" /> सच बोलने का राष्ट्रीय खतरा…पेगासस जासूसी!

सच बोलने का राष्ट्रीय खतरा…पेगासस जासूसी!

पेगासस जासूसी प्रकरण में केंद्र सरकार लुका-छिपी कर रही है, ये अब निश्चित हो गया है। पेगासस, इस इजराइली स्पायवेयर द्वारा अपने ही देश के नागरिकों पर नजर रखने का मामला सामने आया तब देश में उथल-पुथल मच गई। केंद्र के दो मंत्री, कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री, सांसद, पत्रकार ऐसे सौ-पांच सौ लोगों पर पेगासस के माध्यम से नजर रखी गई। इस पर संसद में चर्चा हो और गृहमंत्री इस पर जवाब दें, इतनी ही मांग विपक्ष की थी। सरकार ने इसे खारिज कर दिया इसलिए संसद का अधिवेशन सुचारु रूप से नहीं हो पाया। संसद में ही विपक्ष का वही सवाल था। पेगासस स्पायवेयर का उपयोग हुआ है की नहीं? वहां भी सरकार चर्चा से भाग निकली और अब सर्वोच्च न्यायालय में भी सरकार चुप बैठी है। सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर पेगासस पर हलफनामा दायर करने से इंकार कर दिया। सरकार ने नजर रखने के लिए ‘स्पायवेयर’ का इस्तेमाल किया है तो ये कानूनी है कि नहीं? सुप्रीम कोर्ट बस इतना ही जानना चाहती है। लेकिन संसद और न्यायालय को महत्व देना नहीं है, ये केंद्र सरकार ने तय कर रखा है। राष्ट्र सुरक्षा का मुद्दा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। इसमें किसी को भी शंका करने का कोई कारण नहीं है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता केवल मोदी सरकार को है और संसद के विपक्ष और हमारे सर्वोच्च न्यायालय को नहीं, इसका मतलब यह नहीं है। केंद्र के दो मंत्री राहुल गांधी सहित विपक्ष के प्रमुख लोग, कुछ पत्रकार, सेना अधिकारी से राष्ट्रीय सुरक्षा को निश्चित कौन-सा खतरा है? जिससे उन पर पेगासस का जंतर-मंतर करके जासूसी करनी पड़ी। राष्ट्रीय हित की चिंता जितनी वर्तमान सरकार को है, इतनी ही चिंता विपक्ष में बैठे लोगों को भी है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर कई नेता विपक्ष में होते हुए भी राष्ट्रीय हित के लिए शहीद हुए हैं। विपक्ष के प्रमुख लोग, पत्रकार, संपादक ये सरकार को उनकी की गई गलती, महंगाई, सार्वजनिक संपत्तियों की बिक्री, भ्रष्टाचार के संदर्भ में सवाल पूछ रहे हैं तो इसलिए वे राष्ट्रीय हित के विरोध में हैं और ऐसे लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा कहना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए दमन है। अपने राजनीतिक विरोधियों पर नजर रखना यह लोकतांत्रिक स्वतंत्रता में विश्वास रखनेवाले सभ्य समाज की निशानी नहीं है। अफगानिस्तान में, विपक्ष को सड़कों पर गोली मार दी जाती है। हमारे यहां पेगासस जैसे माध्यम के जरिए परास्त किया जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल अजीज कुरैशी द्वारा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर करारी टिप्पणी करने पर उन पर राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया है। योगी की सरकार मतलब खून चूसनेवाली शैतान की सरकार है, ऐसा प्रतिपादन उन्होंने किया। उनके इस प्रतिपादन से समाज में धार्मिक पेंच निर्माण हो सकता है, ऐसा कारण देकर सीधे देशद्रोह का ही गुनाह दर्ज किया। पूर्व राज्यपाल के शब्द कठोर हैं। उसे लेकर उन पर कार्रवाई हो सकती है। लेकिन जहां भाजपा की सरकार नहीं वहां मुख्यमंत्रियों, सरकार को इससे भी ज्यादा अभद्र भाषा से बदनाम किया जा रहा है। महाराष्ट्र की सरकार को तो ‘तालिबानी’ आदि तक कहा गया है। ये कहना सिर्फ इसलिए कि केंद्र सरकार के विरोध में जो हैं उन सभी को राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्र हित का हत्यारा ठहराकर उन पर नजर रखी जा रही है तो वैâसे चलेगा? आम जनता की निगरानी के लिए पेगासस स्पायवेयर का उपयोग संविधान के अनुच्छेद-२१ के तहत निजता के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। ये सभी मामले जो हुए हैं, उस पर सरकार मुंह खोलने के लिए तैयार नहीं है। लोगों का मोबाइल फोन अवैध रूप से ‘हैकिंग’ किया। उनकी बातें सुनी गर्इं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर सरकार के पास से एक हलफनामे की मांग की और सरकार कहती है किस तरह का हलफनामा? राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर नागरिक स्वतंत्रता का हनन किया गया है। केंद्र कहता है, पेगासस मुद्दे पर हलफनामा दिया गया तो आतंकी संगठनों को फायदा होगा। सवाल इतना ही है कि, पेगासस का इस्तेमाल हुआ है कि नहीं? पत्रकार, राजनीतिक ये आतंकी हैं क्या? ऐसे सवालों को केंद्र सरकार ने अलग ही मोड़ दिया है। सच बोलने की जिम्मेदारी केवल आम लोगों पर है। माई-बाप सरकार पर नहीं। सच बोलो, ऐसा सर्वोच्च न्यायालय के कहते ही, सच बोलेंगे तो देश खतरे में आएगा, ऐसा कहा जाता है। फिर देश जैसे-तैसे ही खतरे में है। पेगासस के चलते इस पर मुहर लग गई, बस इतना ही!