" /> किसान और खालिस्तान

किसान और खालिस्तान

किसान आंदोलन में विशेषकर पंजाब सहित उत्तर भारत के कुछ हिस्सों के किसान शामिल हैं। आंदोलित किसान इस बार आर-पार के मूड में दिखाई पड़ते हैं। गुस्से में हैं, आक्रोशित हैं। अब उन्हें आश्वासन नहीं, लिखित में गारंटी चाहिए। आंदोलन की तपिश प्रधानमंत्री कार्यालय तक जा पहुंची है। सरकार किसी भी तरह से आंदोलन को खत्म करवाना चाहती है। इसके लिए उनकी टीम सक्रिय है। आंदोलन के खिलाफ दुष्प्रचार भी किया जाने लगा है। मूवमेंट को खालिस्तान से जोड़ रहे हैं, पाकिस्तान का समर्थन होना बताया जा रहा है। हालांकि ये सब तरकीबें सुनियोजित ढंग से की जा रही हैं। किसान मौजूदा हुक़ूमत से अपना वाजिब हक मांग रहे हैं। सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों को लेकर जो विरोध हो रहा है वह साधारण लोगों के लिए तो क्या कृषि विशेषज्ञों व प्रगतिशील किसानों के लिए भी समझ से परे है।

किसानों के अड़ियल रवैये ने केंद्र सरकार को इस दफे भयंकर मुश्किल में डाल दिया है। मोदी कार्यकाल में इससे पहले भी कई आंदोलन हुए, दिल्ली का शाहीन बाग जैसा बड़ा आंदोलन भी शामिल है, लेकिन जितनी मुश्किलें मौजूदा किसान आंदोलन ने बढ़ाई हैं, उतना किसी दूसरे मूवमेंट ने नहीं? आंदोलन की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार सकते हैं, कैसे मूवमेंट को रोका जाए, कुछ समझ में नहीं आ रहा। अरविंद केजरीवाल आंदोलनकारी किसानों का खुलकर समर्थन कर रहे हैं, हर संभव सुविधाएं मुहैया करा रहे हैं। इसको देखते हुए भी केंद्र की हुक़ूमत की सांसें फूली पड़ी हैं।
किसान राजधानी में न घुसे इसको लेकर तमाम कोशिशें हुर्इं। आंदोलनकारियों को दिल्ली की सीमा पर रोके जाने पर किसानों और सुरक्षा कर्मियों के बीच झड़पें भी हुर्इं। किसानों ने रोकने की तमाम कोशिशों को नाकाम कर दिया। सड़कों पर लंबा जाम और उनके आक्रामक रुख को देखते हुए पुलिस भी इस बार ज्यादा सख्ती नहीं दिखा रही, उन्हें आगे बढने दिया। तभी आनन-फानन में केंद्र सरकार को फैसला लेना पड़ा और आदेश देना पड़ा कि किसानों को दिल्ली में घुसने दिया जाए, उनके लिए जगह निर्धारित की। हालांकि इस बार सरकार किसानों से बात करने को भी राजी हुई है। लेकिन किसान इस बार चालफेरी में नहीं आने वाले, आश्वासन से शांत नहीं होंगे।
सरदार वीएम सिह और राकेश टिकैत जैसे बड़े किसान नेता मन बनाकर मैदान में कूदे हैं। केंद्र से पारित तीनों नए क़ानूनों को निरस्त कराकर सभी फसलों पर वह एमएसपी की गारंटी चाहते हैं। लेकिन उनकी सभी मांगे केंद्र सरकार मान लेगी, ऐसा लगता नहीं? सरकार को लगता है कि तीनों नए कानून किसानों के हित में हैं, जबकि किसान अहित बता रहे हैं। इसलिए ये मसला इतनी जल्द सुलझने वाला नहीं, लंबा खिंचेगा। दिल्ली आंदोलनकारियों से चारों तरफ से घिरी हुई है। दूध और सब्जियों की आवाजाही किसानों ने बंद कर दी है। फुल तैयारी के साथ इस बार किसान सड़कों पर उतरे हैं। मरने-मारने पर उतारू हैं। उनके रूख को देखते हुए, तैनात सुरक्षाकर्मी भी घबराए हैं। मूवमेंट पर केंद्र सरकार की पैनी नजर बनी है।
बहरहाल, बीते छह-सात वर्षों में किसानों ने भारत के कई हिस्सों में ढाई सौ के करीब छोटे-बड़े आंदोलन किए, लेकिन नतीजा शून्य रहा। केंद्र सरकार की तरफ से हर बार किसानों को मात्र आश्वासन का लॉलीपॉप दिया जाता रहा, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता सरकार अपने वायदे से मुकरती गर्इं। लोकसभा चुनाव में किसानों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादा किया था, उनकी सरकार आते ही सबसे पहले किसानों को उनकी फसलों पर एमएसपी लागू करेगी। पर, धरातल की सच्चाई ये है इस वक्त किसान धान बेचने के लिए मंडियों में मारे-मारे फिर रहे हैं। धान पर केंद्र सरकार द्वारा तय कीमत नहीं मिल रही। किसान मजबूरन आधे कीमतों पर दलालों के हाथ अपना अनाज बेच रहे हैं। फसलों पर सरकार की एमएसपी को लेकर वादा खिलाफ और कृषि सुधार अधिनियम के खिलाफ एक बार फिर किसान सड़कों पर हैं। बड़ा आंदोलन खड़ा किया हुआ है।
केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों के विरूद्ध देशभर के अन्नदाताओं का आंदोलन दिल्ली में कई दिनों से जारी है। हजारों-लाखों की संख्या में प्रदर्शनकारी किसान दिल्ली के सिंधु और टिकरी बॉर्डर पर डटे हैं। आंदोलन में विशेषकर पंजाब सहित उत्तर भारत के कुछ हिस्सों के किसान शामिल हैं। आंदोलित किसान इस बार आर-पार के मूड में दिखाई पड़ते हैं। गुस्से में हैं, आक्रोशित हैं। अब उन्हें आश्वासन नहीं, लिखित में गारंटी चाहिए। आंदोलन की तपिश प्रधानमंत्री कार्यालय तक जा पहुंची है। सरकार किसी भी तरह से आंदोलन को खत्म करवाना चाहती है। इसके लिए उनकी टीम सक्रिय है। आंदोलन के खिलाफ दुष्प्रचार भी किया जाने लगा है। मूवमेंट को खालिस्तान से जोड़ रहे हैं, पाकिस्तान का समर्थन होना बताया जा रहा है। हालांकि ये सब तरकीबें सुनियोजित ढंग से की जा रही हैं।
किसान मौजूदा हुक़ूमत से अपना वाजिब हक मांग रहे हैं। सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों को लेकर जो विरोध हो रहा है वह साधारण लोगों के लिए तो क्या कृषि विशेषज्ञों व प्रगतिशील किसानों के लिए भी समझ से परे है। कुछ राजनीतिक दल व विघ्नसंतोषी शक्तियां अपने निजी स्वार्थों के लिए किसानों को भड़का कर न केवल अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं बल्कि वह खुद नहीं जानते कि ऐसा करके वह किसानों का कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं। नए कानून को लेकर भ्रम की स्थिति है। कोई इसमें लाभ बता रहा है तो कोई नुकसान। लेकिन किसान मानने को राजी नहीं। उनका मानना है कि नए कृषि अधिनियम से उनको नुकसान होगा। कहा गया है कि नए कानून के अंतर्गत ऑनलाइन मार्किट होगी, जिसमें किसान अपनी फसल को अपनी मर्जी से कहीं भी बेच सकेगा।
देश भर की अनाज मंडियों में इस बार जो हाल है उससे ये वादा नाकाफी सा लगता है। पूरे देश में धान की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य में धांधली के धुंधले बादल छाए हुए हैं। मंडियों के बाहर किसान कई दिनों से अपना धान लिए बैठे हैं, तौलाई नहीं हो रही है और न ही समय पर भुगतान हो रहा। बहरहाल, इस समय किसान आंदोलन को पूरे देश से ज़बरदस्त समर्थन मिल रहा है। सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार को लोग कोस रहे हैं, आलोचना कर रहे हैं। सरकार के खिलाफ उमड़े जनाक्रोश को देखते हुए मूवमेंट को बदनाम करने की भी तरकीबे हो रही हैं। हास्यस्पद बात ये है कि आंदोलन को खालिस्तान से जोड़ रहे हैं। भाजपा की आईटी टीम इस खेल में सक्रिय है। सोशल मीडिया पर वह आंदोलन के खिलाफ दुष्प्रचार कर रही है। आंदोलन के पीछे कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों का हाथ बताने में लगी है।
(लेखक राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान, भारत सरकार के सदस्य, राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)