" /> वन फाइन मॉर्निंग… दादा, चौंको मत!

वन फाइन मॉर्निंग… दादा, चौंको मत!

राज्य की राजनीति में ‘वन फाइन मॉर्निंग’ अचानक कुछ होगा, ऐसा भविष्य चंद्रकांत पाटील द्वारा बताए जाने के बाद से कई लोगों के घोड़े सपनों में ही दौड़ने लगे हैं। फाइन मॉर्निंग अर्थात अल-सुबह कुछ तो होगा, ऐसा चंद्रकांत दादा को क्यों लग रहा है, इसकी जांच कर लेनी चाहिए। दादा की तबीयत ठीक है न? उन्हें नींद बराबर आ रही है न? या राजभवन से अचानक किसी फाइन मॉर्निंग को बुलावा आएगा इसलिए वे सो ही नहीं रहे। इस तरह के कई सवाल लोगों के जहन में उठ रहे हैं। चंद्रकांत दादा को ऐसा लग रहा है कि फाइन मॉर्निंग को कुछ तो होगा। यह अच्छे स्वास्थ्य की ‘साइन’ नहीं है। देवेंद्र फडणवीस और संजय राऊत की अचानक भेंट के पश्चात जो माहौल बना, उससे किसी फाइन मॉर्निंग को राजभवन जाकर कुछ किया जा सकता है, ऐसा किसी को लग रहा होगा तो यह उनका भ्रम है। एक तो ऐसी फाइन मॉर्निंग का अचानक प्रयोग भाजपा कर ही चुकी है। लेकिन उस फाइन मॉर्निंग का क्या हुआ, यह अगले ७२ घंटों में पता चल ही गया। यह बात सिर्फ श्री देवेंद्र बाबू ही अच्छे से जानते हैं। भारतीय जनता पार्टी को महाराष्ट्र सरकार गिराने की जल्दबाजी नहीं है और यह सरकार अंतर्विरोध के कारण खुद ही गिरेगी, ऐसा श्री देवेंद्र फडणवीस कह रहे हैं और उसी समय चंद्रकांत पाटील किसी फाइन मॉर्निंग को ‘कुछ होगा’, ऐसा मंत्र मारा हुआ संदेश दे रहे हैं। लोग अब क्या समझें? फडणवीस-राऊत की मुलाकात राजनीतिक नहीं थी। वह एक सहज मुलाकात थी। इस बारे में दोनों बता चुके हैं। दरअसल, वह गुप्त मुलाकात नहीं थी। शिवसेना में कोई ‘गुप्तेश्वर’ नहीं होने के कारण कुछ छुपाने जैसी बात नहीं है। यह शिवसेना का स्वभाव नहीं है। महाराष्ट्र में शिवसेना का मुख्यमंत्री है और वर्तमान सरकार पूरे पांच साल चलेगी, इस बारे में किसी को मन में शंका लाने की आवश्यकता नहीं है। ऐसी शंका श्री देवेंद्र फडणवीस के मन में भी नहीं है लेकिन चंद्रकांत दादा सुबह-सुबह जाग जा रहे हैं। उनकी नींद उड़ जा रही है या वह घबराकर उठ जाते हैं। इस पर आगे की कई बातें निर्भर करती हैं। आज विधानसभा में मध्यावधि चुनाव किसी को नहीं चाहिए। ऐसा आध्यात्मिक विचार भी दादा ने सुबह के समय सूर्योदय के दौरान बताया है। मतलब इन लोगों के दिमाग में कुछ तो चल रहा है। मध्यावधि चुनाव का अनुमान लगाकर उन्हें सुबह अलार्म लगाना होगा तो ‘घड़ी’ के कांटे गतिमान हैं और इस बार समय न चूकने पाए, इसका खयाल रखो। हाथ साथ में है। हाथ पर घड़ी है और घड़ी से सुबह का अलार्म निकाल दिया गया है। अजीत दादा को अब अलार्म की जरूरत नहीं, बल्कि दीवार पर दोलन घड़ी लगा दी गई है और वह घड़ी लगातार बजती रहती है। इसलिए सारे लोग ‘जागते रहो’ की भूमिका में हैं। घड़ी के दोलन की आवाज के कारण भाजपा के दादा की सुबह खराब हो रही होगी तो यह उनका मामला है। महाराष्ट्र सहित देश में किसानों में अशांति है। कृषि कानून के विरोध में किसानों ने देश भर में उग्र आंदोलन शुरू किया है। दिल्ली में किसानों ने प्रतीकात्मक ट्रैक्टर जलाकर निषेध व्यक्त किया है। कोरोना का संकट है ही। गत ११ दिनों में देश में कोरोना के १० लाख नए मरीजों का मिलना अच्छी बात नहीं है। सरकार और विरोधी दलों में इस मुद्दे पर चर्चा होनी चाहिए और सुबह-सुबह ऐसी चर्चा हुई तो भी कोई हर्जा नहीं है। राज्य में जब समस्याओं का पहाड़ खड़ा हो, उस दौरान राजनीति में अकारण गंदी हवा छोड़कर प्रदूषण निर्माण करना परिपक्वता के लक्षण नहीं है। पांच साल फडणवीस-पाटील ने भी राज किया है। इसलिए संकट के समय क्या करना है और क्या नहीं, उन्हें इसका ध्यान रखना चाहिए। भाजपा प्रमुख विरोधी दल है और आज महाराष्ट्र के भाजपा के सर्वेसर्वा के रूप में श्री फडणवीस की ओर देखा जाता है। फडणवीस की सुबह-सुबह नींद नहीं खुलती लेकिन चंद्रकांत दादा चौंककर उठ जाते हैं, जोकि गंभीर मामला है। शांति से नींद आना ‘फाइन’ स्वास्थ्य की निशानी है। कभी पूरे न हो सकनेवाले सपनों के पीछे भागना हमेशा अशांत रहनेवाले मन का लक्षण है। दादा, चौंको मत! महाराष्ट्र की राजनीति में ‘सुबह’ का संयोग एक ही बार आया और वह संयोग अच्छा नहीं था। इसलिए नए घटनाक्रम के लिए सुबह की कुंडली और मुहूर्त कोई न निकाले। राज्यपाल की सुबह क्यों बिगाड़ते हो? खेल तुम्हारा होता है और राजभवन नाहक बदनाम होता है। अब राजभवन का बदनाम होने का कोटा भी खत्म हो गया है। इसलिए महाराष्ट्र की सरकार अगले साढ़े चार साल आराम से चलेगी। सरकार दिन-रात काम कर रही है और सुबह थोड़ी मीठी नींद लेती है। संकट टल जाता है तो मीठी नींद में विघ्न नहीं पड़ता। अगले साढ़े चार साल सुबह का एक भी राजनीतिक मुहूर्त पंचांग में नहीं दिख रहा। ऐसा हम सीना ठोंक कर कह रहे हैं।