" /> यूपी के रण में बिगड़ेंगे समीकरण… क्या होगा जब माया-ओवैसी होंगे साथ?

यूपी के रण में बिगड़ेंगे समीकरण… क्या होगा जब माया-ओवैसी होंगे साथ?

बिहार चुनाव के नतीजे आने के बाद बहुजन समाज पार्टी अध्यक्ष मायावती ने यूपी में अपने अध्यक्ष मुनकाद अली को हटाकर अति पिछड़े वर्ग से आने वाले भीम राजभर की ताजपोशी कर दी। वैसे तो पहले ही यूपी में भाजपा के साथ अक्सर गलबहियां करती माया से मुसलमानों का मोहभंग होने लगा था और इन हालात में अल्पसंख्यक मुनकाद अली को हटाना बहुतों को अचरज भरा लग सकता है। हालांकि इसके पीछे मायावती की आने वाले यूपी चुनावों को लेकर दूरअंदेशी ज्यादा लगती है।
दरअसल बिहार में ओवैसी की पार्टी से गठजोड़ और मुसलमानों में उसकी बढ़ी लोकप्रियता व सफलता देख माया ठीक वैसा ही प्रयोग यूपी में दोहरा सकती हैं। ओवैसी के सहारे मुस्लिम वोट साधने और अपने दलित मतदाताओं के साथ अति पिछड़ों को पाले में लाना उनकी राजनैतिक कवायद का हिस्सा हो सकता है। बसपा प्रदेश अध्यक्ष पद पर भीम राजभर की नियुक्ति इसी रणनीति का हिस्सा हो सकती है।
अभी ज्यादा दिन नहीं बीते जब मायावती ने खुल कर कह दिया कि हम सपा को हराने के लिए भाजपा को जिता सकते हैं। यूपी में बसपा ने भाजपा से मधुर संबंध बनाए हैं और बिहार में भाजपा के धुर विरोधी असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के गठबंधन संग बसपा चुनाव लड़ चुकी है। बहुत कम संभावना ये भी है कि करीब सवा साल बाद यूपी के विधानसभा चुनाव से पहले यदि भाजपा को लगता है कि उसकी स्थिति अच्छी नहीं है तो वो बसपा के लिए ठीक-ठाक सीटें छोड़कर उसके साथ गठबंधन कर सकती है।
संभावना ये भी है कि इनके बीच आपसी सामंजस्य प्रâेंडली फाइट कर पोस्ट पोल गठबंधन कर सरकार बनाने का वैकल्पिक रास्ता तैयार किया जा सकता है। अगर भाजपा को लगा कि उसकी स्थिति यूपी में ठीक है और अकेले दम पर दुबारा सरकार बन सकती है तो ऐसे में दोनों के बीच तल्ख रिश्ते बन जाएंगे। ऐसे हालात में बसपा के पास दूसरा मजबूत विकल्प है, जो यूपी में त्रिकोणीय मुकाबले की सूरत पैदा करेगा। कुल मिलाकर दोनों की परिस्थितियों में नुकसान में सपा व कांग्रेस जैसे दल ही रहेंगे जो सेकुलर नाम पर भाजपा के खिलाफ मुखालिफ होने की तलवार भांजते हुए मैदान में हैं और अगली सरकार के लिए दावेदारी कर रहे हैं।
तस्वीर के कई पहलू सामने आ रहे हैं, उनसे संकेत कई मिलते हैं। एक तरफ बीजेपी तो दूसरी तरफ सपा-कांग्रेस, रालोद का संभावित गठबंधन और तीसरी तरफ बसपा और एआईएमआईएम का मजबूत गठबंधन अगले विधानसभा चुनाव में यूपी में जोर अजमाइश करते दिख सकता है। माया-ओवैसी का दलित-मुस्लिम गठजोड़ भाजपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन को कड़ा मुकाबला दे सकता है। बसपा का आधार दलित और मुस्लिम वोट रहा है जो हाल के दिनों में उनके भाजपा के साथ दिखने की वजह से छिटका है। उपचुनावों में इसी की बानगी देखने को भी मिली है। माना तो ये भी जा रहा है कि मौजूदा हालात में भाजपा से मधुर रिश्तों के बाद बसपा के दामन से पूरी तरह से छिटक कर मुस्लिम वोट एक झटके में सपा-कांग्रेस के संभावित गठबंधन में चला जाएगा। फिलहाल तो मुस्लिम वोटों के लिए यूपी में सपा और कांग्रेस में ही जंग होते दिख भी रही है।
इसी हालात को भांप कर मायावती ने अपने पत्ते नए सिरे से चलने शुरू कर दिए हैं। बसपा ओवैसी की एआईएमआईएम को कुछ सीटें देकर यूपी में दलित-मुस्लिम समीकरण का कार्ड खेल सकती है। हैदराबाद से निकल महाराष्ट्र फिर बिहार में पैर पसारने के बाद ओवैसी की नजरे उत्तर पर हैं जहां के २० फीसदी के लगभग मुस्लिम वोटों के चलते उन्हें बड़ी संभावना दिखती है। माया का साथ लेने के बाद यह भी संभव है कि बिहार की तर्ज पर यह गठबंधन यूपी में भी महादलित, अति पिछड़ों में सीमित प्रभाव रखने वाली कुछ अन्य छोटी पार्टियों को अपने पाले में लाए। राजभर को बसपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाना इसकी शुरुआत माना जा सकता है। हालांकि बिहार की तरह यूपी में अति पिछड़ों या महादलितों के पास खालिस उनके लिए ही काम करने वाला कोई प्रभावी संगठन नहीं है पर सूबे के कुछ पाकेट में जरूर उनकी उपस्थिति है और सपा, कांग्रेस जैसे बड़े दलों के किसी भी गठबंधन में जगह न पाकर उनके लिए सबसे मुफीद ओवैसी-बसपा का साथ हो सकता है।
हालांकि इस संभावना में अगर-मगर की गुंजाइश काफी है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यूपी में मायावती खुद को सत्ता की बड़ी दावेदार मानती हैं और आसानी से किसी के साथ गठजोड़ कर उसके लिए सीटें छोड़ने से गुरेज करती हैं। राजनैतिक पंडितों का मानना है कि अब हालात बदल चुके हैं और पिछले लोकसभा चुनावों में सपा से गठजोड़ कर माया ने यह प्रयोग कर दिखाया है। फिर यूपी में मामूली या न के बराबर संगठन या आधार रखने वाले ओवैसी के साथ जाने में मायावती को कम से कम सीटों के लिहाज से कोई खास नुकसान होने वाला नहीं है।
ओवैसी का साथ और बड़ी तादाद में मुस्लिम उम्मीदवार खड़े करना मायावती की रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं और यह काम कम से कम सपा और कांग्रेस के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए काफी होगा। हाल के उपचुनावों में बुलंदशहर को छोड़ सभी सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं ने सपा या कांग्रेस को चुना और नतीजा यह रहा कि बसपा का प्रदर्शन लचर रहा है। माया को इन नतीजों से खतरे की घंटी जरुर सुनाई दी होगी। बिहार में मुसलमानों में ओवैसी की बढ़ी स्वीकार्यता ने माया को अपनी रणनीति को नये सिरे से बनाने के लिए जरूर मजबूर किया होगा।
एआईएमआईएम को मुस्लिम समुदाय से मिला समर्थन बिहार और महाराष्ट्र में उनकी जीत से बढ़ कर है। यह गैर-बीजेपी दलों को इस पर आत्ममंथन करने को मजबूर करेगा कि बीजेपी के खिलाफ खड़ी ये पार्टियां हिंदुत्व की चुनौती का सामना करने में क्यों हिचक रही हैं?
ये दल ओवैसी को गालियां देते हैं, उन्हें `वोटकटवा कहते हैं, बीजेपी की ‘बी टीम’ कहते हैं, पर इसका विश्लेषण करने में नाकाम है कि क्यों ओवैसी अपने प्रति हो रही तारीफ को चुनावी जीत में तब्दील करने लगे हैं! बिहार विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम के २० में से ५ उम्मीदवारों ने जीत हासिल कर ली। इसके अलावा महागठबंधन के एक भी उम्मीदवार को हराने में उनकी कोई भूमिका नहीं रही है। उत्तर प्रदेश में भी सेकुलर दल बसपा पर भाजपा की बी टीम होने का ही आरोप लगाते हैं।
नरेंद्र मोदी के २०१४ में प्रधानमंत्री बनने के बाद ओवैसी ने रफ्तार पकड़ी। मुसलमानों को लगा कि उनके वोट से गैर-बीजेपी दल नहीं जीत रहे हैं। ऐसे में क्या उन्हें ऐसे किसी आदमी को वोट नहीं देना चाहिए जो उनका अपना हो, जो परंपरा और आधुनिकता का आकर्षक मिश्रण हो, जो संविधान की भाषा बोलता हो? इस सोच का रणनीतिक कारण भी है। गैर-बीजेपी दल उन छोटी पार्टियों को भी लुभाने की होड़ में रहते हैं जो सिर्फ एक जाति तक सिमटी हुई है, ऐसे में मुसलमानों की एक मजबूत पार्टी ज्यादा हिस्सा मांग सकती है और बेहतर मोल-भाव कर सकती है। एआईएमआईएम बिहार में यही काम करने जा रही थी, जहां त्रिशंकु विधानसभा तो बस होते-होते रह गयी।
अब इसी प्रयोग को करने की बारी उत्तर प्रदेश में है जहां कम से कम मायावती ने इसके संकेत देने शुरु कर दिए हैं। हाल के कदमों से बसपा प्रमुख ने यह तो साफ कर दिया है कि वो आसानी से यूपी का मैदान किसी और के लिए छोड़ने वाली नही हैं। वहीं हालिया उपुचनावों में बसपा की दुर्गति हुई है और २०१७ के‍ विधानसभा चुनाव में मिले २२.२३ प्रतिशत वोट की तुलना में करीब चार प्रतिशत कम १८.९७ प्रतिशत ही वोट मिले हैं। तमाम कोशि‍शों के बावजूद मायावती को इस बार भी अच्छी संख्या में मुस्लिम वोट नहीं मिले। नतीजों से तैश में आई मायावती ने बसपा के प्रदेश अध्यक्ष मुनकाद अली को पद से हटा दिया। अतिपिछड़ी जातियों में बसपा की सबसे ज्यादा पैठ राजभर समुदाय में मानी जाती है। वर्ष २०१७ के विधानसभा चुनाव में जब यूपी में भाजपा की लहर चल रही थी तब भी बसपा के राजभर समुदाय से आने वाले दो प्रमुख नेता सुखदेव राजभर और रामअचल राजभर चुनाव जीतकर विधायक बने थे।
(लेखक उत्तर प्रदेश अधिस्वीकृत पत्रकार संघ के अध्यक्ष हैं। उत्तरप्रदेश की राजनीति के जानकार और स्तंभकार हैं।)