देवबंद का दरवाजा बंद! किसी पार्टी के लिए नहीं होगा राजनीतिक फतवा जारी

बात-बात पर फतवा जारी करनेवाला दारूल उलूम देवबंद ने इस बार राजनीतिक पार्टियों को मायूस कर दिया है। यह मायूसी इसलिए है कि दारूल उलूम देवबंद ने इस चुनाव में राजनीतिक फतवा जारी करने के अपने सारे दरवाजे बंद कर दिए हैं। देवबंद के इस कदम से देश की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टियों में खलबली मची हुई है। इस लोकसभा चुनाव में राजनीतिक फतवा जारी न करने का निर्णय लेनेवाला दारूल उलूम देवबंद ने पिछले वर्ष हुए पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के समय फतवा जारी किया था।
बता दें कि वर्ष १९५२ में हुए लोकसभा के पहले चुनाव में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद स्थित इस्लामी शिक्षा केंद्र ‘दारूल उलूम देवबंद’ ने पहली बार कांग्रेस के पक्ष में वोट देने का फतवा जारी किया था। इस राजनीतिक फतवे के ६६ वर्ष बाद देवबंद ने पिछले वर्ष पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के समय फतवा जारी किया था। इस फतवे में देवबंद ने उन राज्यों के मुसलमानों को मतदान अवश्य करने के साथ-साथ उन उम्मीदवारों को वोट न डालने का फतवा जारी किया था जो झूठे, मक्कार और जालसाज हों। बताया जाता है कि देवबंद का उक्त फतवा काफी विवादों में आ गया था। इस फतवे के जरिए देवबंद ने एक तरह से कांग्रेस की हिमायत और भाजपा की मुखालफत की थी। विवाद बढ़ने पर आखिरकार देवबंद के धर्मगुरुओं को यू टर्न लेना पड़ा था। गौरतलब हो कि दारूल उलूम देवबंद मुस्लिम समाज के देवबंद गुट का प्रतिनिधित्व करता है। देवबंद मुसलमान यहां से जारी होनेवाले हर फतवे का पालन कड़े रूप से करते हैं। इस लोकसभा चुनाव में भी देवबंद समाज का वोट पाने के लिए धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देनेवाले राजनीतिक दलों के नेताओं ने दारूल उलूम देवबंद में भी हाजिरी लगानी शुरू कर दी थी। लेकिन पिछले वर्ष अपने ही राजनीतिक फतवे से विवादों में आने के बाद दारूल उलूम देवबंद ने इस चुनाव में फतवा जारी न करने की ठान ली है। दारूल उलूम के मौजूदा चांसलर मुफ्ती अब्दुल कासिम नोमानी ने रविवार को स्पष्ट कर दिया कि लोकसभा चुनाव में संस्थान की तरफ से कोई भी राजनीतिक फतवा या अपील जारी नहीं होगी। इतना ही नहीं, उन्होंने राजनीतिक दलों के नेताओं से भी गुजारिश की है कि वे चुनावों के दौरान संस्थान में न आएं।