" /> इक ‘मूक’ घृणा के ‘दर्शन’!, इंसानियत की मिसाल!

इक ‘मूक’ घृणा के ‘दर्शन’!, इंसानियत की मिसाल!

इस बारिशवाले ‘लॉकडाउन’ में बहुत कुछ आईने की तरह साफ-अनलॉक हो गया। पशुप्रेमी ढोंग की मानसिकता वाले अमानवीय चेहरे के दर्शन हो गए। इसीलिए आज बात इसी ‘दर्शन’शास्त्र की…।
मुंबई महानगरीय क्षेत्र में विगत ४६-४७ वर्षों की दूसरी सर्वाधिक बारिश हाल ही में दर्ज हुई। जगह-जगह पानी भर गया था, निचले इलाकों में रहनेवाले लोग बेहद परेशान थे, उनका सामान खराब हो गया, खाना नहीं बना। सोने-बैठने को जगह नहीं थी, लिहाजा सरकार और तमाम संगठनों ने अपने-अपने स्तर पर उनकी मदद की। खुद बाढ़ प्रभावितों ने भी एक-दूसरे के लिए सहारे का हाथ बढ़ाया। इंसान तो इंसान, जानवरों को भी सुरक्षित शेल्टर और खाना-पानी दिया गया। वे जो कर सकते थे, उन्होंने वो सब कुछ किया। अभी ३ दिन पहले ही एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वडाला के एक बाइक चालक ने इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए चारों ओर से पानी से घिरी एक असहाय बेसहारा बिल्ली को रेस्क्यू किया और फिर सुरक्षित घर ले गया। ताकि वो बच जाए। चंद घंटों में ही उस वीडियो को लाखों लोगों ने लाइक कर दिया। खुले मन से समाज ने उसकी सराहना की। ऐसे कामों की सराहना होनी भी चाहिए।
सराहना करनेवाले हमारे समाज की यह एकतरफा तस्वीर थी। इसी समाज का दूसरा पहलू दर्शाता है कि उसे उन बेसहारा, असहाय जानवरों की कोई फिक्र नहीं, बल्कि उनसे होनेवाली थोड़ी-सी गंदगी उन्हें विचलित करती है। तब यही समाज किसी मूक जानवर को कहीं दूर ले जाकर भगवान भरोसे छोड़ने में अपने कर्तव्य का पालन समझता है। तब दया उन जानवरों पर नहीं, बल्कि ऐसी सोच रखनेवालों पर आती है। यह कानूनन अपराध तो है ही, पर उससे बड़ा यह नैतिक अपराध है। माना उनसे कुछ दिक्कतें होंगी पर उन दिक्कतों को हम थोड़ी-सी व्यवस्था से काबू में ला सकते हैं। आज कोरोना के लिए हम वह सब प्रयास कर ही रहे हैं न? क्योंकि वह जानलेवा है, अदृश्य है। हम प्रत्यक्ष रुप से उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इसलिए खुद को सुरक्षित करने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं। सैनिटाइजर लगा रहे हैं, मास्क पहन रहे हैं, काम-धंधे बंद पड़े हैं, ऑफिस नहीं जा रहे, आर्थिक नुकसान उठा रहे हैं, बच्चों को घरों में कैद कर रखा है, घर-इमारत को किले में तब्दील कर दिया है, गेट पर हजारों-लाखों रुपए के मेटल डिटेक्टर की तरह वायरस डिटेक्टर पड़े हैं। हम क्या-क्या नहीं कर रहे! किसी नीम-हकीम के नुस्खों की तरह हम हर वो सलाह मान रहे हैं, जिसमें हमें उम्मीद की कोई किरण दिखती है। फिर चाहे वो कारगर हो या न हो। क्यों? तो हम वायरस का प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इसलिए उससे बचने के उपाय खोजना हमारी मजबूरी है पर जो खुद मजबूर हैं उन जानवरों का हम बिगाड़ सकते हैं। इसलिए उन्हें सबक सिखाने को हम तुरंत तैयार हो जाते हैं। हम उन्हें बख्शना नहीं चाहते, क्योंकि वे दृश्य हैं, हमें नजर आ रहे हैं। वे हमारे लिए जानलेवा नहीं है, परंतु हमारा जोर उन पर चल सकता है। इसलिए उनसे होनेवाली छोटी-मोटी दिक्कतों पर भी हम एक धेला तक खर्च नहीं करना चाहते, बल्कि उस समस्या से निजात के नाम पर उन्हें मौत के मुंह में धकेलने को अपनी बुद्धिमत्ता, सभ्यता, सुशिक्षिता और लीडरशिप का संकल्प मानकर कॉलर ऊंचा कर लेते हैं। एक मूक-बेसहारा जानवर को उसके नवजात शिशु के साथ इसलिए कहीं दूर ले जाकर मरने को छोड़ देना चाहते हैं, ताकि उससे होनेवाली थोड़ी-सी गंध हमें बर्दाश्त नहीं।
ये डोमेस्टिक एनिमल्स हैं, वन्य प्राणी नहीं। यह तो सृष्टि की रचना है। हम जहां रहेंगे, वे भी वहीं रहेंगे। हम नए इलाके में जाएंगे तो धीरे-धीरे वे भी वहां आ ही जाएंगे। कहां जाएंगे वे? आप कितनों से पिंड छुड़ाएंगे? ये हमारे इको सिस्टम का हिस्सा हैं। वे जिएंगे तभी हम जी पाएंगे। गौरैया जिएगी तो हमारा पर्यावरण संरक्षित रहेगा, हम निरोगी रहेंगे। बिल्लियां जिएंगीं तो चूहे सीमित रहेंगे, हम प्लेग जैसी महामारी से बचे रहेंगे। उसी प्लेग से जिसने कभी कोरोना से भी घातक महामारी फैलाई थी। चूंकि हमने उसे देखा नहीं इसलिए हमें उसका इल्म नहीं। आज अगर कोरोना की जगह वो महामारी होती तो वही लोग जो आज बेसहारा बिल्लियों को देखकर नाक-भौं सिकोड़ रहे हैं, वे ब्लैक मार्केट से उन्हें खरीदकर उनकी आवभगत कर रहे होते। इसलिए क्रूर न बनें। यह जानवर क्रूर नहीं हैं। हालात की क्रूरता के खुद शिकार हैं। आज पूरी दुनिया इकोसिस्टम को बचाने व विलुप्त प्राय प्राणियों के संरक्षण पर अरबों-खरबों डॉलर खर्च कर रही है। फिर चाहे वे आदमखोर ही क्यों न हों? यह खर्च इसलिए नहीं हो रहा कि हमें उनकी तस्वीरें खींचकर वाहवाही बटोरनी है, बल्कि इसलिए कि वे जिंदा रहेंगे तो हम जिंदा रह पाएंगे। सृष्टि की रचना ही ऐसी है। इसमें उनकी भी भलाई है और हमारी भी। दरअसल, हर जानवर का अपना महत्व है। यह एक जैविक चक्र है। जिसे हम अपनी नापसंदी के लिए नहीं तोड़ सकते। हमारी घिन और घृणा के लिए उसे खत्म नहीं कर सकते। यह हमारे पूर्वज भी जानते थे, इसलिए हर पशु की रक्षा की जीवनशैली अपनाएं हुए थे। तब घर में गाय के लिए पहली रोटी बनती थी तो आखिरी निवाला कुत्ते-बिल्लियों के मुंह में भी जाता था। तब कौवे-कबूतरों का खयाल भी रखा जाता था। यही सीख हमारे पूर्वजों को धर्म-पुराणों से मिली थी। हिंदू धर्म में हर भगवान के साथ उनके वाहन के तौर पर जानवरों को ही दर्शाया गया है। ताकि हम उनका महत्व समझ सकें। हमारे पूर्वजों में से किसी ने कभी किसी देवी-देवता को प्रत्यक्ष अपनी सवारी पर बैठकर भागते-दौड़ते नहीं देखा था, बल्कि यह एक सीख देने का उद्देश्य था ताकि हम उनका महत्व समझ सकें। आज हम अपनी जीवनशैली में खलल न पड़े, इसके लिए ‘सेफ’ डोमेस्टिक जानवरों को भी मुक्त करने पर तुले हैं।
मैथिलीशरण गुप्त की रचना ‘मनुष्यता’ में एक पंक्ति है- ‘यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे…’ अर्थात पशु हमेशा खुद की सोचते हैं और किसी की नहीं। आज पशुओं का तो पता नहीं, पर इंसानों का चरित्र जरूर पशुओं की तरह हो गया है। जहां उन्हें सिर्फ खुद से और खुद से मतलब है। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं कि उनके इर्द-गिर्द कोई बेसहारा जानवर जिए या मरे। इसीलिए हम किसी जानवर की छोटी-सी दिक्कत से इतना आक्रामक हो जाते हैं कि सीधे ‘युद्ध’ पर उतर आते हैं। हम समय-बेसमय ‘सोशल’ हथियार उठाकर मैदान में उतर जाते हैं। तर्क देने लगते हैं कि चूंकि आप आवारा जीवों को खाना देते हो इसलिए इनकी जिम्मेदारी आप पर तय होगी। चूंकि आप इन आवारा जानवरों की दवा-दारू कराते हो इसलिए उनका जिम्मा आपके सिर होगा। चूंकि आप जरूरत पड़ने पर स्वेच्छा से स्वखर्च पर उन्हें जीने में सहायक हो इसलिए उनकी जिम्मेदारी भी आपसे बंधी होगी। इन बेतुके तर्कों का क्या जवाब दें? यहां इंसानियत को दरकिनार भी कर दें तब भी संविधान का कौन-सा विधान है कि किसी भूखे जीवों को खाना खिलाना अपराध है। भारतीय दंड संहिता की कौन-सी कलम कहती है कि आवारा जानवरों की दवा-दारू कराना दंडनीय अपराध है। धर्म की कौन-सी धारणा बताती है कि जो इंसान का किसी तरह से अहित न करता हो, उस जानवर का अहित करना उचित है। अपने बेडरूम में बैठकर हम चाहते तो हैं कि ये काम हो जाए, वो हो जाए। समाज ये करे, वो करे। नेता अमुक करें, तमुक करें ताकि समाज की तस्वीर बदले, देश में क्रांति हो पर हम खुद कभी कुछ नहीं करना चाहते। हम करना चाहते हैं तो केवल पलंग पर बैठकर फेसबुक-व्हॉट्सऐप लाइक या डिसलाइक। बल्कि, कुछ को तो यह करने में भी परहेज है ताकि कहीं कोई नाराज न हो जाए, कहीं कोई विवाद न फंस जाए, कोई जिम्मेदारी ही माथे न पड़ जाए या कहीं उनके मन का कोई काम ही न रुक जाए। अलबत्ता, ये ‘गुडी-गुडी’ लोग तो लाइक करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते। बशर्ते वे चाहते जरूर हैं कि क्रांति आए पर क्रांतिकारी बगलवाले के घर में पैदा हो और जब वो पैदा हो भी जाए तो उसको अपराधबोध कराने में कोई कसर न छोड़ी जाए।
ऐसे लोगों पर आज समाज ही नहीं, बल्कि संस्कृति और हमारी सनातन परंपरा भी शर्मिंदा होगी। शायद उन्हें बनानेवाले को भी पछतावा हो रहा हो कि मैंने इन्हें आखिर मानव योनि में जन्म ही क्यों दिया? जहां एक शाकाहारी हिरण या बंदर किसी मांसाहारी लावारिस शावक या गोरिल्ला के बच्चे को पालता हो, जहां एक बकरी भी अनाथ बछड़े को दूध पिलाती हो, ताकि वो जी सके। उस समाज में हम घरेलू जानवरों के वजूद तक को सहन करने को तैयार नहीं। जबकि यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है, न कि किसी की व्यक्तिगत। इसलिए आज समय है अपने अंतर्मन में झांककर देखने का कि हमने सृष्टि का घटक होने के नाते अपनी सामाजिक व नैतिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए जैविक चक्र को जिंदा रखने के लिए क्या योगदान दिया है? खाना-पीना और नित्यकर्म तो जानवर भी करते हैं पर उससे हटकर हमने विशेष क्या किया है? पिछली पीढ़ी से हमने क्या सीखा और अगली पीढ़ी को हम क्या सिखा रहे हैं? हम संस्कारों को भुलाकर उन्हें केवल स्वार्थ क्यों सिखा रहे हैं? हमें शुक्र मनाना चाहिए कि ऊपरवाले ने हमें इंसान का जन्म दिया। इसलिए इंसानियत के नाते भी हमें अपना फर्ज निभाना है। अन्यथा हम पुनर्जन्म में भी कहीं उन्हीं जीवों में अपने जीवन की जालिम जद्दोजहद न खोज रहे हों।
आज इस लॉकडाउन में भी तमाम लोग और संस्थाएं आवारा पशुओं और जरूरतमंदों की सेवा में तन, मन, धन और जी-जान से जुटी हैं। इसकी परवाह किए बिना कि बदले में उन्हें बीमारी मिलेगी या मुसीबत! क्योंकि वे जानवरों का महत्व समझते हैं। हमारी सरकारें भी यह जानती हैं इसलिए वे इसके लिए समय-समय पर योजनाएं लागू करती रहती हैं। सरकारें तक जानवरों के लिए शेल्टर, खानपान और चिकित्सा की व्यवस्था उपलब्ध कराने का काम करती हैं क्योंकि जीव प्रेमियों, खासकर जैनधर्मियों का इसे लेकर विशेष आग्रह होता है। सरकारें ऐसे जानवरों को मारती नहीं, बल्कि उनका स्टरलाइजेशन करती हैं। खैर, बिल्ली की जेर (बच्चे के जन्म पर निकलनेवाली पतली-सी झिल्ली) सभी को चाहिए, ताकि उसे तिजोरियों में रखकर लक्ष्मीपति बन सकें, पर उसे जननेवाले की जरूरत किसी को नहीं है। जेर मिल गई तो वही बिल्ली उनके लिए अलक्ष्मी का प्रतीक हो गई। कोई जानवर शुभ-अशुभ नहीं होता। ये अंधविश्वास है। भगवान ने सृष्टि की रचना में आवश्यक जानवर को ही जगह दी है। इसलिए जब हम भगवान में विश्वास करते हैं तो उनकी रचना पर अंधविश्वास स्वीकार नहीं किया जा सकता। यही धर्म है और यही उसके अलिखित-अमिट आध्यात्म का अध्याय। कुल मिलाकर, खुद बाढ़ की तकलीफ में होने के बावजूद समाज के समझदार व निचले तबके ने असहाय और जरूरतमंदों के लिए हर संभव हाथ बढ़ाए, दिक्कतें झेलीं पर इंसानियत नहीं छोड़ी। परहित का फर्ज निभाया। परंतु इस बीच ज्यादा दिक्कतें पेश आर्इं तो आलीशान इमारतों में सूकून से रहनेवाले चंद लोगों को। वे किसी को बचाना तो दूर मारने की मानसिकता से ग्रसित दिखे। समाज में खुद को सभ्य, सुसंस्कृत एवं शिक्षित बतानेवालों के बेतुके तर्क सामने आए। ऐसे में सवाल यह उठते हैं कि आखिर हम जा कहां रहे हैं? हम खुद को सभ्य कहते हैं पर हमारी सोच कितनी ‘असभ्य’ है। हम खुद को इंसान कहते हैं, परंतु हमारी प्रवृत्ति खुद पशुओं वाली है। हम खुद को धार्मिक कहलवाना पसंद करते हैं पर अंदर से कितने अधार्मिक हैं। हम खुद को हिंदू मानते हैं, पर संस्कारों से हम कितने अहिंदू हो रहे हैं। लिखने को इस विषय पर बहुत कुछ है पर समाज के इस संवेदनाहीन और स्वार्थी वर्ग पर इससे ज्यादा शब्द खर्च करना उचित नहीं।
अंत में बस इतना ही कि भगवान महावीर स्वामी का संदेश भी यही है कि हर किसी को चाहिए कि वो जीवों पर दया करे और सत्कर्म करे। तमाम धर्मों में जीवदया का मंत्र दिया गया है। अगर हम जीवों पर दया नहीं करेंगे और गलत कार्यों में लिप्त रहेंगे तो इसका परिणाम भी हमें इसी धरती पर और यहीं मिलना तय है। सिर्फ व्रत-उपवास करने या फोटो में देवी-देवताओं को उनके वाहनों सहित पूजने से मनोरथ पूर्ति नहीं होती। उनकी पूर्ति होती है असल धरातल पर जीवहित के उद्देश्यों की पूर्ति से। उसके व्रत संकल्प का पालन करने से। इसलिए खुद दिन भर भूखे-प्यासे रहकर व्रत करने से भगवान प्रसन्न नहीं होंगे। भगवान प्रसन्न होंगे तो किसी भूखे-प्यासे बेसहारा को सहारा देने से। उसका पेट भरने से। यही इंसानियत है और धर्म-आध्यात्म का सच्चा व्रत भी…!