" /> मर्दों के लोकमान्य

मर्दों के लोकमान्य

तिलक को गुजरे सौ साल हो चुके हैं, लेकिन राम, कृष्ण, शिवाजी राजे की तरह तिलक हमारे साथ ही हैं। तिलक का जन्म कोकण में हुआ, उन्होंने पुणे से राजनीति की और उन्होंने शरीर छोड़ा मुंबई के सरदारगृह में, लेकिन यह शेर इंग्लैंड से कराची तक स्वराज्य और स्वाभिमान के लिए गरजते हुए घूमता रहा। ‘जब पूरा विश्व सो रहा होता है, तब केवल संयमित महापुरुष ही जागते है’, गीता के इन वचनों को तिलक ने आत्मसात किया था। तिलक राजमान्य नहीं थे इसलिए वे लोकमान्य हुए। १ अगस्त, १९२० को तिलक ने शरीर छोड़ा। तिलक की बीमारी ने समाज के दिल की धड़कन को धीमा कर दिया था और उनके निधन की खबर ने कुछ समय के लिए देश को निस्तेज कर दिया था। उसके २७ वर्षों बाद देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन उस जीत की नींव तिलक ने रखी थी। ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे प्राप्त करके ही रहूंगा,’ वे अंग्रेजों के सामने निडरता से ऐसा कहनेवाले और परिणामों की परवाह न करनेवाले योद्धा थे। तिलक की वाणी और लेखन में भी आग थी। उस आग से पूरे देश में क्रांति की चिंगारी उड़ी। वे ‘केसरी’ में अपने विचार व्यक्त करते हुए कभी पीछे नहीं हटे। तिलक ने सशक्त रूप से कहा है (१९०२), ‘हम ‘केसरी’ में जो लेख लिखते हैं, वह न केवल शासकों के लिए है, बल्कि इसके लिए भी है कि हमारे विचार सभी मराठी पाठकों तक पहुंचें और यदि हमारे लेखों का ऐसा प्रभाव नहीं है, तो हम समझेंगे कि हमारा ये श्रम व्यर्थ गया। केवल कलम और स्याही से सफेद को काला रंगना हमारा उद्देश्य नहीं है।’’ तिलक ने तब जो कहा था वह आज भी महत्वपूर्ण है। तिलक ने कभी जी-हुजूरी नहीं की। तिलक का मत था कि नेताओं की जी-हुजूरी करना देश के हितों के लिए हानिकारक है। १९०५ के आंदोलन के दौरान कई लोग जेल गए और कई क्रांतिकारी फांसी पर चढ़ गए। लोकमान्य को दंडित किया गया। उन्हें सात साल के लिए मंडाला ले जाया गया था। उसी दौरान कांग्रेस में उद्देश्य और कार्यक्रमों को लेकर फूट पड़ गई। यह फूट ऐसी नहीं थी जैसे आज ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट आदि में फूट पड़ती है। ‘स्वराज्य’ एकमात्र उद्देश्य है और इसी बात पर लड़ाई थी कि इस शब्द का उपयोग करना है या नहीं। यानी कांग्रेस के आंदोलन की दिशाहीन वृत्ति को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे लोगों का एक समूह और जनता को आंदोलन में शामिल कर ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ खड़े होने के लिए मजबूत व उग्र आंदोलन वाला दूसरा समूह था। १९०७ के दौरान सूरत में कांग्रेस के भीतर नरम दल और गरम दल बन गए। जनता के आंदोलन में गतिरोध आ गया। अंग्रेजों ने एक समूह को उठाकर जेल में डाल दिया। गरम दल तिलक से प्रभावित था। वे विधायक तरीके से तिलक की नीति को चलाना चाहते थे। एक समूह कहता, ‘उठने-बैठने का कोई मतलब नहीं है। यदि जनता को जागृत, संगठित और धीरे-धीरे आगे बढ़ाया जाए तो यह आंदोलन फल-फूल सकता है।’ जबकि दूसरा समूह क्रांतिकारी विचारों का था। उसका मानना था ‘हाथों में शस्त्र उठाकर अंग्रेजों को मार दिया जाना चाहिए, आतंक पैदा करना ही चाहिए।” तिलक ने कई बार इन क्रांतिकारियों की मदद की। जिन चापेकर भाइयों ने रैंड को मार डाला वे तिलक के ही अनुयायी थे। स्वराज्य, बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा; ये तिलक के चार सूत्र थे। यही उनका कार्यक्रम था, लेकिन अगर कोई स्वराज्य पर कुछ पूछता तो वे कहते, ‘विधायक तरीके से काम होगा। होम रूल चलेगा।’ लेकिन वह ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे। १९१४ में तिलक को जेल से रिहा कर दिया गया। रिहाई पर ब्रिटिश सरकार ने उनसे पूछा, ‘क्या विद्रोह करोगे?’ तिलक ने कहा, ‘नहीं, अभी ऐसा कुछ भी तय नहीं है।’ लेकिन तिलक ने बाहर आकर आंदोलन शुरू कर दिया। सबको साथ लेकर आए। कांग्रेस की एकता के लिए प्रयास किया। दूर हुए लोग फिर से मिल गए। तिलक ने फिर अंग्रेजों को चुनौती दी, ‘गृह शासन के अधिकार की घोषणा करो। अभी भले मत मानो। लेकिन आश्वासन ही दे दो।” अंग्रेजों ने कहा, ‘यह संभव नहीं है।” अंग्रेजों ने इस आंदोलन को तोड़ने के लिए दमनचक्र शुरू किया। उस समय गांधी सिर्फ राजनीतिक क्षितिज पर उभरे ही थे। वह महात्मा या महापुरुष नहीं हुए थे। गांधी ने कहा, ‘अंग्रेजों की मदद की जानी चाहिए। द्वितीय विश्व युद्ध के कारण वे मुसीबत में हैं। मुसीबत में पड़े लोगों की मदद की जानी चाहिए।’ तिलक इससे सहमत नहीं थे। उन्होंने फैसला किया कि यह अंग्रेजों की गरदन मरोड़ने का सही समय है। उसी समय भर्तियों में दंगे भड़क उठे। कई प्रांतों में युद्ध फंड की जबरन वसूली शुरू हो गई। गांधी ने तिलक पर आरोप लगाया, ‘आप भर्ती के खिलाफ हैं।” तिलक ने शांति से कहा, ‘नहीं, खिलाफ नहीं। हमारा बस इतना ही कहना है कि जीतने के बाद उन्हें हमें स्वराज्य दे देना चाहिए।’’ तिलक का एकमात्र लक्ष्य स्वराज्य था। देश को स्वतंत्र बनाने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गरम दल के तिलक ने सभी साधनों के उपयोग का विरोध नहीं किया। लोकमान्य तिलक ने सेनापति बापट से कहा था कि केवल ४० प्रतिशत लोग भी अगर सशस्त्र विद्रोह के लिए तैयार हो जाएं तो हम उनका नेतृत्व करेंगे। वे सशस्त्र क्रांति करनेवालों का पूरा साथ देते। इसलिए गरम दिमागी युवा वर्ग उनकी ओर आकर्षित हुआ। आज कई लोग और पंथ छत्रपति शिवाजी महाराज पर अधिकार जमा रहे हैं, लेकिन तिलक ने छत्रपति की मर्दानगी को क्रांतिकारियों में जगाने का काम किया। जब उन्होंने शिव जयंती शुरू की तब वह शिवाजी उत्सव था। तिलक ने शिवाजी उत्सव के दौरान एक बार चापेकर बंधुओं के दामोदर चापेकर को नसीहत दी थी। उस समय चापेकर ने ‘शिवाजीचे उद्गार’ नामक एक कविता पाठ की। कविता में छत्रपति शिवाजी कहते हैं, ‘हमारे मराठी लोगों को विदेशी राज में नामर्दों की तरह व्यवहार करते देखना दुखद है।” व्याख्यान के बाद तिलक ने चापेकर को एक तरफ ले जाकर कहा, ”दूसरों को नामर्द कहनेवाले तुम कैसे मर्द हो? तुम्हारे जैसे युवा मर्दों के होने के बावजूद रैंड जिंदा कैसे बचा रह गया?” सहज ही बोल दिए गए ये वाक्य प्रेरणादायक साबित हुए। चापेकर की रैंड को मारने की इच्छा तिलक के समर्थन से पुष्ट हो गई थी। २२ जून, १८९७ को रैंड का वध हो गया। प्लेग के दौरान पुणे के लोगों को रैंड के आदमियों द्वारा परेशान किया गया था। तिलक धैर्य के प्रतीक थे। लाला लाजपत राय पंजाब में किसानों के एक महान नेता थे। वह एक महान देशभक्त थे। ९ मई, १९०७ को लाजपत राय को ब्रिटिश सरकार ने निर्वासित कर दिया। इस समाचार को सुनकर, तिलक चौंक गए और बोले, ‘लालाजी जैसा देशभक्त निर्वासित और लॉर्ड मिंटो जिंदा कैसे रह सकता है?’ तिलक की निडरता और बहादुरी कुछ ऐसी थी। लोकमान्य तिलक ने स्वतंत्रता आंदोलन में मर्दानगी जगाई और शौर्य लाए। वह शौर्य आज भी किसी-न-किसी बहाने दिखता है। उस बहादुरी की जड़ तिलक द्वारा की गई बुवाई में है। तिलक के निधन को १०० साल हो चुके हैं, लेकिन बहादुरी, मर्दानगी, स्वाभिमान और देशभक्ति के चार सिद्धांतों के साथ तिलक आज भी जीवित हैं। मर्दों को प्रतिमाओं और स्मारकों की आवश्यकता नहीं है। तिलक ऐसे ही थे। तिलक निश्चित रूप से कई लोगों के नेता थे। मर्दों के लोकमान्य ज्यादा थे। उन्होंने कभी हथियार नहीं उठाया लेकिन वे क्रांतिकारियों के ‘केसरी’ थे। देश कभी भी तिलक को नहीं भूलेगा।