" /> मनोवैज्ञानिकों की चेतावनी : कोरोना से बड़ा खतरा है डर

मनोवैज्ञानिकों की चेतावनी : कोरोना से बड़ा खतरा है डर

चीन के वुहान से शुरू होकर कोरोना अभी तक १७६ देशों में पहुंच चुका है। जिन देशों में सोशल मिक्सिंग, दुनियाभर से आना-जाना जितना ज्यादा है, वहां उतने ही ज्यादा तादाद में मामले सामने आ रहे हैं। आइसोलेशन के बाद कई लोगों ने भारत सहित अन्य देशों में कोरोना को मात दी है। यानी अगर हमने खुद को अलग कर लिया तो हम संक्रमण की छुट्टी कर देंगे। पर क्या यह इतना आसान है? १०० फीसद न सही ७५ फीसद ही हम आइसोलेट होकर इस संक्रमण से खुद को बचा लेंगे। लेकिन उस उथल-पुथल का क्या करें जो मस्तिष्क में हो रही है? एक डर जो अवचेतन में बैठ गया है। पूरी दुनिया से सूचनाएं आ रही हैं। कन्फर्म और संदिग्ध मामलों के आंकड़ों को दिखाने की होड़ मीडिया चैनल्स वेबसाइट्स में लगी हुई है। कोरोना के संक्रमण से भी ज्यादा खतरनाक यह डर है।
कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या तो सामने भी आ रही है लेकिन कोरोना के डर से संक्रमित मानसिक अस्वस्थ लोगों का कोई आंकड़ा किसी के पास नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बकायदा इस संक्रमण काल में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंता जताते हुए एक गाइडलाइन भी जारी की। टीवी चैनल्स और इफरात की न्यूज देखने से बचने की सलाह देते हुए केवल आधिकारिक सूचनाओं को दिन में एक या दो बार देखने की सलाह डब्ल्यूएचओ ने दी है। मनोवैज्ञानिक सलाह दे रहे हैं कि घबराने की नहीं बल्कि एहतियात बरतने की जरूरत है। मनोवैज्ञानिकों की चिंता यह भी है कि खासतौर पर वे लोग जो पहले से ही एंग्जायटी (गंभीर चिंता) और ऑब्सेसिव कंपल्शन का शिकार हैं, उनके लिए यह समय वाकई किसी
हॉरर फिल्म से कम नहीं।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ न्यूरो साइंसेज के मनोवैज्ञानियों ने इन खतरों को लेकर अध्ययन किया है। इस पर एक रिसर्च पेपर पूरी टीम ने गहन अध्ययन करने के बाद तैयार किया है। इस टीम के सदस्य डॉ. मनोज शर्मा कहते हैं, कोरोना से तो ज्यादातर लोग बच ही जाएंगे। लेकिन सबसे बड़ा खतरा है, इससे उपजे डर की वजह से मानसिक स्वास्थ्य पर पड़नेवाले प्रभाव को अनदेखा करने का। इस डर को सबसे ज्यादा इंटरनेट, टीवी चैनल्स बढ़ा रहे हैं। वे लोग जो आइसोलेशन में हैं, उनके पास सिवाए इंटरनेट के कुछ नहीं। वे लगातार कोरोना वायरस के बारे में सोशल मीडिया में चल रही अफवाहों को पढ़ और सुन रहे हैं। जो लोग पहले से ही एंग्जायटी और ऑब्सेसिव कंपल्शन का शिकार हैं, उनके लिए तो यह मेंटल हेल्थ इमरजेंसी का दौर है। इस टीम ने गहरे शोध के बाद सोशल मीडिया में लगातार पैâल रही अफवाहों की वजह से मेंटल हेल्थ पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर शहूaत् पर््ीत्ूप् ग्ेले स्ग्aूा ेदम्ग्aत् स्ग्a ल्ो ग्ह rल्स्दल्r शीर्षक से एक रिसर्च पेपर भी तैयार किया है। एशियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री में यह रिसर्च पेपर रिव्यू के बाद प्रकाशित होगा। इस पेपर में केवल खतरे के बारे में ही नहीं चेताया गया बल्कि महामारी के दौर में मेंटल हेल्थ को लेकर उपजे खतरों से निपटने के लिए कुछ सलाह भी दी गई हैं। डॉ. मनोज शर्मा कहते हैं, ‘लोगों को सोशल मीडिया की अफवाहों के बारे में जागरूक करना चाहए। खासकर वे लोग जो संदिग्ध हैं या इलाज के लिए आइसोलेशन में रखे गए हैं। उनकी मेंटल हेल्थ की स्क्रिनिंग करनी चाहिए। डायग्नोस करना चाहिए कि उन्हें एंग्जायटी या ओसीडी जैसे डिसॉर्डर तो नहीं। मेंटल हेल्थ से संबंधित कोई भी परेशानी के बारे में पता लगाना चाहिए। अगर ऐसा है तो डिजिटल वेलनेस के बारे में इन लोगों को जानकारी देनी चाहिए। सोशल मीडिया में किस तरह के कंटेंट के संपर्क में यह लोग हैं इसका पता लगाकर इनकी काउंसलिंग करनी चाहिए। कुल मिलाकर कोरोना के दौरा में केवल मनोवैज्ञानिकों और मनोविश्लेषकों की भी एक टीम तैनात रहनी चाहिए।