" /> लद्दाख की ‘हकीकत’

लद्दाख की ‘हकीकत’

फिलहाल लद्दाख सीमा पर क्या हालात हैं और चीन की कार्रवाई कितनी शांत हुई है, इन सवालों का जवाब देश के विदेश मंत्री दे चुके हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक प्रकाशित साक्षात्कार में कहा है कि लद्दाख के हालात बहुत गंभीर हैं। उनके अनुसार १९६२ के बाद अब लद्दाख में हालात गंभीर और नाजुक हैं। विदेश मंत्री की यह बात कई प्रकार से महत्वपूर्ण है। गत कुछ महीनों से चीन ने अपनी सीमा पर कार्रवाई शुरू की है। जून महीने में लद्दाख में चीनियों द्वारा कुछ किलोमीटर की घुसपैठ के बाद से ही उसके आक्रामक इरादे स्पष्ट हो गए थे। उसके तुरंत बाद ही गलवान घाटी में हिंदुस्थानी और चीनी सैनिकों में भिड़ंत हो गई। चीनी सैनिकों ने हमारे सैनिकों पर हमला किया। हमारे बहादुर जवानों ने उन्हें मुंहतोड़ जवाब दिया। इस भिड़ंत में हमारे १८ जवान शहीद हो गए। हालांकि, चीन के ३० से ४० सैनिक मारे गए। तब से लद्दाख सीमा पर बहुत तनाव है। इस परिप्रेक्ष्य में विदेश मंत्री जयशंकर के ताजे खुलासे की ओर देखना होगा। गत दो-तीन महीनों में हिंदुस्थान के परस्पर संबंधों में और चीन के साथ व्यापार-व्यवहार में निश्चित तौर पर कुछ ठोस घटनाक्रम हुए हैं। चीनी सीमा पर लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक हमने भी सेना का जमावड़ा किया ही है। सेना की पूरी तैयारी है। हमारे सेनाप्रमुख ने पूरे सीमा भाग का दौरा किया। प्रधानमंत्री ने भी लद्दाख जाकर जवानों का मनोबल बढ़ाया। हिंदुस्थानी वायुसेना के नए मेहमान ‘राफेल’ ने सीमा पर निगरानी करते हुए चीनी ड्रैगन को चुनौती दी है। दूसरी तरफ ४०-५० चीनी ऐप्स पर बैन की कुल्हाड़ी चलाकर हमने चीन को आर्थिक झटके दिए हैं। जिस गलवान घाटी में भिड़ंत के कारण दोनों देशों में तनाव चरम पर पहुंचा, उस क्षेत्र से चीन कुछ कदम पीछे हटा, ऐसा स्पष्ट हुआ। इससे चीन थोड़ा-सा ही क्यों न हो, लेकिन नरम पड़ा है, देशभर में ऐसा ‘फील गुड’ वाला माहौल बना। लेकिन अब विदेश मंत्री जयशंकर द्वारा ‘लद्दाख’ में १९६२ के बाद सबसे गंभीर परिस्थिति की बात कहने से इस माहौल को झटका लग सकता है। थोड़े में कहें तो लद्दाख सीमा की तस्वीर इससे साफ हो गई है। ऊपरी तौर पर तनाव कम होने का आभास भले होता हो लेकिन वस्तुस्थिति कुछ अलग है। तनाव कायम ही है। ऐसा विदेश मंत्री के स्पष्टीकरण का सार है। मतलब लद्दाख सीमा पर चीन का संकट बना हुआ है। चीनी ड्रैगन की वहां की कार्रवाइयां थमी नहीं हैं और न ही उनके इरादे बदले हैं। चीनी और हिंदुस्थानी सेना के बीच चर्चाओं का दौर भले चल रहा हो लेकिन लद्दाख सीमा पर दोनों देशों की बंदूकें एक-दूसरे पर तनी हुई हैं। हिंदुस्थान का कहना है कि चीन लद्दाख से पीछे हटे, वहीं चीन कह रहा है कि हिंदुस्थान भी ‘फिंगर चार’ से हटकर पहले अपनी सीमा में जाए। हालांकि, यह हिंदुस्थान को अस्वीकार ही है और यह स्वाभाविक भी है। चीन की ऐसी नीति हमेशा रही है कि जो मेरा है वह मेरा है, और जो तेरा है वह भी मेरा है। इस प्रकार की उसकी दबंगई चलती रहती है। लद्दाख में भी इससे अलग कुछ नहीं हुआ है। १९६२ का हिंदुस्थान आज नहीं है। वह उससे कहीं ज्यादा बलवान है। इसे स्वीकार करने के बावजूद घुसपैठ करके भूमि हथियाने की चीनी हरकतें कम नहीं हुई हैं। इसीलिए लद्दाख सीमा उन्हें सुलगती हुई रखनी है। यह सुलगाहट कम होनी चाहिए। ऐसे प्रयास शुरू भले हों, फिर भी गलवान मामले के बाद से ‘जलता’ लद्दाख आज भी सुलग रहा है। यह वस्तुस्थिति है। विदेश मंत्री जयशंकर इस पर उंगली रख चुके हैं। १९६२ के इतिहास की पुनरावृत्ति हिंदुस्थानी सेना नहीं होने देगी। लद्दाख में फिलहाल १९६२ जितनी ही गंभीर परिस्थिति है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। गत दिनों में एक तस्वीर भले प्रस्तुत की गई हो लेकिन लद्दाख की ‘हकीकत’ यही है।