" /> बॉलीवुड पर टेढ़ी नजर किसकी?

बॉलीवुड पर टेढ़ी नजर किसकी?

बॉलीवुड को खत्म करने की साजिश को सहन नहीं करेंगे, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने ऐसी हुंकार भरी है। इससे जिन लोगों तक यह संदेश पहुंचना था, वह अवश्य पहुंच ही गया होगा। हिंदी सिनेमा जगत अर्थात बॉलीवुड की जड़ें मुंबई में फैली हुई हैं। गत १०० वर्षों से यह जड़ें मजबूती के साथ टिकी हुई हैं। ये कई लोगों की मेहनत और पसीने का फल है; लेकिन सुशांत मृत्यु मामले में कुछ उदरपीड़ितों ने बॉलीवुड के विरोध में जो मुहिम शुरू की, वह धक्कादायक है। मुख्यमंत्री ने कल कहा कि बॉलीवुड को गत कुछ दिनों से एक वर्ग विशेष की ओर से बदनाम किया जा रहा है। यह बात अत्यंत वेदनादायक है। बॉलीवुड को समाप्त करने या इस क्षेत्र को कहीं और ले जाने की कोई साजिश रच रहा होगा तो हम उसे नाकाम कर देंगे। मुख्यमंत्री ने कड़े शब्दों में यह बातें कहीं, ये अच्छा ही हुआ। लॉकडाउन के दौरान बॉलीवुड का काम ठंडा पड़ गया। शूटिंग आदि रोक दी गई। अब टीवी के धारावाहिकों की शूटिंग शुरू हो चुकी है; लेकिन सिनेमा जगत पर आज भी मंदी का संकट है। इस क्षेत्र में बड़ा निवेश है लेकिन कोरोना काल में सात महीनों से थिएटर्स बंद हैं। थिएटर्स की अपनी ही एक अर्थनीति है। सिर्फ थिएटर उद्योग से ही कई लोगों का घर-संसार चलता है। टिकट बेचनेवाले, खानपान सेवा, अन्य तांत्रिक कर्मचारी, साफ-सफाई करनेवाले जैसे लाखों लोगों का रोजगार थिएटर के परदे के कारण टिकता है। यह परदा गत सात महीनों से अंधेरे में खो गया है। ‘बॉलीवुड’ मतलब अभिनेता-अभिनेत्रियों की चमक-धमक मात्र नहीं है, बल्कि ऐसे सहायक उद्योग भी हैं। परिधान की व्यवस्था करनेवाले, मेकअप मैन, लाइटमैन, स्पॉटबॉय, साउंड आर्टिस्ट, डबिंग वाले, वादक, संगीतकार, डमी, एक्स्ट्रा में काम करनेवाले कलाकार; ऐसे लगभग पांच लाख लोगों को यह उद्योग रोजगार देता है। हिंदी सिनेमा जगत तो है ही; लेकिन मराठी, गुजराती, भोजपुरी, दक्षिण, बंगाली और उड़िया जैसी कई भाषाओं का मनोरंजन का क्षेत्र है। पूर्ण लॉकडाउन होने के कारण कई लोगों की हालत खराब हो गई है। गत कुछ महीनों में मनोरंजन क्षेत्र के कई कलाकारों पर फल और सब्जी बेचने की नौबत आ गई, ऐसी खबरें प्रकाशित हुई हैं। कुछ छोटे-बड़े कलाकार, तंत्रकर्मी आदि ने अपनी जान को दांव पर लगा दिया। यह तस्वीर अच्छी नहीं है। यह समय मनोरंजन उद्योग को सहारा देने का है। इसके बदले महाराष्ट्र से बेईमानी करनेवाले कुछ मतलबी लोग मनोरंजन उद्योग पर ही हमला कर रहे हैं। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या दुर्भाग्यपूर्ण और धक्कादायक है; लेकिन उसकी लाश पर का मक्खन खाकर छोटे परदे पर जो नंगा नाच किया जा रहा है, वह असहनीय है। बॉलीवुड के ५-१० प्रमुख लोग यहां बैठकर पाकिस्तान का एजेंडा चला रहे हैं, ऐसा खुद अपनी मालकियत के चैनल से भौंका गया। इससे पूरे मनोरंजन क्षेत्र पर सवाल खड़ा हो गया। कुल मिलाकर, ३२ मुख्य लोग इन भौंकनेवालों के विरोध में न्यायालय गए और न्यायालय से इस संदर्भ में सही निर्देश मिलेगा ही। बॉलीवुड पर नशेबाजी का आरोप लगाना, उस पर बड़ी आवाज में रोज वही झूठ बोलना पर सबूतों के नाम पर कुछ नहीं। लेकिन अब क्या हुआ? विवेक ओबरॉय के घर पर बेंगलुरु की पुलिस ने छापा मारा। विवेक की पत्नी का भाई बेंगलुरु ड्रग्स प्रकरण में आरोपी है। विवेक महाशय भाजपा गट के माने जाते हैं और वे पर्दे पर नरेंद्र मोदी की भूमिका भी साकार कर चुके हैं। इस सारे ‘ड्रग्स’ मामले से विवेक ओबरॉय का कोई संबंध होगा या है, ऐसा हम नहीं कहेंगे लेकिन कौन-सी कड़ी कहां जुड़ जाएगी, फिलहाल इसका कोई भरोसा नहीं। इसी के सहारे बॉलीवुड को झटके देकर पूरे उद्योग को उद्ध्वस्त करने की ‘साजिश’ गंभीर है। बॉलीवुड को बदनाम करना और उसकी नैतिक शक्ति को दबाना तथा इस उद्योग को यहां से हटाने के मंसूबे कुछ लोगों ने पाल ही रखे होंगे। एक तरह से महाराष्ट्र और मुंबई की पहचान समाप्त करने की साजिश बंद परदे के पीछे चल रही है। कोई कितना भी सर पीटे, फिर भी मुंबई के बॉलीवुड का बाल भी बांका नहीं होगा। यह बात अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र को मुंबई से हटाने जितनी आसान नहीं है। मुंबई देश की आर्थिक राजधानी तो है ही लेकिन मनोरंजन उद्योग की भी राजधानी है। मुख्यमंत्री ने इस क्षेत्र के प्रमुख लोगों से चर्चा की और उन्हें भरोसा दिलाया, यह अच्छा ही हुआ। मराठी माणुस दादासाहेब फाल्के ने हिंदुस्थान के सिनेमा जगत की नींव मुंबई-महाराष्ट्र में रखी। यह नींव कच्ची नहीं है। जल्द ही ‘परदे’ जीवंत होंगे। बॉलीवुड जागेगा। मुख्यमंत्री पर विश्वास रखना चाहिए।