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अदालत से आधार तक!

अयोध्या में श्री राममंदिर निर्माण का भूमिपूजन ५ अगस्त को होने जा रहा है। इस दिन को देखने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है। मामला निचली अदालतों में चलते-चलते हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था। देश ही नहीं वरन यह मामला पूरी दुनियाभर में चर्चित हो गया था। पूरे विश्व की निगाहें इस पर थीं, पर कहते हैं कि सत्य की हमेशा विजय होती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी पैâसले में सत्य पर मुहर लगाते हुए राममंदिर निर्माण का आदेश दे दिया। मतलब साफ है कि अदालत से आधार (नींव) रखे जाने तक का सफर बड़ा पेचीदा था। देश की सर्वोच्च न्यायालय में हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों ने क्या-क्या प्रमुख बातें रखी थीं, जिसके आधार पर ही न्यायाधीशों ने पैâसला सुनाया था। इन्हीं मुद्दों पर पेश है `दोपहर का सामना’ की विशेष रिपोर्ट-
४ प्रमुख मामले थे
अयोध्या विवाद में चार मुख्य मामले थे। पहला केस १९५० में गोपाल सिंह विशारद ने दाखिल किया, जिसमें जन्मस्थान से मूर्तियां हटाने पर स्थायी रोक की मांग की गई थी। ये मामले पैâजाबाद की जिला अदालत में दाखिल हुए और फिर हाईकोर्ट में चले। जन्मभूमि मामले में सीधे इलाहाबाद हाईकोर्ट के पैâसले के बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी। १९५९ में निर्मोही अखाड़े ने प्रबंधन और पूजा का अधिकार मांगते हुए केस किया था। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने १९६१ में अपने केस में मालिकाना हक और कब्जा मांगा था। १९८९ में रामलला विराजमान की तरफ से मामला दाखिल किया गया था।

३ हिस्से में आया था हाईकोर्ट का  फैसला
३० सितंबर, २०१० को इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने पैâसला सुनाया था। बहुमत से दिए फैसले में राम जन्मभूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश था। जहां रामलला विराजमान हैं वह हिस्सा रामलला को दिया था। दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को और तीसरा हिस्सा मुसलमानों को दिया गया था। एक जज ने पूरी जमीन रामलला को दी थी और बाकी मामले खारिज कर दिए थे।

१४ अपीलें हुर्इं थीं दायर
मूलवाद के हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्षों की ओर से १४ अपीलें सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुर्इं थीं।
अहम कड़ी थी एएसआई की रिपोर्ट
हर मामले का एक अहम सुराग होता है। वैसे ही राम जन्मभूमि केस की महत्वपूर्ण कड़ी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की खुदाई रिपोर्ट थी। एएसआई ने हाईकोर्ट के आदेश पर खुदाई की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, विवादित ढांचे के ठीक नीचे एक बड़ी संरचना मिली जो उत्तर भारत के मंदिरों जैसी है। यहां १०वीं शताब्दी से लेकर ढांचा बनाए जाने तक लगातार निर्माण हुआ था। १०वीं शताब्दी से पहले उत्तर वैदिक काल तक की प्रतिमाओं और अन्य चीजों के अवशेष मिले थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एएसआई की रिपोर्ट कोई साधारण राय नहीं है। हाईकोर्ट के जज के कहने पर खुदाई की गई थी
क्या थी हाईकोर्ट के पैâसले के खिलाफ अपील और दलील
हिंदू पक्ष
हाईकोर्ट के पैâसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में हिंदू पक्ष ने अपना जोरदार पक्ष रखते हुए कहा था कि उच्च न्यायालय ने ये तो माना कि विवादित भूमि में वह हिस्सा शामिल है, जिसे राम जन्मस्थान माना जाता है लेकिन पूजा का अधिकार नहीं दिया। ये बात विरोधाभासी है। मूर्ति हटाने पर स्थाई रोक लगाए बगैर पूजा का अधिकार बेमानी। यह धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
दूसरी बात जो हिंदू पक्ष ने रखी थी, वह काबिले गौर थी। उनका कहना था कि हिंदू पूरी भूमि को देवता मानते हैं और देवता पर बंटवारे का नियम नहीं लागू होगा। हाईकोर्ट का जमीन का बंटवारा करने का बहुमत का पैâसला सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न पैâसलों में दी गई देवता की अवधारणा के खिलाफ है।
मुस्लिम पक्ष
मुस्लिम पक्ष का कहना था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य गुंबद के नीचे भगवान राम का जन्मस्थान कहा है जबकि इसका कोई सुबूत नहीं था। यह कहना गलत है कि १९४९ के पहले दशकों से मस्जिद परिसर में हिंदू और मुसलमान दोनों का संयुक्त कब्जा था। एएसआई रिपोर्ट में कहीं यह नहीं कहा गया कि मंदिर ढहाकर मस्जिद बनाई गई थी।
मुस्लिम पक्ष का दूसरा तर्क यह दिया गया था कि हाईकोर्ट यह समझ नहीं पाया कि संविधान के अनुच्छेद २५ और २६ में सभी लोगों की आस्था और विश्वास को समान संरक्षण मिला है। मालिकाना हक आस्था और विश्वास के आधार पर तय नहीं हो सकता।

शिया वक्फ बोर्ड था हिंदुओं के समर्थन में
उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में हिंदुओं के मुकदमे का खुल कर समर्थन किया था। बोर्ड ने कहा था कि हिंदू देवता कानून की निगाह में कानूनी व्यक्ति होते हैं लेकिन अल्लाह कानूनी व्यक्ति नहीं होते। जब अल्लाह ज्यूडीशियल पर्सन नहीं तो सुन्नी वक्फ बोर्ड प्रतिकूल कब्जे का दावा वैâसे कर सकता है? बोर्ड के पैâसले का हिंदुओं ने दिल खोलकर स्वागत किया था। बोर्ड हमेशा से श्रीराममंदिर बनाने का पक्षधर था।

सुप्रीम कोर्ट में हिंदू पक्ष
श्रीरामजन्मभूमि का मामला कई वर्षों तक अदालतों में चलता रहा। हिंदू-मुस्लिम दोनों ही पक्षों के अधिवक्ता अपनी-अपनी दलीलें देते रहे। विभिन्न प्रमाण भी प्रस्तुत किए थे। अंत में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। हिंदू पक्ष की तरफ से पेश किए गए समस्त प्रमाणों के आधार पर ही सुप्रीम कोर्ट ने राममंदिर के पक्ष में पैâसला सुनाया था। हिंदू पक्ष की तरफ से रखी गई प्रमुख बातें-
हिंदू पक्ष ने कहा था कि भगवान नाबालिग माने जाते हैं और नाबालिग की संपत्ति छीनी नहीं जा सकती। राम जन्मस्थान स्वयं देवता है, उसे स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।
६ दिसंबर, १९९२ को जो ढांचा ढहाया गया था, उसे इस्लामिक कानून के मुताबिक मस्जिद नहीं माना जा सकता। मस्जिद के लिए जरूरी शर्त है कि इसका वाकिफ जमीन का मालिक होना चाहिए जबकि बाबर मालिक नहीं था। वह कभी अयोध्या नहीं गया। मस्जिद में किसी तरह की मूर्ति, चित्र या जीवित चीज अथवा जानवर, फूल, पत्ती मूर्तियां आदि नहीं होतीं जबकि जन्मस्थान पर देवताओं की मूर्तियां थीं।
हिंदू पक्ष ने खुदाई में मिले अवशेषों को बड़े तार्किक ढंग से पेश करते हुए कहा था कि एएसआई की खुदाई में मिले अवशेष भी वहां मंदिर होने की पुष्टि करते हैं। विवादित ढांचे के नीचे मंदिर जैसी विशाल संरचना मिली है। खुदाई में कलश, कमल और देवी-देवताओं की मूर्तियां थीं, जिससे साबित होता है कि वहां पहले मंदिर था जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई और मंदिर की सामग्री का प्रयोग मस्जिद बनाने में हुआ।
हिंदू पक्ष का कहना था कि हिंदू वृक्ष, पहाड़, सूर्य, नदी सभी की पूजा करते हैं और उन्हें देवता मानते हैं। दुनिया में खोजे गए सबसे छोटे कण को भी गॉड पार्टिकल कहा गया है। वहां भगवान राम का जन्म हुआ था इसलिए वह स्थान स्वयं में देवता है और उसे न्यायिक व्यक्ति माना जाए।
हिंदू पक्ष ने मजबूती के साथ अपनी बात रखते हुए कहा था कि भगवान राम ने अयोध्या में ही जन्म लिया था और उसी जगह राम जन्मस्थान है यह साबित करने के लिए ऐतिहासिक, दस्तावेजी और पुरातात्विक सबूत पेश किए गए थे।
बाबरी शब्द पहले नहीं था। १९वीं शताब्दी में पहली बार इसे बाबरी मस्जिद कहा गया। इससे पहले बाबरी मस्जिद कहे जाने के दस्तावेजी सबूत नहीं हैं।
मुस्लिम पक्ष कह रहा है कि वहां ईदगाह थी तो क्या मस्जिद ईदगाह को तोड़कर बनाई गई थी।
अयोध्या में बहुत-सी मस्जिदें हैं, जन्मस्थान बदला नहीं जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष
मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ताओं ने भी अपनी दलीलें दीं, साक्ष्य प्रस्तुत कर वहां मस्जिद होने की बात कही थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने नकार दिया। मुस्लिम पक्ष द्वारा पेश की गईं मुख्य बातें-
मुस्लिम पक्ष का कहना था कि ढांचे के नीचे विशाल मंदिर नहीं था। बाबर ने मंदिर तोड़कर मस्जिद नहीं बनाई थी। हिंदुओं ने १९३४ में मस्जिद पर हमला किया, १९४९ में वे जबरन अंदर घुसे, १९९२ में मस्जिद ढहा दी और अब वे लोग कोर्ट से अधिकारों की रक्षा की गुहार लगा रहे हैं।
भगवान राम की ओर से पहली बार केस १९८९ में दायर हुआ, जिसमें पूरी जमीन पर मालिकाना हक मांगा गया। देवता न्यायिक व्यक्ति होता है लेकिन खुद केस नहीं लड़ सकता। जब निर्मोही अखाड़ा सेवादार की हैसियत से मौजूद है तो फिर अलग केस का कोई मतलब नहीं।
अयोध्या में पंचकोसी और चौदह कोसी परिक्रमा को साक्ष्य नहीं माना जा सकता। विदेशी यात्रियों और इतिहासकारों के सुनी-सुनाई बातों पर आधारित।
मुस्लिम पक्ष ने एएसआई की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा था कि एएसआई की खुदाई में कई परतें मिली हैं। अलग-अलग अवशेषों को एक साथ मिलाकर नहीं देखा जा सकता। अवशेषों को एक साथ मिलाकर यह नहीं कहा जा सकता कि ढांचे के नीचे विशाल संरचना थी। एएसआई ने अपारंपरिक तकनीक से खुदाई की। खंडहरों को मंदिर कहना गलत। वहां ईदगाह थी। ये रिपोर्ट विशेषज्ञ राय है न कि सबूत। कमल का फूल और अन्य चित्र सजावट के लिए हैं। इसे इस्लाम के खिलाफ नहीं कहा जा सकता।
हिंदू पक्ष साबित करे कि २२-२३ दिसंबर, १९४९ (जब अंदर मूर्तियां रखी गर्इं थी) के पहले उनका वहां क्या अधिकार था। निर्मोही अखाड़ा बाहर चबूतरे पर पूजा करता था, अंदर नहीं। अंदर मुसलमानों का अधिकार था।
जन्मस्थान को देवता और न्यायिक व्यक्ति बनाना अनुचित। ऐसा होगा तो बाकी पक्षों और धार्मिक विश्वास रखनेवालों के अधिकार खत्म हो जाएंगे।
मुस्लिम पक्ष ने कुछ प्रमाण पेश किए थे। बाबरी मस्जिद के दावे के पक्ष में इमाम के वेतन और १९३४ में हुए दंगे में मस्जिद के कुछ टूटे हिस्से की मरम्मत और मुआवजे से संबंधित कागजात कोर्ट में रखे गए थे।
मुस्लिम पक्ष ने कहा था कि बाबर संप्रभु शासक था और कोर्ट उसके काम का विश्लेषण नहीं कर सकता। संप्रभु शासक जमीन का मालिक होता है और उसके काम को गैरकानूनी नहीं कहा जा सकता।