" /> सहकारी बैंकों के नतीजे!…हवा और दिशा!

सहकारी बैंकों के नतीजे!…हवा और दिशा!

राज्य के ६ जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंकों के चुनाव के नतीजे चौंकानेवाले आए हैं। यह सच है कि सहकारिता क्षेत्र पर अब तक कांग्रेस अथवा राष्ट्रवादी का नियंत्रण रहा है। ग्रामीण अंचलों की अर्थव्यवस्था जिला बैंक, सहकारी कारखाना, कपड़ा मिलें, दुग्ध उत्पादक संघों पर निर्भर है। विशेषकर जिला सहकारी बैंकें ग्रामीण क्षेत्रों के किसानों की आर्थिक समस्याओं का समाधान करते हैं। लिहाजा इन बैंकों की बागडोर हमारे हाथ में हो और जनता को उपकृत करने का अधिकार हमारे पास रहे, इसके लिए आपस में बड़ी खींचतान रहती है। ६ जिला बैंकों के चुनाव में घमासान दिखाई दिया। हार-जीत के बाद दोनों पक्षों में कहासुनी के साथ एक-दूसरे के घरों पर पथराव जैसी घटनाएं हुर्इं। ऐसे मामले लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव में भी नहीं होते। सातारा, जलगांव, सांगली, धुले, नंदुरबार, लातूर, रत्नागिरी जिले के सहकारी बैंकों के चुनावी नतीजे आ गए हैं। शशिकांत शिंदे, शंभुराज देसाई, मंत्री के.सी. पाडवी को झटका लगा है। सहकारिता क्षेत्र में सत्ता के कारण भाजपा को जो गुमान आया था वह उतर चुका है। ये कल के चुनावी परिणामों ने दिखा दिया है। लेकिन सातारा जिला बैंक में राष्ट्रवादी के हैवीवेट शशिकांत शिंदे केवल एक वोट से पराजित हो गए। उन्हीं की पार्टी के एक सामान्य कार्यकर्ता रांजणे ने शिंदे को पराजित किया है। इसलिए शिंदे ने राष्ट्रवादी के कार्यालय पर हमला किया, पथराव किया। शिंदे की पराजय में राष्ट्रवादी के लोग सक्रिय थे। शिंदे की पराजय क्यों हुई, किसने की। वह उनका आपसी मामला है। हालांकि इसे लेकर जो छोटा-सा दंगा हुआ, वह तस्वीर ठीक नहीं है। सातारा बैंक में राजराजे निंबालकर, उदयनराजे भोसले, शिवेंद्रराजे भोसले, शेखर गोरे आदि प्रमुख लोग चुने गए। लेकिन शशिकांत शिंदे को नियोजित तरीके से हराया गया। अगर शिंदे जीतते तो जिले की सहकारिता की बागडोर उनके हाथों में होती। शिंदे, श्री शरद पवार के कट्टर अनुयायी हैं। लिहाजा उन्हें पराजित करके किसने बाजी मारी? जिला बैंक के चुनाव राजनीतिक पार्टियों के चिह्न पर नहीं होते। लेकिन उसमें दलीय आक्रामकता और रणनीति होती है। पैसों की बारिश तो हमेशा होती है। संगोला के वर्तमान विधायक शहाजी पाटील ने इससे पहले अर्थतंत्र पर प्रकाश डाला था। विधायक के चुनाव को भी पीछे छोड़नेवाले इस चुनाव के खर्च का आकलन करना मुश्किल है। इसीलिए जिला बैंक के निदेशक, अध्यक्ष और बाद में राज्य सहकारी बैंकों का सर्वेसर्वा बनने के लिए लॉबिंग शुरू थी। ६ जिला बैंकों ने यह दिखा दिया है। राज्य में फडणवीस का शासन था तब इस क्षेत्र के कई लोग भाजपा के पाले में चले गए और कुछ बैंकों पर भाजपा का वर्चस्व हो गया। सांगली में पृथ्वीराज देशमुख जैसे सहकारिता क्षेत्र के दिग्गज लोग भाजपा में चले गए और उन्होंने वर्चस्व कायम रखा, लेकिन अब सांगली जिला मध्यवर्ती बैंक में भाजपा केवल चार सीटें ही जीत पाई और महाविकास आघाड़ी ने १७ सीटें जीतीं। यहां कांग्रेस के प्रमुख नेता पराजित हो गए हैं। धुले-नंदुरबार सहकारी बैंक के चुनाव में आदिवासी कल्याण मंत्री के.सी. पाडवी की पराजय हुई। शिवसेना के जिलाप्रमुख आमशा पाडवी निर्विरोध चुने गए। संदीप मोहन वलवी शिवसेना के दूसरे उम्मीदवार भी विजयी हुए। सहकारिता क्षेत्र में शिवसेना का पदार्पण अच्छा है। रत्नागिरी सहकारी बैंक में शिवसेना के मंत्री उदय सामंत के पैनल ने बड़ी जीत हासिल की। केंद्रीय मंत्री नारायण राणे का पैनल पूरी तरह से साफ हो गया है। जिला बैंक के चुनाव में महाविकास आघाड़ी ने बाजी मारी है। जलगांव में एकनाथ खडसे के समूह ने भाजपा के गिरीश महाजन को करारी शिकस्त दी है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी की स्थिति राज्य में क्या हो गई है, यह तस्वीर सामने आई है। सहकारिता क्षेत्र के चुनाव में गंभीरता से लड़ना होता है, तभी लोगों तक पहुंचा जा सकता है। सहकारिता क्षेत्र महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्र की आर्थिक रीढ़ है। भाजपा की सरकार जाने के बाद से इस रीढ़ को तोड़ने के लिए तरह-तरह की कोशिशें जारी हैं। सहकारिता क्षेत्र, कारखाने, बैंक संकट में हैं, यह सत्य है लेकिन उसके लिए केंद्रीय नीति, बदले की राजनीति उतनी ही जिम्मेदार है। सहकारिता क्षेत्र को आगे बढ़ानेवाला एक स्वतंत्र वर्ग है और उसका उतना ही सम्मान होना ही चाहिए। केंद्र में अब एक अलग सहकारिता मंत्रालय शुरू करके उसकी बागडोर देश के गृहमंत्री ने खुद अपने पास रखी है। उससे कुछ अच्छा होगा तो उसका स्वागत है। लेकिन ६ जिलों के सहकारी बैंकों के नतीजे बहुत कुछ कह रहे हैं। राज्य के ग्रामीण इलाकों की हवा किस दिशा में बह रही है, यह देखा जाए तो भाजपा नेताओं के पैर जमीन पर आ जाएंगे।