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यही गुजरात मॉडल है!

प्रधानमंत्री मोदी के ‘मन की बात’ को लेकर हमेशा उत्सुकता रहती है। जिन मुद्दों का किसी को अनुमान नहीं होता है, ऐसे कई मुद्दों को ढूंढ़कर मोदी ‘मन की बात’ व्यक्त करते हैं। एकदम खिलौने से पालने तक, परंतु उनके मन में क्या चल रहा है इसका पता लगाना मुश्किल है, यह गुजरात के मुख्यमंत्री के चुनाव से स्पष्ट हो गया। भूपेंद्र पटेल गुजरात के नए मुख्यमंत्री बन गए हैं। उनका नाम सामने आया तब ‘ये कौन महाशय हैं?’ ऐसा सवाल ज्यादातर लोगों के मन में उठा। विजय रूपाणी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तब अगले दो दिनों में उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल, गोवर्धन जदाफिया, मनसुख मांडवीय, सी.आर. पाटील ऐसे कई नाम चर्चा में लाकर मीडिया ने योजनाबद्ध ढंग से बहस को जारी रखा। हम मोदी के करीबी हैं व मोदी के मन में क्या चल रहा है ये सिर्फ हमें ही पता चलता है, ऐसा कई पत्रकारों को लग रहा था और वे मोदी ‘इसे ही’ अथवा ‘उसे ही’ मुख्यमंत्री बनाएंगे, ऐसा कह रहे थे। भूपेंद्र पटेल की मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्ति करके मोदी ने इन सभी तथाकथित करीबी लोगों को चकित कर दिया। ‘मैं किसी का नहीं, कोई मेरा नहीं’ यही संदेश मोदी ने दिया है। अब भूपेंद्र पटेल कौन हैं? इसे रहस्य ही मानना होगा। वे पटेल समाज से हैं व गुजरात का पटेल समाज भारतीय जनता पार्टी से नाराज होने के कारण भूपेंद्र भाई को मुख्यमंत्री बनाया। इस तरह से देखें तो नितिन पटेल से प्रफुल्ल पटेल खोड़ा तक कई वरिष्ठ पटेल नेता वहां थे ही। विधायकी का पहला टर्म आनंदी बेन पटेल की कृपा से पानेवाले, अंतिम सीट पर बैठनेवाले भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाने की क्या वजह है? लेकिन झटका देना व ज्यादा चकाचौंध में नहीं रहनेवाले लोगों के हाथ में सत्ता देना यही मोदी की राजनीति का तंत्र है। गुजरात में वही हुआ। मोदी ने कई बार अचानक नए चेहरों को मौका दिया है। महाराष्ट्र में भी उन्होंने देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी देकर ‘झटका’ दिया था। अब गुजरात में भी उसी ‘धक्का तंत्र’ का इस्तेमाल हुआ है। नए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल का राजनीतिक सफर नगरसेवक से मुख्यमंत्री तक का है। पार्टी नेतृत्व द्वारा जताया गया विश्वास सार्थक साबित करने के लिए उन्हें खुद को साबित करना होगा। विदा होते मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के दौर में भाजपा, गुजरात में रसातल में जा रही थी। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के पसीने छुड़ा दिए थे। अभी भी कोविड-कोरोना काल में सरकारी तंत्र साफ धराशायी हो गया है। गांवों-गांवों में मृतकों की चिताएं जलती रहीं, सरकार बेबस व हताश होकर मृत्यु का तांडव देख रही थी। इसका संताप लोगों में था और है ही। गुजरात में बेरोजगारी का भस्मासुर नाच रहा है। कई बड़े उद्योग बंद हो गए हैं। अमदाबाद के पास फोर्ड वाहन बनानेवाली कंपनी ने बोरिया-बिस्तर बांध लिया व ४० हजार लोगों पर बेरोजगारी का संकट आ गया। पूरे गुजरात में किसान, मजदूर, बेरोजगार युवक आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं व चुनावों में इस आक्रोश का फटका लगेगा, ये विश्वास होने के कारण ही मुख्यमंत्री रूपाणी को बदलकर भूपेंद्र पटेल को नियुक्त किया गया। यह सिर्फ रंगाई-पोताई ही है। रूपाणी के पीछे अमित शाह थे इसलिए गुजरात में कल की राजनीति जितनी उलझनों वाली, उतनी ही रोचक होगी। भूपेंद्र पटेल का चुनाव विधायकों की सहमति से हुआ, परंतु भूपेंद्र को भी वह मुख्यमंत्री बननेवाले हैं, यह पता नहीं था। बीते ४ वर्षों में उन्हें साधारण मंत्री भी नहीं बनाया गया। वे सीधे मुख्यमंत्री बन गए। दिल्ली से नाम आया और भाजपा विधिमंडल दल ने मंजूर कर लिया। नेता के चुनाव के लिए विधायकों ने मतदान किया होता तो किसी अन्य नाम पर ही सहमति की मुहर लगी होती। कांग्रेस पार्टी में भी ऐसा ही होता है और इसे ही हमारे यहां लोकतंत्र कहना पड़ता है। लोकतंत्र का, राज-काज व विकास के गुजरात मॉडल का गुब्बारा ऐसे बुलबुले की तरह अचानक फट गया है। गुजरात राज्य यदि विकास, प्रगति के मार्ग पर आगे जा रहा था तो इस तरह से रातों-रात मुख्यमंत्री बदलने की नौबत क्यों आई? इसी तरह से उत्तराखंड, कर्नाटक के मुख्यमंत्री भी कुछ ही दिन पहले बदले गए। मध्य प्रदेश में भी बदलाव किया जाएगा, ऐसे संकेत मिल रहे हैं। सिर्फ मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है वहां भी नेतृत्व परिवर्तन होगा, ऐसा प्रसारित हुआ है। कहां क्या बदलना है, यह उस पार्टी का अंदरूनी मसला है। रोटी घुमानी ही पड़ती है, परंतु जब किसी राज्य को विकास अथवा प्रगति का ‘मॉडल’ साबित करने के लिए उठापटक की जाती है, तब अचानक नेतृत्व बदलने से लोगों के मन में संदेह निर्माण होता है। भूपेंद्र पटेल पर अब गुजरात का भार आ गया है। वर्ष भर में विधानसभा के चुनाव हैं। पटेल को आगे रखकर नरेंद्र मोदी को ही लड़ना होगा। गुजरात मॉडल कहा जा रहा है, वो यही है क्या?