" /> चीन का धोखा, सच बोलेगा कौन?

चीन का धोखा, सच बोलेगा कौन?

चीन की सीमा पर बड़ा धूम-धड़ाका मचा हुआ है। पूर्व लद्दाख की नियंत्रण रेखा पर चीन घुसपैठ कर ही चुका है। चीन पीछे हटने को तैयार नहीं। अब ऐसी खबर है कि पांगोंग सरोवर परिसर में फिर से घुसपैठ करके ‘जैसे थे’ वाली परिस्थिति बदलने की चीनी सेना की कोशिश को हिंदुस्थानी जवानों ने नाकाम कर दिया है। ये हमारे जवानों का शौर्य है। चीन की सेना लद्दाख सीमा पर लगातार आग बरसा रही है। चीन धोखेबाज है। चीन पर विश्वास नहीं रखा जा सकता। सीमा का तनाव मिटाने के लिए दोनों देशों की सेना के अधिकारियों के बीच चर्चा शुरू है। चर्चा का कोई परिणाम नहीं निकला। फिर भी चीन वाले सीमा पर जो तांडव मचा रहे हैं, वही चीन का मूल स्वभाव है, जोकि समाप्त नहीं होगा। २९ अगस्त की रात में लगभग २ बजे २०० चीनी सैनिकों ने टैंको और अन्य शस्त्रों सहित चुशूल सेक्टर में घुसपैठ की। चीन की यह घुसपैठ रात के अंधेरे में की गई। ये एक प्रकार का हमला ही था लेकिन हमारे सैनिकों ने बंदूकों को तानकर चीनियों को रोक दिया। ऐसी जानकारी विदेश मंत्री जयशंकर ने ट्विटर के माध्यम से दी। लेकिन चीनियों का कहना है कि जैसा जयशंकर कह रहे हैं, वैसा कुछ हुआ ही नहीं है। चीनी सैनिकों ने किसी भी प्रकार की घुसपैठ नहीं की और दोनों देशों के बीच इस बारे में चर्चा शुरू है, ऐसा चीन की ओर से कहा गया है। हालांकि, चीन भले ही कुछ भी बके पर हमें जो जयशंकर कहते हैं, उस पर विश्वास रखना चाहिए। सीमा पर तनाव, चीन की घुसपैठ तथा हिंदुस्थानी सेना द्वारा प्रतिकार के बारे में विदेश मंत्री देश को जानकारी दे रहे हैं, यह कितना चिंता का विषय है। इस पर प्रधानमंत्री मोदी को जनता के सामने आकर हकीकत बतानी चाहिए या कम-से-कम रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को बोलना चाहिए। ५ मई को दोनों देशों की सेनाओं के बीच पांगोंग सरोवर क्षेत्र में हिंसक झड़प हुई। दो देशों की सेनाओं में ऐसी झड़प होती है, जिसमें २० जवानों की जान चली जाती है तथा १०० से अधिक लोग जख्मी होते हैं। तब इसे ‘झड़प’ नहीं कहते, बल्कि इसे युद्ध कहना चाहिए। जब पाकिस्तान की ओर से कश्मीर घाटी में ऐसी झड़प और घुसपैठ की जाती है तब उसे छद्म युद्ध कहा जाता है और पाकिस्तान को कैसे प्रत्युत्तर दिया, इसकी तोपों के शब्द गोले छोड़े जाते हैं। चीन के बारे में कुछ अलग न्याय दिख रहा है। ५ मई की हिंसक झड़प में हिंदुस्थान के २० जवान शहीद हो गए और पांगोंग सरोवर परिसर में घुसी चीनी सेना अब तक पीछे नहीं हटी है। यह पेंच नहीं छूटा है और जयशंकर के अनुसार लद्दाख सीमा के हालात १९६१-६२ से भी भयानक बने हुए हैं। यह जयशंकर का व्यक्तिगत विचार हो ही नहीं सकता। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का क्या विचार है? उन्होंने हिंदुस्थानी सेना के लिए क्या रणनीति बनाई है, यह महत्वपूर्ण है। राजनाथ सिंह रूस में होनेवाले शंघाई सहयोग परिषद में भाग लेने के लिए गए हैं। वहां वे चीन के रक्षा मंत्री से नहीं मिलेंगे। वहीं हिंदुस्थान संयुक्त युद्ध अभ्यास में भी शामिल नहीं होगा, ऐसा कहा जा रहा है। राजनीतिक स्तर पर चीन को दिया गया यह जवाब अच्छा ही है लेकिन सैन्य स्तर पर हम क्या कर रहे हैं, यह भी देखना महत्वपूर्ण साबित होगा। हिंदुस्थान की सेना किसी भी प्रकार के विदेशी हमले का माकूल जवाब देने में सक्षम है। केंद्र में किसकी सत्ता है और कौन नेतृत्व कर रहा है, इससे सीमा पर डटे सैनिकों को कोई लेना-देना नहीं होता। नियंत्रण रेखा पर सेना अपने कमांडर के आदेश का ही पालन करती है। १९७१ और उसके पहले १९६५ के युद्ध हमारे सैनिकों ने जीते। कारगिल का युद्ध भी सेना ने ही जीता। १९६२ का चीन के साथ हुआ युद्ध हम हार गए। लेकिन आज का हिंदुस्थान अलग है, चीन को यह समझ लेना चाहिए। दोनों देशों में चर्चा शुरू है। लेकिन कोई रास्ता नहीं निकल रहा। ऐसी चर्चा पाकिस्तान के साथ ६०-६५ सालों से शुरू ही है। हिंदुस्थान की ‘मीडिया’ लद्दाख के तनाव और झड़पों को लेकर एकतरफा और गलत समाचार दे रही है। हमारे सैनिक सीमा पर साहस के साथ खड़े हैं और चीनियों से वे लड़कर जीतेंगे। लेकिन सरकार की ओर से इस बारे में फैलाई जा रही एकतरफा खबर के मोहजाल में मीडिया खो गई होगी तो वह जिम्मेदारी नहीं निभा रही, यह सच है। हिंदुस्थान की सेना के हमले में रोज चीनी सैनिक मारे जा रहे हैं और सीमा पर सबकुछ ठीक-ठाक है, यह सही महसूस नहीं हो रहा। विदेश मंत्री जयशंकर ‘ट्विटर’ पर जो कह रहे हैं, सीमा पर उससे अलग हालात हो सकते हैं लेकिन सवाल ये है कि बोलेगा कौन!