" /> विष का प्याला!

विष का प्याला!

हमारे देश में जहरीली शराब से होनेवाली मौतों की खबर अब आम हो गई है। सत्ताधीश, पुलिस प्रशासन और समाज में भी शराब पीकर होनेवाली मौतों की खबर इतनी आम हो चुकी है कि ऐसी घटनाओं की ओर कोई गंभीरता से देखने को तैयार नहीं है। सस्ते में मिलनेवाली जहरीली शराब पीकर मरनेवाले गरीबों के जान की कीमत ही मानो कुछ नहीं है, ऐसा लग रहा है कि पूरी व्यवस्था ही इस बात को मानकर चल रही है। मध्य प्रदेश में यही हो रहा है। तीन महीने पहले प्राचीन सांस्कृतिक नगरी उज्जैन में जहरीली शराब पीकर १६ मजदूरों की मौत की खबर ताजा ही थी कि फिर एक बार मध्य प्रदेश में जहरीली देसी शराब पीकर ११ लोग काल के गाल में समा गए। जहरीली शराब पीनेवाले कई लोगों की हालत गंभीर है इसलिए कहा जा रहा है कि मृतकों की संख्या बढ़ने की संभावना है। दारूकांड की ताजा घटना मुरैना जिले की है। मुरैना से सटे दो गांवों के कुछ लोगों ने एक साथ नशे का सेवन किया और उसके कुछ घंटों बाद शराब का जहर उनके शरीर में पहुंचा और वे तड़पने लगे। जिस पुलिस थाने के अंतर्गत यह घटना घटी, वहां के पुलिस अधिकारी को निलंबित कर दिया गया है। इसके तुरंत बाद दारू के अड्डों पर छापे और गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया है। ऐसी घटनाओं के पश्चात शराब माफिया के खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया देना, मृतकों के परिजनों को आर्थिक मदद घोषित करना और एकाध सांत्वना मुलाकात करना सत्ताधीशों की औपचारिकता हो चुकी है। इस बार भी इससे अलग कुछ नहीं होगा। मजदूर की ही मौत क्यों न हो, जिस घर के कमाऊ इंसान की मौत होती है, वह परिवार रास्ते पर आ जाता है। इसके अलावा ‘शराब पीकर मर गया’ का भी तंज झेलना पड़ता है। सरकार द्वारा की गई टुटपुंजिया मदद सालभर में ही समाप्त हो जाती है और फिर परिवार छटपटाने लगता है। सस्ती देसी शराब बनानेवाले माफिया और उन्हें संरक्षण देनेवाले प्रशासन की मिलीभगत से फिर एक दारूकांड होता है, जिससे गरीबों का संसार उद्ध्वस्त हो जाता है। यह सिलसिला कई सालों से कभी इस राज्य में तो कभी उस राज्य में चल ही रहा है। अक्टूबर महीने में ही उज्जैन में जहरीली शराब पीने से १६ लोगों की मौत के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए थे। उसके बाद तमाम वरिष्ठ अधिकारी उज्जैन पहुंचे। लगभग १०० शराब माफिया पर मुकदमे दर्ज हुए। ‘अवैध रूप से शराब बनानेवाले माफिया के लोगों पर गाज गिरेगी’, ऐसी सजा देने की गर्जना मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उज्जैन दारूकांड के बाद की थी। हालांकि वह घोषणा केवल डींग ही थी, मुरैना की घटना ने ये साबित कर दिया है। स्पिरिट में पानी मिलाकर शराब बनाना और घातक रसायनयुक्त इस विषैली शराब को २०-२५ रुपए में बेचकर पैसे कमाना, ग्रामीण क्षेत्रों में कई सालों से यह गोरखधंधा चल रहा है। जिस दिन शराब में मिलाए जानेवाले रसायनों में कुछ कम-ज्यादा होता है, उस दिन गरीबों के गले में विष का प्याला ही उतर जाता है तथा कुछ घंटों में मौत का तांडव शुरू हो जाता है। दो साल पहले उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विषैली शराब ने ऐसा ही हाहाकार मचाया था। तब १२५ से ज्यादा लोग मारे गए थे। असम में भी देसी शराब ने ९९ लोगों की जान ले ली। पिछले दिनों पंजाब में अगस्त महीने में जहरीली शराब ने १०० लोगों को लील लिया। विषैली शराब के कारण मरनेवाले अधिकांश लोग निर्धन होते हैं इसलिए उनकी मौत के बाद ज्यादा हो-हल्ला नहीं मचता। अधिक फायदे के लिए शराब माफिया देसी शराब में जानलेवा रसायन मिला देते हैं। शराब की कमाई को पुलिस और आबकारी विभाग का संरक्षण प्राप्त होता है तथा उसी के कारण उज्जैन व मुरैना जैसी शराबकांड की घटनाएं होती हैं। शराब पीने की लगातार हुई दो घटनाओं के कारण मध्य प्रदेश की पहचान अब ‘मद्य प्रदेश’ के रूप में होने लगी है। गरीबों की जान बचानी हो तो मध्य प्रदेश ही नहीं, हर राज्य के गांव-गांव में खुलेआम चल रहे अवैध शराब निर्माण के कुटीर उद्योग को कड़ाई से समाप्त करना होगा, अन्यथा ऐसे विष के प्याले गरीबों की जान लेते रहेंगे!