" /> कानून के शासन को खत्म करने का प्रयास, सुशांत को न्याय मिले!

कानून के शासन को खत्म करने का प्रयास, सुशांत को न्याय मिले!

सर्वोच्च न्यायालय ने सुशांत सिंह राजपूत आत्महत्या मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है। इस निर्णय से महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार जैसे राज्यों के कुछ लोग अति-आनंदित हैं। नीतीश कुमार ने ‘न्याय और सत्य’ की बात कहते हुए अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस प्रकार दी मानो उन्होंने बिहार विधानसभा का चुनाव ही जीत लिया हो। सीबीआई को जांच सौंपते समय सर्वोच्च न्यायालय ने धीरे से यह भी कहा है, ‘मुंबई पुलिस की जांच में प्रथमदृष्टया कुछ गलत नहीं दिख रहा।’ फिर भी प्रामाणिकता की कद्र न करते हुए जांच सीबीआई को देना आश्चर्यजनक है। बिहार के पुलिस वालों को मुंबई में क्वॉरंटीन किए जाने से सुशांत मामले में शक बढ़ गया, ऐसा किसी को लग रहा होगा और उसके आधार पर जांच सीबीआई को सौंपी गई होगी तो आज हिंदुस्थान का संविधान आंसू बहा रहा होगा। ये देश को संविधान और संघराज्य देनेवाले भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का महाराष्ट्र है। सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण में सीबीआई को इस प्रकार से घुसाना डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा बनाए संघ राज्य पर आक्रमण है और उनके द्वारा दिए गए निर्देशों को न मानना है। मुंबई पुलिस की प्रमाणिकता निसंदेह शत-प्रतिशत है। इसलिए महाराष्ट्र के पुलिसकर्मियों को कुछ बुरा नहीं मानना चाहिए। मुंबई पुलिस की जांच कानून के हिसाब से सही दिशा में चल रही थी। लेकिन किसी मामले में राजनीति घुसाई जाएगी तो दूसरा और क्या होगा! सर्वोच्च न्यायालय ने इस निरीक्षण का भी उल्लेख किया है, ‘जांच करने का अधिकार मुंबई पुलिस को है। लेकिन वाद-विवाद न हो इसलिए इस मामले को सीबीआई को सौंपा जा रहा है।’ सीबीआई जांच की मान्यता पर ‘जीत का जश्न’ मनानेवालों को जरा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को भी एक बार देख लेना चाहिए। सुशांत मामला सीबीआई को सौंपने की घोषणा होते ही बिहार के पुलिस महासंचालक गुप्तेश्वर पांडे अति-आनंदित होकर बाहर आए और किसी राजनीतिक चुनाव को जीतनेवाले भाव में पत्रकारों से बोले, ‘ये न्याय की अन्याय पर जीत है।’ पांडे भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ चुके हैं। उन्होंने भाजपा का झंडा हाथ में लेकर पत्रकारों से बात नहीं की, बस इतना ही बाकी रह गया था। पांडे का कहना है, ‘सुशांत मामले में मुंबई पुलिस सही दिशा में जांच नहीं कर रही है। (उन्हें सर्वोच्च न्यायालय का पत्र पढ़ना चाहिए)। बिहार पुलिस की जांच में अड़ंगे डाले जा रहे हैं।’ उनका ये बयान सच नहीं है। सुशांत के परिवार ने अपना बेटा खोया है और सुशांत ने आत्महत्या क्यों की? इसका रहस्य जानने में पुलिस जुटी हुई है। लेकिन यह रहस्य पाताल में दबी एक कुप्पी है। वह कुप्पी सिर्फ बिहार की पुलिस या सीबीआई ही ढूंढ पाएगी, यह एक प्रकार का भ्रम है। सीबीआई द्वारा राज्य के किसी भी मामले की जांच करने में गलत कुछ नहीं है। लेकिन यह राज्यों के अधिकारों पर आक्रमण है। बिहार में कई खून और हत्याओं के मामले सीबीआई को सौंपे गए। लेकिन उनमें से कितने असली आरोपियों को सीबीआई अब तक पकड़ पाई है? ब्रह्मेश्वर मुखिया ने रणवीर सेना नामक एक निजी ‘फौज’ बनाई थी। उसकी हत्या होते ही बिहार में दंगे शुरू हो गए। मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। मुखिया के असली आरोपी किसी ने पकड़े होंगे तो बताओ। मुजफ्फरपुर का नवरुणा हत्याकांड हो या सिवान में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या का मामला हो, ये मामले भी सीबीआई को सौंपे गए। उनमें से किसी भी गुनाहगार को नहीं पकड़ा जा सका। उनके परिवार पर जो अन्याय हुआ, उन मामलों में न्याय और सत्य की विजय नहीं हो पाई। मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार की बदनामी करने के लिए सुशांत मामले का राजनीतिक उपयोग हुआ। सर्वोच्च न्यायालय की ‘सिंगल बेंच’ के समक्ष यह मामला चलाया गया। कम-से-कम इसे ‘डबल बेंच’ के सामने चलाया जाना चाहिए था, ऐसी अपेक्षा थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पटना में जो एफआईआर दर्ज की गई, वह सही है। सर्वोच्च न्यायालय का ऐसा कहना है क्योंकि सुशांत के पिता पटना में रहते हैं। कल इस मामले के अन्य ‘पात्र’ अन्य राज्यों के हैं। इसलिए हमारे राज्य के लोगों पर अन्याय हो रहा है, ऐसा साबित करते हुए बंगाल जैसे राज्यों में एफआईआर दर्ज हुई तो कोलकाता की पुलिस को भी इस मामले में जांच करने का अधिकार मिलेगा क्या? मूलतः मुंबई पुलिस की जांच आखिरी चरण में थी। उसी दौरान उसे रोककर पूरा मामला सीबीआई को सौंपा गया और वह भी बिहार राज्य की सिफारिश पर। सर्वोच्च न्यायालय भले कह रही है कि इसका कानूनी आधार है तो ऐसे कानूनी आधार अन्य मामलों में क्यों नहीं दिखते? फिर भी सुशांत सिंह राजपूत मामला सीबीआई को सौंपकर इस मामले में ‘न्याय होना होगा’ तो इसका स्वागत है। सीबीआई इस मामले का सच ढूंढ लेगी और मुंबई पुलिस सीबीआई का सहयोग करे। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा निर्देश दिया है। न्यायालय और कानून का आदर करने में महाराष्ट्र पहले क्रमांक का राज्य है। इसलिए न्याय और कानून क्या है, कोई ये महाराष्ट्र को न सिखाए और जिसके शरीर पर खाकी वर्दी और हाथों में राजनीतिक पार्टी का झंडा है, वह तो ऐसी हिम्मत बिल्कुल न करे। सुशांत मामले की जांच निष्पक्षता से होनी ही चाहिए। उनके परिजनों के मन में कोई शंका होगी तो उस पर प्रकाश पड़ना ही चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का अनादर करने का सवाल ही नहीं उठता। लेकिन सवाल मुंबई पुलिस की प्रतिष्ठा और उस पर राजनीतिक कीचड़ उछालने का है। कानून के शासन को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा होगा तो उन्हें रोकना ही होगा। सुशांत को न्याय मिले। न्याय मिलना ही चाहिए। किंतु जब मुंबई पुलिस सत्य और न्याय के मार्ग पर हो तो उसे रोकना ठीक नहीं है।