" /> टक्का और धक्का!

टक्का और धक्का!

देश में फिलहाल कोरोना और तापमान का पारा बढ़ रहा है। उसी दौरान पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का ‘ज्वर’ भी बढ़ा हुआ है। इनमें से केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और आसाम इन चार राज्यों में चुनावी माहौल मंगलवार को शांत हो गया। पश्चिम बंगाल में मतदान कुल आठ चरणों में होनेवाला है। इनमें से तीन दौर पूरे हो चुके हैं और पांच बाकी हैं। इसमें अन्य राज्यों का मतदान खत्म होने से पश्चिम बंगाल में पहले से ही चल रहे आरोप-प्रत्यारोप की तलवारबाजी अब और जोर से शुरू होगी। मंगलवार को जो मतदान हुआ उसमें तमिलनाडु का ‘टक्का’ थोड़ा कम हुआ तो आसाम में सर्वाधिक मतलब ८२ फीसदी मतदान हुआ। पश्चिम बंगाल में ३० जगहों के लिए हुए मतदान का प्रतिशत ७७.६८ रहा। पुडुचेरी जैसे छोटे राज्य में ७८.१३ फीसदी तो केरल में ७३.५८ फीसदी मतदान हुआ, जबकि तमिलनाडु में यह आंकड़ा ६५.११ फीसदी ही रहा। अब तमिलनाडु में मतदान क्यों कम हुआ यह हमेशा की तरह संशोधन का विषय सिद्ध हो सकता है। जिन पांच राज्यों में मंगलवार को मतदान हुए उनमें से हर राज्य में इस बार का विधानसभा चुनाव किसी-न-किसी कारण से ‘कांटे की टक्कर’ सिद्ध हुआ है। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए तो यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई बन गया है। भाजपा ने हर तरह के शस्त्र आजमाकर पश्चिम बंगाल को चुनावी रण का मैदान ही बना दिया है। आसाम में भी सत्ता बरकरार रखने के लिए भाजपा ने तमाम चुनावी फंडों को आजमाने में जरा भी कोताही नहीं बरती। ९० मतदाताओं वाले एक मतदान केंद्र पर १७१ मतदाताओं द्वारा मतदान करने का ‘कीर्तिमान’ इसी प्रयत्न से हुआ है क्या, ऐसी संदेह की धूल इस वजह से उड़ रही है। सहज ही है कि मतदान का ऐतिहासिक आंकड़ा भी चर्चा का विषय न बना होता तो हैरानी ही होती। हमेशा की तरह यह बढ़ा हुआ प्रतिशत हमारा ही है, ऐसा दावा अब सत्ताधारी और विरोधी दोनों करेंगे। वास्तव में क्या होगा यह मतगणना के बाद ही पता चलेगा। पड़ोसी पश्चिम बंगाल में अब तक मतदान के तीन चरण पूरे हो चुके हैं। उसमें मतदान का रुझान पहले जैसा ही रहा है। अगले पांच दौर में वह वैâसा ‘रुख’ अपनाता है, कितना बदलता है, ऊंचा उठता है या गिरता है इस पर भी अंतिम परिणाम निर्भर करेगा। दक्षिण की ओर केरल, पुडुचेरी और तमिलनाडु ये परस्पर पड़ोसी होंगे फिर भी हर किसी की राजनैतिक संस्कृति और प्रवृत्ति अलग-अलग है। केरल में कभी वाम मोर्चा, तो कभी कांग्रेस के नेतृत्व वाली आघाड़ी सत्ता में रही है। फिलहाल, वहां की सत्ता वाम मोर्चा के पास है। सहज ही है कि मंगलवार को हुए ७३.५८ फीसदी मतदान वाम मोर्चा अथवा कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को मिलेगा इस पर व्यर्थ बहस होगी ही यह तय है। पुडुचेरी में चुनाव के ऐन मौके पर भाजपावालों ने वहां की कांग्रेस सरकार को अल्पमत में ला दिया। वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया इसलिए वहां ७८ फीसदी मतदान कुछ अलग परिणाम लानेवाला सिद्ध होगा क्या, यह भी सवाल ही है। तमिलनाडु में सत्ताधारी और विरोधी इन दोनों का पल्स रेट मतदान के कम हुए प्रतिशत ने ऊपर-नीचे किया है। उस राज्य में प्रमुख रूप से अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच उलट-पलटकर सत्ता परिवर्तन होता रहा है इसलिए कम हुआ मतदान किसे नीचे खींचता है यह मतगणना से ही स्पष्ट होगा। पश्चिम बंगाल को छोड़कर आसाम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी इन चार राज्यों के विधानसभा चुनाव की धूल शांत हो गई है। इन राज्यों में बढ़े और गिरे हुए मतदान में गिरावट का प्रतिशत टेढ़ी-मेढ़ी बैठी धूल उड़ाने के लिए मतगणना तक जारी रहेगा। आसाम का ऐतिहासिक ८२ फीसदी मतदान हो, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी के ७५ फीसदी से घर का मतदान हो कि तमिलनाडु का गिरा हुआ ६५.११ फीसदी मतदान यह ‘टक्का’ किसे धक्का देगा। किसका नाम धक्के पर लगाएगा इस पर राजनैतिक पार्टियों से राजनैतिक विश्लेषकों तक तभी का ‘अंदाज-पत्र’ पूरे चुनाव तक जारी रहेगा।