरोप तक लग चुके हैं। ऐसा करके ‘सौदागर’ चीन ने एक तीर से कई निशाने साधने का प्रयास किया है। इससे ओली लगातार उसके एहसान तले दबते चले जा रहे हैं, दूसरे प्रचंड को भी यह संकेत दे दिया गया है कि चीन के बिना उनकी दाल नेपाल की सियासत में नहीं गल सकती। अलबत्ता, १९९० में फिल्म `सौदागर’ के लिए आनंद बख्शी द्वारा लिखा गीत ‘ये इलू-इलू क्या है…’ काफी प्रचलित हुआ था। आज भी वो गीत अनायास ही लोगों की जुबान पर आ जाता होगा, ठीक उसी तरह जिस तरह इन दिनों लोगों की जुबान पर ओली की सुर्खियों को लेकर सवाल आता है। ‘ये ओली-ओली क्या है?’ वैसे, इस सवाल का सटीक का जवाब कोई ज्यादा बेहतर ढंग से दे सकता है तो वो ‘खलनायक’ चुनिया ही दे सकता है। वही चुनिया जिसकी हर चालबाजी का भंडाफोड़ फिल्म के अंत में होता है और फिर उसका खात्मा भी।