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अपने भी हुए हमलावर… योगी की साख को बट्टा

सख्त प्रशासन, कानून का राज और ठोंक दो जैसे नारों के साथ कड़क प्रशासक का छवि बनाने वाले उत्तर प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ पर अब विपक्ष के साथ ही अपने भी उन्हीं के हथियारों से हमला कर रहे हैं। कांग्रेस, सपा सहित समूचे विपक्ष के साथ ही खुद भाजपा के दर्जन भर से ज्यादा राष्ट्रीय पदाधिकारी, नेता, सांसदों व विधायकों ने अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। भाजपा के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) और उसके अनुषांगिक संगठन तक योगी का बचाव नहीं कर रहे हैं। उलटा उन पर सामाजिक समरसता को छिन्न-भिन्न करने के आरोप तक चस्पां कर रहे हैं। हाथरस कांड पर मचे बवाल, आजमगढ़, बुलंदशहर और बलरामपुर में बलात्कार व हत्या जैसी घटनाओं के बाद सवालों के घेरे में आई सरकार के लिए फिलहाल कानून व्यवस्था से भी ऊपर उसकी छवि बिगाड़ने की साजिश करने वालों की पड़ताल हो चुकी है।
इन सबके बीच बड़ा सवाल यह भी है कि जिन घटनाओं को देश देख रहा हो, जिनसे प्रदेश और केंद्र सरकार के साथ-साथ भाजपा की देशव्यापी छवि खराब हो रही हो, उस पर आलाकमान या भाजपा का थिंकटैंक या फिर मोदी-शाह-नड्डा चुप कैसे रह सकते हैं? हालांकि ये सब चुप ही हैं और इस बीच खुद भाजपा के नेताओं के अपनी ही सरकार पर हमले लगातार जारी हैं।
पूरे घटनाक्रम पर निगाह डालें तो २९ सितंबर से ३ अक्टूबर तक योगी आदित्यनाथ की सरकार अपनी फजीहत करा चुकी थी। ‘प्रधानमंत्री के निर्देश पर’ एसआईटी के गठन से लेकर सीबीआई जांच की सिफारिश तक बीजेपी और योगी सरकार की छवि को बड़ा नुकसान हो चुका था। लगता है कि इस नुकसान के लिए बीजेपी का थिंकटैंक तैयार था। इसके दो बेहद साफ वजहें हैं। सबसे बड़ा और मजबूत कारण है खुद योगी आदित्यनाथ, जिनके नेतृत्व में तत्काल चुनाव का मतलब है नुकसान। खुद भाजपा के नेता दबी जुबान में यह सच्चाई खुद बयां करते हैं।
हालांकि अब पहले भी कई बार इस तरह की नौबत आयी मगर, योगी मजबूत बने रहे क्योंकि संघ का आशीर्वाद लगातार उनके साथ रहा। मगर पहले ब्राह्मणों और अब दलितों में फैली नाराजगी के बाद हालात बदल गए हैं। जिस तरह से विश्व हिंदू परिषद ने दबे-छुपे ही सही पर योगी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है, उससे साफ है कि आरएसएस योगी से नाराज है। इस स्थिति को समझते हुए भाजपा के नेताओं की ओर से योगी के हथियार से ही योगी पर हमला बोला गया है।
दरअसल हाथरस मामले में एक के बाद एक लापरवाही सामने आती रही। न घटना के बाद गैंगरेप का केस दर्ज हुआ, न ही पीड़िता का बयान दर्ज कराने में कोई चुस्ती दिखी। लापरवाही होती रही, लेकिन योगी सरकार और प्रशासन चुप रहे। मोदी-शाह के नेतृत्व ने अगर चाहा होता तो लगातार होती रही गलती किसी भी स्तर पर रोक ली जाती। चाहे वह रात के अंधेरे में लाश जलाने की बात हो या फिर मीडिया और कांग्रेस नेताओं को पीड़िता के परिजनों तक पहुंचने के लिए रोकने का कदम हो। कहा यह भी जा रहा है कि हाथरस केस में भाजपा नेतृत्व ने जिस दूसरी वजह से योगी आदित्यनाथ के हाथों अनहोनी होने दी वह है बिहार विधानसभा चुनाव। हाथरस की घटना के विरोध में दलित गोलबंद हुए हैं। लेकिन, इससे बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी की बजाय नीतीश कुमार की जेडीयू को नुकसान अधिक होगा। घटना के बाद गोलबंदी सवर्णों में भी हुयी है।
जिस तरह से यूपी में जातिगत पंचायतों का दौर जारी है। इसका फायदा बिहार में बीजेपी को मिलेगा। बीजेपी के लिए ब्राह्मण विरोधी जैसा फैक्टर यूपी की तरह बिहार में नहीं है। बीजेपी की रणनीति सवर्ण वोट और वैश्य वर्ग के २४.२ प्रतिशत वोट बैंक पर है। साथ ही वह एनडीए में नीतीश कुमार की जेडीयू से बड़ा बनकर भी उभरना चाहती है। चिराग पासवान को शह देने के पीछे भी दलितों को नीतीश के खिलाफ मुखर बनाना है।
योगी सरकार साजिश तलाशने में जुटी
योगी सरकार के कर्त्ताधर्त्ता एक संदेश प्रचारित कर रहे हैं जिसमें कहा जा रहा है कि हाथरस में विपक्ष, कुछ पत्रकारों व नागरिकता कानून विरोधी आंदोलन से जुड़े संगठनों के साथ कुछ सामाजिक संगठन योगी सरकार की छवि बिगाड़ने की साजिश रच रहे थे जिनके खिलाफ कारवाई की जा रही है। इस संबंध में सरकार की ओर से एक वेबसाइट का भी हवाला दिया गया है जिसे षडयंत्रकारी आंदोलन का आयोजक बताया जा रहा है। वेबसाइट जस्टिस फॉर हाथरस रेप विक्टिम बताई जा रही है जिसमें साजिश के नाम पर प्रदेश व देश के अलग-अलग शहरों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों की जानकारी के साथ ही लोगों से विभिन्न संवैधानिक संगठनों से न्याय मांगते हुए पत्र लिखने को कहा गया है।
सरकार की ओर से हाथरस केस में बड़ा खुलासा के नाम प्रसारित किए जा रहे संदेश में कहा जा रहा है कि जातीय दंगे करा कर दुनिया भर में मोदी और योगी को बदनाम करने के लिये रातों रात ‘दंगे की वेबसाइट’ बनाई गई।
कहा यहां तक जा रहा है कि दंगे की इस वेबसाइट के तार बदनाम संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल से जुड़े हैं और इस्लामिक देशों से जमकर फंडिंग हुई है। इसी मैसेज में दावा किया गया है कि जांच एजेंसियों के हाथ अहम और चौंकाने वाले सुराग लगे हैं। कहा गया है कि वेबसाइट में फर्जी आईडी से हजारों लोग जोड़े गए हैं। सरकारी सलाहकारों का दावा है कि वेबसाइट पर बेहद आपत्तिजनक कंटेंट मिले हैं।
सरकार की ओर से हाथरस बवाल के पीछे इस्लामिक देशों की फंडिंग, फीएफआई और एसडीपीआई जैसे संगठनों व सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों का हाथ बताने की कोशिश की गयी है। कहा जा रहा है कि अमेरिका में हुए दंगों की तर्ज पर यूपी की घटना को लेकर देश भर में जातीय दंगे कराने की तैयारी की गयी थी। साथ ही दावा है कि बहुसंख्यक समाज में फूट डालने के लिए मुस्लिम देशों और इस्लामिक कट्टरपंथी संगठनों से पैसा आया था।
हाथरस कांड की मीडिया कवरेज को लेकर बौखलाई योगी सरकार ने इस पर भी अपनी छवि बिगाड़ने की साजिश का हिस्सा होने का आरोप लगाते हुए कारवाई की बात कही है। सरकारी की ओर से कहा जा रहा है कि मदद के बहाने दंगों के लिए फंडिंग की जा रही थी और फंडिंग की बदौलत अफवाहें फैलाने के लिए मीडिया और सोशल मीडिया के दुरुपयोग के भी सुराग उसे मिले हैं। सरकार का कहना है कि मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए फेक न्यूज, फोटोशॉप्ड तस्वीरों, अफवाहों, एडिटेड विजुअल्स का दंगे भड़काने के लिए इस्तेमाल किया गया। सरकार का दावा है कि नफरत फैलाने के लिए दंगों के मास्टरमाइंड ने कुछ मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया के महत्वपूर्ण एकाउंटों का इस्तेमाल किया और इसके लिए मोटी रकम खर्च की गई।
फिलवक्त इतना तो साफ नजर आ रहा है कि हाथरस की घटना में योगी आदित्यनाथ कमजोर साबित हुए हैं। मुख्यमंत्री के तौर पर ही नहीं बल्कि भाजपा में अगले मुख्यमंत्री के दावेदार के तौर पर। अभी कहा नहीं जा सकता है कि किसके नेतृत्व में भाजपा यूपी विधानसभा का चुनाव लड़ेगी। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अपनी पार्टी और सरकार की छवि बदलने के लिए क्या कुछ बदलेगा यही सवाल अब लाख टके का है।