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संपादकीय : आग से आंधी में!

महंगाई की आग में झुलस रही जनता को राहत प्रदान करने के लिए केंद्र सरकार कुछ ठोस योजना की घोषणा करेगी, ऐसा लगने के दौरान ही इस आग में और तेल डालने का कदम देश के केंद्रीय बैंक ने उठाया है। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने बुधवार को ‘मॉनिटरी पॉलिसी कमिटी’ की आपातकालीन बैठक बुलाई और उसके पीछे-पीछे तुरंत पत्रकार परिषद का आयोजन करके रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में ०.४० फीसदी की वृद्धि करने की घोषणा कर दी। इसलिए रिजर्व बैंक का रेपो रेट ४ फीसदी से अब ४.४० फीसदी पर पहुंच गया है। रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट बढ़ाए जाने से देशभर के तमाम बैंकों की ब्याज दर बढ़ जाएगी और सभी तरह के कर्ज महंगे हो जाएंगे, ऐसा हुआ ही। इस निर्णय के कारण गृह कर्ज, वाहन कर्ज सहित सभी प्रकार के कर्ज की ‘ईएमआई’ अर्थात बैंकों के मासिक कर्ज की किश्त की रकम भी बढ़ जाएगी। अनाज, खाद्य तेल, साग-सब्जी, पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस इत्यादि जीवनावश्यक वस्तुओं सहित सभी क्षेत्रों में महंगाई की दर के आसमान छूने से देश की आम जनता पहले ही त्रस्त हो गई है। गृहिणियों एवं परिवार चलानेवाले कुटुंब प्रमुखों का मासिक बजट महंगाई के कारण पूरी तरह से डांवांडोल हो गया है। ऐसे में महंगाई के इस दावानल में अब बैंकों द्वारा बढ़ी हुई ईएमआई भी जुड़ गई है। रिजर्व बैंक के ताजा निर्णय के कारण बाजार में मांग घटेगी और रेपो रेट कम किए जाने से महंगाई की दर का ग्राफ फीका पड़ने लगेगा, ऐसा चमत्कारिक युक्तिवाद कुछ अर्थशास्त्री अब कर रहे हैं। इस दावे में कितना दम है, ये तो आनेवाले दो-तीन महीनों में दिखेगा ही। मूलत: रिजर्व बैंक का प्रतिशत, रेपो रेट और सीआरआर आदि अर्थशास्त्र की शब्दावली आम जनता के आकलन से परे की बात होती है। रेपो रेट एवं सीआरआर की रेट बदलने से बाजार में किस दर से पैसे उपलब्ध होंगे और रिजर्व बैंक के गंगाजल में कितनी रकम जमा होगी इससे आम जनता का क्या काम है। अपने दैनिक जीवन में इसकी वजह से क्या फर्क पड़ता है, अपने परिवार पर इस निर्णय से कितना बोझ बढ़ता है, सिर्फ इतना ही विचार आम जनता करती है। इस नजरिए से विचार करने पर रेपो रेट में वृद्धि के कारण सभी तरह के कर्ज महंगे होनेवाले हैं, ब्याज की किश्त कर्जदारों के लिए बढ़कर आएगी और महंगाई से पहले ही जेब खाली हो चुके लोगों एवं मध्यमवर्गीय जनता को बढ़ी हुई किश्त की नई मार सहनी पड़ेगी। रिजर्व बैंक के मातहत वर्तमान में कुल मिलाकर २६ राष्ट्रीय कृत बैंक कार्यरत हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश के कोने-कोने में इन बैंकों की लगभग दस लाख शाखाएं बैंकिंग का काम कर रही हैं। इन बैंकों की अवस्था क्या है, यह अब छिपा हुआ नहीं है। किसान एवं आम इंसान को दुत्कारने वाले बैंक बड़े आसामियों के लिए लाल गलीचे बिछाते हैं और कई बार वही लोग बैंकों से जालसाजी करते हैं। बैंकों से करोड़ों रुपए का कर्ज लेना, उस कर्ज को डुबा देना, खुद को दिवालिया घोषित करना और एक दिन अचानक धीरे से विदेश भाग जाना यह इन डुबानेवालों का धंधा है तथा इसका बोझ अंतत: ईमानदार, कर्जदारों पर पड़ता है। इन देनदारों के पास से लाखों-करोड़ों रुपए की रकम वसूल की जाए तो देश के सभी बैंकों की खाली हो चुकी तिजोरी भरकर लबालब हो जाएगी तथा घर खरीदने के लिए, वाहन खरीदने के लिए अथवा अन्य छोटे-मोटे कारोबार शुरू करने के लिए दिया जानेवाला कर्ज और भी एक-दो फीसदी कम ब्याज दर पर आसानी से उपलब्ध हो सकेगा। लेकिन विदेश में भागने में सफल हुए बड़े बकाएदारों की गर्दन दबोचकर उनके द्वारा हड़प की गई राष्ट्रीय संपत्ति वसूल करने की बजाय देश की आम जनता के कर्ज की किश्त में होनेवाली वृद्धि मतलब आग में सोमेश्वरी और बम में रामेश्वरी ऐसा प्रकार है। रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर में वृद्धि किए जाने के कारण गृह कर्ज, वाहन कर्ज की किश्त तो बढ़ेगी ही, परंतु इसी के साथ-साथ गृह निर्माण क्षेत्र तथा शेयर बाजार को भी इसका जबरदस्त झटका लगा है। देश के मध्यमवर्गीय व आम जनता महंगाई के विस्फोट के कारण जर्जर हो गई है। इसी बीच कर्जे की किश्त बढ़ानेवाला यह निर्णय आम जनता को आग से आंधी में धकेलनेवाला है। महंगाई का राक्षस दिन-प्रतिदिन अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है और उसे मदमस्त बनानेवालों को जनता ने ही सत्ता में लाया है। ऐसे समय न्याय कहां मांगें यह सवाल भी है ही!

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