" /> दिल में अरमान

दिल में अरमान

इस दिल में अरमान बहुत हैं।
जाहिर करने में नुकसान बहुत हैं।
बैठी ही रह गई मैं गुमसुम।
वैसे तो करने को काम बहुत हैं।
हर बार बहल जाता है मीठी बातों से।
ऐ दिल तू अब भी नादान बहुत हैं।
सहने की सीमा से भी पार गया।
हम पर अपनों के इल्जाम बहुत हैं।
जान-बूझकर भी हम चुप ही रहते हैं।
शहर में वैसे भी कोहराम बहुत है।
मुश्किल है तय करना बीच का फासला।
सफर है लंबा और साथ में समान बहुत है।
इंसानियत रोज होती है शर्मिंदा।
वैसे तो दुनिया में इनसान बहुत हैं।
संभल कर निकलना बाहर लड़कियों।
सड़कें अंधेरी और सुनसान बहुत हैं।
मेहनत की रूखी-सूखी खाता है।
नहीं हाथ फैलता स्वाभिमान बहुत है।
रोज ही मिलता है वो जाने कितनों से।
लेकिन आज वो खुद से अंजान बहुत है।
-प्रज्ञा पांडेय (मनु) वापी