" /> दो मुखर तोपखाने!

दो मुखर तोपखाने!

दशहरा के अवसर पर दो सम्मेलन चर्चा में रहे। पहला नागपुर का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वार्षिक विजयादशमी का सम्मेलन और दूसरा मुंबई में शिवसेना का दशहरा सम्मेलन। कोरोना के कारण दोनों सम्मेलन बंद सभागृह में संपन्न हुए। लेकिन सम्मेलन के प्रमुख सूत्रधारों द्वारा हिंदुत्व के बारे में व्यक्त किए गए विचार देशभर में पहुंचे। दोनों व्यासपीठों के भाषण मुखर तोपखाने ही साबित हुए! सरसंघचालक मोहन भागवत ने दशहरा मेले में हिंदुत्व की व्याख्या स्पष्ट रूप से बताई है। संघ के दृष्टिकोण से हिंदुत्व का अर्थ व्यापक है और पूजा-पद्धति से जोड़ दिए जाने के कारण उसे संकुचित करने का प्रयास किया गया है। हिंदुत्व देश के अस्तित्व का सार है। ऐसी भूमिका श्री भागवत ने रखी। खुद को हिंदुत्व का ठेकेदार समझनेवाले, जो भाजपा के साथ नहीं, वह हिंदू नहीं है, जैसी विकृत विचार शैली तक पहुंचनेवाले ठेकेदारों के दांत नागपुर में सरसंघचालक ने उनके गले में डाल दिए। महाराष्ट्र के राज्यपाल श्रीमान भगत सिंह कोश्यारी ने संघ की काली टोपी पहनकर उद्धव ठाकरे को हिंदुत्व की सीख देने का प्रयास करके देखा। महाराष्ट्र के मंदिरों को खोलोगे या नहीं? तुमने हिंदुत्व छोड़ दिया क्या? तुम सेक्युलर हो गए क्या? जैसे सवाल राज्यपाल ने मुख्यमंत्री से पूछे। उन्हें उद्धव ठाकरे ने जोरदार उत्तर दिया ही लेकिन अब सरसंघचालक ने भी इस पर खरी-खरी सुना दी है। शिवतीर्थ पर आयोजित सम्मेलन (वीर सावरकर स्मारक सभागृह) में मुख्यमंत्री ने भाजपा के हिंदुत्व के राजनीतिक ठेकेदारों को जमकर सुनाया कि हिंदुत्व मतलब क्या है? यह सरसंघचालक से सीखो। इसके आगे श्री ठाकरे ने कहा कि घंटा बजाना और थाली पीटना हमारा हिंदुत्व नहीं है। इससे कुछ नहीं होता। मुंबई को पाक अधिकृत कश्मीर की उपमा देनेवाली अभिनेत्री का आदर-सत्कार करना हमारे हिंदुत्व में नहीं बैठता। मुख्यमंत्री ठाकरे द्वारा किया गया यह तंज राजभवन को अस्वस्थ करनेवाला है। भारतीय जनता पार्टी का हिंदुत्व गौ-माता के आसपास घूम रहा है और इस पर देश में बड़ी संख्या में खून-खराबा हुआ। गाय को लेकर वीर सावरकर के विचार कुछ अलग थे। वे गाय को हिंदुत्व का प्रतीक मानने को तैयार नहीं थे। गाय एक उपयुक्त पशु या प्राणी है, ऐसा उनका मत था। लेकिन भाजपा के हिंदुत्ववादियों ने गाय पर हिंदू-मुसलमानों में दंगे भड़काए और राजनीति की। ‘माय मरे और गाय जिए’, हमारा हिंदुत्व नहीं है। महाराष्ट्र में गौ-माता और गोवा में जाकर खाता? यही है क्या तुम्हारा हिंदुत्व? ऐसा नुकीला भाला ही उद्धव ठाकरे ने भाजपा को घोंपा है। भाजपाशासित कई राज्यों में गाय काटी और खाई जाती है। यह हकीकत है। इसलिए भाजपा का गाय का हिंदुत्व कामचलाऊ है व श्री ठाकरे ने इस कामचलाऊ भूमिका की चीरफाड़ करके रख दी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा की मातृसंस्था है। इसलिए सरसंघचालक क्या कहते हैं, यह कई बार दिशादर्शक साबित होता है। संघ का हिंदू विचार कभी छिपा नहीं रहा। अयोध्या में राम मंदिर का भूमि पूजन हुआ। उस समारोह में सरसंघचालक मोहन भागवत विशेष निमंत्रित अतिथि के रूप में उपस्थित थे। अयोध्या में राम मंदिर बने, ऐसी संघ की भूमिका थी। लेकिन ‘कोरोना’ महामारी की परवाह न करते हुए सारे मंदिरों को खोलो, ऐसा श्री भागवत कभी नहीं कहेंगे। मंदिरों में भीड़ होगी तब महामारी का संकट बढ़ेगा, सरसंघचालक ऐसा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवाले हैं। घंटा बजाकर व थालियां पीटकर कोरोना नहीं भागनेवाला, उसके लिए स्वास्थ्य संबंधी कठोर नियम व अनुशासन का पालन करना ही पड़ेगा, टीके की खोज करनी ही पड़ेगी, सरसंघचालक ऐसा माननेवालों में से हैं। भारतीय जनता पार्टी के जो लोग मंदिर के लिए थाली और छाती पीट रहे हैं, उन्हें सरसंघचालक से हिंदुत्व की सीख लेनी चाहिए। ”हमारे लिए ‘हिंदुत्व’ यह शब्द हमारी प्रथा-परंपरा पर आधारित मूल्य पद्धति का है। इसलिए इस व्याख्या में १३० करोड़ भारतीय आते हैं। हम व्यापक रूप से हिंदुत्व की ओर देखते हैं।” श्री भागवत का यह बयान आज की स्थिति में महत्वपूर्ण है। हिंदुत्व हिंदू समाज की एकता दिखानेवाला शब्द है। यह शब्द हिंदुस्थान की बहुसंख्य समाज का राष्ट्रीयत्व दिखाता है। उसका और धर्मनिरपेक्षता का किसी भी प्रकार का संबंध नहीं है। धर्म निरपेक्षता का संबंध शासन संस्था से हो सकता है। लेकिन आज तक सारे हिंदू शासक और शासन संस्था धर्म निरपेक्ष ही थे। हिंदवी स्वराज्य संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज इसके मूर्तिमंत उदाहरण हैं ही। हिंदुत्व की व्याख्या आज जितनी संकुचित हुई है, उतनी कभी नहीं हुई थी। बलात्कार और खून जैसे मामलों में कई लोगों को हिंदुत्व दिखने लगा, तब आश्चर्य ही होता है। उत्तर प्रदेश में बिना अनुमति के दाढ़ी रखने पर एक पुलिसकर्मी को सरकार ने निलंबित कर दिया। इसका तथाकथित हिंदुत्ववादियों ने स्वागत किया। लेकिन राजनीति में केंद्रीय मंत्रिमंडल में कई लोगों ने अभिमानपूर्वक दाढ़ी रखी है। हिंदुत्व थाली और घंटा बजाने तक सीमित नहीं, उसी प्रकार दाढ़ी-मूछों तक भी मर्यादित नहीं है। चापेकर बंधुओं को दाढ़ी नहीं थी लेकिन तीनों चापेकर बंधु देश के लिए हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए। ऐसी मर्दानगी के कई उदाहरण हैं। सरसंघचालक और शिवसेनापक्षप्रमुख के भाषण हिंदुत्व और राष्ट्रीय एकता को दिशा देनेवाले ही थे। नागपुर और मुंबई के वीर सावरकर स्मारक सभागृह में दशहरा के अवसर पर हिंदुत्व पर मंथन हुआ। दोनों नेताओं का अभिनंदन!