" /> कोरोना : डरना जरूरी है!

कोरोना : डरना जरूरी है!

दुनियाभर में कोरोना के कहर को तकरीबन ७ महीने बीत चुके हैं। इस बीच किसी दिन कोई उम्मीद की किरण नजर भी आती है, तो दूसरे ही क्षण कोई खबर उस पर पानी फेर देती है। उम्मीदों पर पानी फेरनेवाली ऐसी ही एक खबर आई है कि कोरोना वायरस हवा से भी पैâल रहा है। वैसे शुरुआती दौर में भी ऐसे कयास लगाए जा रहे थे पर तब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे सिरे से खारिज कर दिया था। हालांकि, अब एक बार फिर दुनिया के ३२ देशों के २३९ वैज्ञानिकों ने इसका पुख्ता दावा किया है और इसे लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन को पत्र भी लिखा है, ताकि ‘कोविड-१९’ को लेकर आवश्यक गाइड लाइन्स में बदलाव किया जा सके। वैज्ञानिकों के नए दावे में कितना दम है? यह तो विस्तृत अध्ययन के बाद ही तय होगा और तब उस पर कोई पैâसला भी हो सकेगा, लेकिन एक बात तो सच है कि वुहान में मिले इस वायरस को हम जितना गंभीर और घातक मान रहे थे, ये उससे कहीं ज्यादा क्रूर हो सकता है। इसे समझने के लिए मोटा-मोटी दो तथ्यों को समझने की जरूरत है। एक वायरस और दूसरा उसकी कार्य पद्धति।
पहला तथ्य: वुहान
वायरस को समझने के लिए हमें एक सदी पीछे यानी १९१८ में चलना होगा। जब स्पेनिश फ्लू (इन्फ्लूएंजा) ने दुनिया पर पहला अटैक किया था, जिसमें तकरीबन ८ से १० करोड़ जानें गई थीं। कहते हैं कि प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर जून, १९१८ में सैनिकों को लेकर एक जहाज हिंदुस्थान पहुंचा था, जिसमें सवार कुछ जवान पहले से ही इन्फ्लूएंजा से पीड़ित थे। वहीं से इस बीमारी ने हिंदुस्थान में पहला कदम रखा और फिर अगस्त का महीना आते-आते वो पूरे देश में पैâल गई। वह हिंदुस्थान में स्पेनिश फ्लू के पहले चरण की शुरुआत थी। स्पेनिश फ्लू ने तब तीन से चार चरणों में मानव जाति को निशाना बनाया था, जिसमें १९१८ के अंत से १९१९ तक उसका दूसरा व तीसरा चरण काफी घातक रहा था। स्पेनिश फ्लू का चौथा चरण आते-आते इंसानी शरीर की प्रतिरोधक शक्ति खुद ही इतनी विकसित हो चुकी थी कि १९२० तक उसका हमला काफी कमजोर पड़ने लगा।
स्पेनिश फ्लू और आज का दौर…
कुछ रिपोर्टस की मानें तो आज हम सही मायने में कोरोना वायरस के पहले चरण में ही हैं। संभवत: १९१८ वाली स्थिति में। जानकारों का दावा है कि अभी इसका दूसरा और तीसरा चरण आना बाकी है। मतलब १९१९ वाली वो स्थिति अभी नहीं आई है। यह बात डराती जरूर है परंतु उतना नहीं, जितना स्पेनिश फ्लू ने दुनिया को डराया था। स्पेनिश फ्लू के दौर और आज के दौर में काफी अंतर है। आज हम एंटीबायोटिक्स के जमाने में हैं। उस दौर की तुलना आज से इसलिए भी नहीं की जा सकती क्योंकि तब हमारा विज्ञान किसी वायरस को समझने लायक विकसित ही नहीं था। तब हमें किसी वायरस की प्राथमिक समझ तक नहीं थी। न ही हमने किसी एंटीबायोटिक की कल्पना ही की थी। उस दौर में हम पूरी तरह अपनी अंदरूनी ‘एंटीबायोटिक’ यानी रोग प्रतिरोधक शक्ति पर ही निर्भर थे। परंतु आज हम किसी भी वायरस को समझ सकते हैं और उसकी वैक्सीन भी बना सकते हैं। अब मेडिकल साइंस काफी उन्नत है। हम वायरस और उसके जीनोम को पहचानने का हुनर जानते हैं, उसे समझने का तरीका खोज चुके हैं। इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि आज के युग में कोरोना वायरस का दूसरा चरण, जो संभवत: दुनिया में दस्तक दे चुका है, उतना घातक नहीं होगा जितना स्पेनिश फ्लू के वक्त साबित हुआ था। जहां तक कोरोना के संभावित तीसरे चरण का सवाल है तो आनेवाले वक्त में उससे भी मुकाबला करना आसान होगा, क्योंकि उस चरण के आते-आते हमारे हाथ में इससे लड़ने का कोई-न-कोई ब्रह्मास्त्र यानी वैक्सीन आ चुकी होगी। दुनिया में इसे बनाने की होड़ देखकर तो यही लगता है कि कोरोना की वैक्सीन आगामी कुछ ही महीनों में बनकर तैयार होगी।
किसी वायरस की कार्य पद्धति
दूसरा तथ्य: अब बात करते हैं किसी वायरस की कार्य पद्धति की। किसी वायरस और इंसानी शरीर की लड़ाई को समझने के लिए हम एक उदाहरण ले सकते हैं। फर्ज कीजिए कि दो सेनाओं के बीच युद्ध हो जाता है तो दोनों सेनाओं के नुकसान का पैटर्न क्या होगा? सबसे पहले तो हमलावर सेना, सामनेवाली सेना को नुकसान पहुंचाने में कामयाब होगी, क्योंकि पहला अटैक उसका था। इस अचानक हुए हमले के लिए सामनेवाली सेना तैयार ही नहीं थी। परंतु हमला हो जाने की शक्ल में समय रहते यदि सामनेवाली सेना संभल जाती है और हमलावर सेना की ताकत और हमले को समझकर बराबर का प्रतिरोध करती है तो हमलावर सेना की मारक क्षमता कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में हमलावर सेना के पास क्या विकल्प बचता है? तब हमलावर सेना को नई रणनीति अपनानी होती है, उसे युद्ध भूमि में नए मोर्चे खोलने होते हैं, ताकि वो अपनी विरोधी सेना को ज्यादा नुकसान पहुंचा सके। उसका प्रयास होता है कि दूसरा हमला इतना घातक हो कि सामनेवाली सेना टूटकर बिखर जाए और हथियार डाल दे। परंतु यदि इससे उलट हो जाए और इस बार भी सामनेवाली सेना बराबर का मुकाबला करने में कामयाब रहे। वो हमलावर सेना की हर संभावित रणनीति को पहले से भांपकर उसे हर मोर्चे पर करारा प्रत्युत्तर दे दे तब हमलावर सेना को ही नुकसान उठाना पड़ सकता है। किसी भी युद्ध के दौरान एक-दूसरे को मात देने के लिए दोनों सेनाएं कई बार रणनीतियां बदल-बदलकर हमला करती हैं। इसी को युद्ध का विभिन्न चरण कहा जाता है। इन चरणों के दौरान जिस सेना की रणनीतिक सूझ-बूझ, साहस और मारक क्षमता अधिक होती है वो ही युद्ध में जीतती है, जबकि दूसरे को हार का सामना करना पड़ता है। एक वायरस भी यही कार्य पद्धति अपनाता है, किसी इंसानी शरीर पर आक्रमण करने के लिए। हर वायरस विभिन्न चरणों में युद्ध करता है। पहले चरण में वायरस की सेना, शरीर के भीतर मौजूद रोग प्रतिरोधात्मक सेना पर आक्रमण करती है और उसे ज्यादा-से-ज्यादा नुकसान पहुंचाने का प्रयास करती है। वायरस के अचानक हमले से इंसानी शरीर को शुरुआती दौर में तो अधिक नुकसान होता है, परंतु जब एक बार वो वायरस को समझने लगता है तब उसी के अनुरूप शारीरिक रणनीति में बदलाव करता जाता है। लिहाजा, बार-बार पैटर्न बदलकर वायरस इंसान पर हमला करता है और उसे समझकर इंसानी शरीर प्रतिरोध। वायरस और इंसानी प्रतिरोधात्मक शक्ति शरीर के भीतर एक-दूसरे से ठीक उसी तरह लड़ते हैं जैसे किसी युद्ध क्षेत्र में दो दुश्मन सेनाएं। इसमें जो भारी साबित होता है वो जीतता है और जो कमजोर होता है वो हार जाता है।
कहानी वैक्सीन और वैश्विक सेना की
वायरस और हमारी प्रतिरोधात्मक शक्ति के बीच जारी युद्ध में कोई वैक्सीन ठीक वैसा ही काम करती है, जैसे दो देशों की लड़ाई में अचानक आकर कोई तीसरे देश की सेना या वैश्विक सेनाएं करती हैं। युद्ध की निर्णायक घड़ी में, यदि कांटे की टक्कर चल रही हो तभी बचाव पक्ष के समर्थन में कोई बड़ी सेना आ जाए और हमलावर पर पूरी ताकत से टूट पड़े तो हमलावर सेना का जो हश्र हो सकता है, ठीक वैसा ही वैक्सीन से किसी वायरस का होता है। तब उसके पास हथियार डालने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं बचता। इसीलिए आज पूरी दुनिया कोरोना के खिलाफ एक अदद वैक्सीन की खोज में जुटी है। हालांकि, अभी उसकी राह आसान नहीं दिख रही क्योंकि इस नए वायरस की तीव्रता पहले के वायरसों के कहीं अधिक है। यह बड़ी तेजी से जीनोम करेक्शन कर रहा है। जिससे एक ओर तो शरीर की रोग प्रतिरोधात्मक टीम को उससे लड़ने में दिक्कतें पेश आ रही हैं तो दूसरी ओर वैक्सीन बनानेवालों को उसकी रणनीति समझने में। ताजा स्थिति यह है कि कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और जीनोम की रिमोट ट्रैकिंग से वैज्ञानिकों ने कोविड-१९ के संक्रमण फैलने की तेजी और तरीकों का पता तो लगा लिया है, परंतु गत ७ महीनों की खोज के बावजूद वे यह नहीं जानते कि कोरोना का अगला हमला कब, कहां और कैसा होगा? वायरस के जीनोम को पूरा समझे बिना ऐसा कर पाना मुश्किल है। संक्रमितों के तमाम नमूनों से पता चला है कि वायरस में कई बदलाव हुए हैं। अधिकांश सैंपल से वायरस के जीनोम के बदलावों का पता चलता है। अभी वैज्ञानिक उसकी टाइमलाइन तैयार करने में जुटे हैं, ताकि उसकी एक कारगर तोड़ बन सके। इसलिए जब तक ये तोड़ हाथ नहीं लग जाती तब तक कोरोना से डरना जरूरी है। यही बात तमाम देशों की सरकारें अपने नागरिकों को समझा रही हैं।
ठप पड़ी दुनिया बहुत कुछ कहती है
आमतौर पर कोई वायरस या तो काफी संक्रामक होता है या फिर बहुत घातक। कोरोना वायरस दोनों ही मामलों में बेहद खतरनाक है। कोरोना एक-दूसरे के संपर्क में आने से तेजी से संक्रमण भी फैलाता है और फिर देखते-ही-देखते एक जानलेवा बीमारी में भी तब्दील हो जाता है। इसके संक्रमितों में मामूली या नहीं के बराबर लक्षण होने पर भी वो किसी के संपर्क में आने पर घातक हो सकते हैं। फिलहाल विशेषज्ञ इसकी इसी गुत्थी को गहराई से समझकर कोविड-१९ की वैक्सीन खोजने की दिशा में बढ़ रहे हैं। हालांकि कल को उनके हाथ कोई वैक्सीन लग भी गई तब भी हम बिल्कुल निश्चिंत नहीं हो सकते, क्योंकि एक बार जो वायरस दुनिया में आता है तो उसके पूरी तरह खत्म होने की संभावना कम ही होती है। वो किसी तरह हमारे इकोसिस्टम का हिस्सा बन ही जाता है। किसी-न-किसी बायोलॉजिकल मटेरियल में जिंदा रहता है और जब कभी उसे मौका मिलता है तब वो घात करने से नहीं चूकता। कभी स्वाइन फ्लू को लेकर भी दावे किए जाते थे कि उसे जल्द ही खत्म कर दिया जाएगा पर आज तमाम वर्ष बीत गए, वो अब भी मौजूद है और बीच-बीच में हम पर हमला करता ही रहता है। इसी तरह पोलियो, टीबी, चेचक इन सभी बीमारियों से हम लड़ रहे हैं। खैर, जो दुनिया कभी एक मिनट के लिए भी ठप नहीं पड़ती थी, चौबिसों घंटे दौड़ती रहती थी, वो आज महीनों से थमी पड़ी है। तमाम देशों में ४-६ महीनों से लॉकडाउन है और आनेवाले समय में वो कब तक जारी रहेगा, कहा नहीं जा सकता। इसी से इस वायरस की गंभीरता को समझा जा सकता है। सरकारें पैनिक नहीं क्रिएट किया करतीं, लिहाजा लॉकडाउन धीरे-धीरे परिस्थिति के आधार पर बढ़ाए जा रहे हैं। कुल मिलाकर पते की बात इतनी ही कि यह साल सरवाइवल का है इसे याद रखें। यह निकल गया तो रिवाइवल के लिए आनेवाले तमाम साल पड़े हैं। इसलिए जब तक वैक्सीन नहीं आ जाती, हमें कोरोना से लड़ने का कोई कारगर अस्त्र नहीं मिल जाता तब तक सचेत रहें, सावधान रहें। सेहत का खयाल रखें और अपनी आर्थिक निरंतरता को बनाए रखें। इसी में समझदारी है और इसी में आपकी और सबकी भलाई भी।