चुनावी टिकटॉक और मर्यादाओं का हनन

बात टिकटॉक से शुरू करते हैं। नाम आपने सुना ही होगा। नहीं सुना! तो आप खुद को `पिछड़ी’ हुई पीढ़ी का मान लीजिए। मान लें कि आप बीते हुए कल की दास्तां बन चुके हैं। मन मानने को तैयार न हो तो कुछ देर इत्मीनान से बैठें, सेलफोन वाली नई पीढ़ी के बगल में। उनसे कुछ समझें और थोड़ा बहुत उन्हें भी समझें। यकीन मानिए काफी सूत्र मिलेंगे और मिलेगी टिकटॉक वाली नई-नवेली दुनिया में एंट्री। किसी और के डायलॉग पर लिप्सिंग से आनंद खोज निकालनेवाली इस `गैर जिम्मेदार’ पीढ़ी को कोसने से पहले आज देश का नेतृत्व करने को उतारू `जिम्मेदार’ पीढ़ी पर भी नजर ठहराने का वक्त मिल जाएगा। आप जान जाएंगे कि डायलॉग डबिंग का खेल जितना यहां है, उतना ही वहां भी है। लिप्सिंग का खेल जैसा यहां है, वैसा ही वहां भी है। फर्क है तो सिर्फ इतना कि यहां के डायलॉग जीवन में आनंद और मिठास लाते हैं तो वहां के       डायलॉग आबोहवा में कड़वाहट। `शक्कर’ ज्यादा पड़ जाए तो मिठास भी कड़वाहट में बदल जाती है। तब किसी अदालत को आदतन फटकार लगानी पड़ती है। अभिव्यक्ति की आड़ में अनर्गलता की हदें पार करनेवालों पर सख्ती होती है। टिकटॉक भी सख्त हुआ है, विशेष तौर पर हमारे प्यारे हिंदुस्थान पर। कंपनी ने सामुदायिक नियमों का उल्लंघन कर बनाए गए ६० लाख वीडियो कंटेंट हटा दिए हैं। शुरू कर दी अपने सोशल समुदाय की सफाई। शिद्दतवाली एक ऐसी ही सफाई हमारे प्रजातंत्र के प्रचार समुदाय की भी होनी चाहिए थी। चुनाव आयोग की झाड़ू यह करती भी रही है, पर इस बार उसे थामनेवाले हाथों की पकड़ ढीली होने के आरोप हैं। झाड़ू चल तो रही है पर शाब्दिक कचरा तब भी पीछे छूटा जा रहा है। मर्यादाओं का उल्लंघन और मतदाताओं के साथ छलावा बदस्तूर जारी है। बख्शा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्म पर्व का दिन भी नहीं गया। रामनवमी का धर्मपर्व तो मना पर श्री राम के देश में ही प्रजातंत्र का महापर्व मर्यादाविहीन रह गया। चैत्र नवरात्र समाप्त हो गई पर संयम का व्रत सियासत से पाला न गया। पहले चरण के चुनावी सप्ताह भर अमर्यादित, असंयमित आचार और विचारों का ढोल प्रजातंत्र के कान फाड़ता रहा। राजनीति उस राम को ही बिसार गई, जिन्होंने राज धर्म की मिसाल कायम की, सर्वस्व त्याग कर संयम बरतने का सबक दिया। असल में राम जिस धरती पर जन्मे और जहां से ब्याहे गए, उन उत्तर प्रदेश और बिहार में भी मर्यादाओं का हरण जारी है। कलियुगी यदुकुल के कृष्णप्रेमी ज्येष्ठ पुत्र `तेज’ को छोटे भ्राता की `तेजस्वी’ आभा नहीं सुहा रही है। भ्राता-भ्राता के बीच सियासत और सिंहासन के वर्चस्व का `राष्ट्रीय’ दल युद्ध जारी है। छोटे भाई राज्याभिषेक की `तेजस्वी’ लालसा में बड़े को `वनवास’ ही दे चुके हैं। माता रानी राबड़ी भावुक अपील कर रही हैं पर `तेज’ का विरोधी `प्रताप’ कमजोर नहीं पड़ रहा। कोई कृष्ण वंश के नाम पर तो कोई राजवंश के नाम पर जनता को छल रहा है। बात त्रेता की हो या कलियुग की, राम भी छले हर युग में गए। राम छले तो तब भी गए, जब अली-बजरंगबली की सियासत हुई। राम छले तो कल भी गए, जब पश्चिम बंगाल में रामनवमी पर रैली की इजाजत नहीं मिली। वैसे इजाजत दीदी के `दबंग’ प्रशासन से राहुल बाबा को भी में नहीं मिली, उनका चुनावी उड़नखटोला उतारने की। इस पर राहुल बाबा अपनी जुबान खोलकर कोई भूकंप ला न सके पर दीदी अपनी दादागीरी से आए दिन भूकंप लाने से बाज नहीं आ रहीं। मसला पीएम का हो या सीबीआई का, वो तना-तनी से कहीं पीछे नहीं हट रहीं। चाहे फटकार सुप्रीम कोर्ट से लगे या आयोग से, उनके रिएक्शन के रिक्टर स्केल पर कांटा शून्य पर ही अटका पड़ा है। वैसे कल निकोबार द्वीप समूह में रिक्टर स्केल ने गंभीरता से रिएक्ट किया। कांटा ४.४ के भूकंप झटके रिकॉर्ड कर गया। भूकंप का तेज असर इंडोनेशिया में भी महसूस हुआ। फिर खबर सुनामी के खतरे की भी निकली। कुछ-कुछ वैसी ही जैसी सियासत के गैर जिम्मेदाराना बयानों से हिंदुस्थान में इन दिनों आम है। बात `आम’ की आई है तो बता दें कि इस बार उत्तर प्रदेश में मलीहाबादी आम मिठास खो रहा है। आंधी और मौसम की मार से बेजार हो रहा है। बिलकुल देश की आम जनता की तरह। बेजार सिर्फ `आम’ किसान ही नहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश का गन्ना किसान भी है। वो वर्षों से ऐसी सत्ता के इंतज़ार में है जो उसे उसका गन्ना बकाया दिला दे। यहां प्रजातंत्र भी इंतजार में है, एक सशक्त चुनाव आयुक्त के। याद शेषन की भी आ रही है तो याद जलियांवाला हत्याकांड के शहीदों की भी, क्योंकि आज १०० साल बाद निराश उनकी आत्माएंं भी हैं तो ७२ साल बाद निराश प्रजातंत्र भी।