" /> फडणवीस संतुष्ट! और क्या चाहिए?

फडणवीस संतुष्ट! और क्या चाहिए?

राज्य के विरोधी दल नेता देवेंद्र फडणवीस आज भी उतने ही युवा और जुझारू आदि हैं, जितने कि वे मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए थे। फडणवीस का एक भावनात्मक और दिल को छू लेनेवाला बयान आया है। फडणवीस ने अपने खास सहयोगी गिरीश महाजन से निवेदन किया, ‘गिरीश, अगर मुझे कोरोना आदि कुछ हो गया तो एक काम करना, कुछ भी हो जाए, मुझे सरकारी अस्पताल में ही भर्ती करना।’ फडणवीस की इस भावना की वाहवाही के बजाय टीका हो रही है और खिल्ली उड़ाई जा रही है। यह ठीक नहीं है। फिलहाल सोशल मीडिया के ‘ट्रोल’ भैरवों में दो टोलियां या गुट बन चुके हैं और ये दोनों गुट एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोंके खड़े रहते हैं। सरकारी पक्ष बनाम विरोधी पक्ष का यह आमना-सामना एक शाब्दिक युद्ध में तब्दील हो जाता है। फडणवीस के भावनात्मक बयान पर यही होता दिख रहा है। फडणवीस का हमेशा कहना रहता है कि उन्हें ‘सामना’ से कभी शाबाशी नहीं मिलती। उनका ऐसा कहना अर्ध सत्य है। फडणवीस ने दावा किया कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए उन्होंने कभी ‘सामना’ नहीं पढ़ा। इसलिए हो सकता है उनकी प्रशंसा के क्षण उन्होंने गवा दिए हों। मराठी की सुप्रसिद्ध कहावत है ‘वाचाल तर वाचाल’। ‘सामना’ छोड़कर फडणवीस कुछ और पढ़ रहे होंगे और इसी कारण से अब विरोधी पक्ष नेता के रूप में उन्हें नियमित रूप से ‘सामना’ पढ़ना पड़ रहा है। फडणवीस विरोधी दल नेता के रूप में उत्तम कार्य कर रहे हैं, इस स्तंभ में हमने ऐसा कई बार कहा है। क्या यह प्रशंसा नहीं है? यह तो सबसे बड़ी शाबाशी है। कोविड मामले में सरकारी तंत्र कैसे काम कर रहा है, उसे कहां काम करना चाहिए और कहां कमियां हैं? इसके लिए विरोधी दल नेता राज्य भर का दौरा कर रहे हैं। विरोधी दल नेता के पहुंचने के कारण प्रशासन गतिशील हो जाता है, ऐसा हमारा अनुभव है। फडणवीस कई अस्पतालों में कोरोना सुविधा केंद्र का दौरा करते हैं और सरकार पर अपनी तोप दागते हैं। इससे प्रशासन की दौड़भाग शुरू हो जाती है। कुल मिलाकर, सरकार ने जो काम किए, इस संदर्भ में फडणवीस पूरी तरह से संतुष्ट हैं और भविष्य में यदि उन्हें कोरोना हो ही गया तो किसी निजी अस्पताल में न भेजते हुए, सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने का ‘विल’ अर्थात इच्छापत्र उन्होंने गिरीश महाजन को सौंप दिया है। कुछ लोगों को यह भी फडणवीस का एक ‘स्टंट’ लग रहा है लेकिन उन्होंने अपनी सहज भावना व्यक्त की है। इसे स्टंट कहना ठीक नहीं। हालांकि, उनकी इस भावना की कद्र करनी चाहिए और समस्त महाराष्ट्रीय जनता को उनकी पीठ थपथपानी चाहिए। फडणवीस सत्ताधीश रह चुके हैं, इसलिए सरकारी तंत्र क्या था, क्या है? इसकी समझ उन्हें है। विरोधी दल के रूप में आरोप लगाना उनका अधिकार है। तुकाराम ने कहा ही है ‘निंदकाचे घर असावे शेजारी!’ हम तो इसके भी आगे जाकर कहते हैं, ‘निंदकाचे घर आपल्या उंबरठ्यावरच, अंगणात असावे’। ऐसा संत कबीर कहते हैं।
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय
बिन पानी साबुन बिना निर्मल रे सुभाय!
कबीर इस दोहे में जो कहते हैं, यही हमारे लोकतंत्र का मर्म है। जो हम पर आरोप लगाता है, उससे द्वेष मत करो। उसको अपने करीब रखो। बिना पानी और साबुन के वह हमारा मन साफ करता रहता है। साबुन से शरीर स्वच्छ हो सकता है लेकिन विरोधियों के आरोप से मन और कार्य स्वच्छ होगा, इस उदात्त विचार से ही महाराष्ट्र का विरोधी दल काम कर रहा है। फडणवीस के आरोपों और शाब्दिक तोपों को सकारात्मक दृष्टि से देखा जाए तो अच्छा होगा। हमारी ईश्वर चरणों में प्रार्थना है कि श्री फडणवीस को कोरोना न हो, वे निरोगी रहें और दीर्घायु हों। उनके बाल-बच्चे और राजनीतिक बगलबच्चे भी सुखी रहें। विरोधी दल नेता ने राज्य के डॉक्टरों और परिचारिकाओं पर विश्वास व्यक्त किया। उन्हें कुछ हो जाने पर सरकारी तंत्र उन्हें सुरक्षित रखेगा, उनका ऐसा आत्मविश्वास, सरकार और हजारों कोरोना पीड़ितों को बल देने वाला है। इसके लिए विरोधी दल नेता देवेंद्र फडणवीस की जितनी प्रशंसा करें, कम है। उनकी प्रशंसा करनी ही चाहिए। विरोधी दल नेता संतुष्ट हैं। उन्होंने अपनी भावना खुलकर व्यक्त की है। राज्य के स्वास्थ्य तंत्र को और क्या चाहिए?