" /> गुल हुए गिलानी, हुर्रियत से हकालपट्टी

गुल हुए गिलानी, हुर्रियत से हकालपट्टी

दे दिया इस्तीफा घर में हैं नजरबंद

जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक अरसे से हलचल मचानेवाले हुर्रियत कांप्रâेंस के प्रमुख कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी अब हुर्रियत से गुल हो चुके हैं। कल उन्होंने अपना इस्तीफा दे दिया। उन्होंने भले ही इस्तीफा दिया हो मगर यहां चर्चा है कि उनके कमजोर स्वास्थ्य और निष्क्रियता के कारण हुर्रियत से उनकी हकालपट्टी की गई है। जब से कश्मीर में धारा ३७० हटाया गया है तब से गिलानी अपने घर में नजरबंद हैं। हुर्रियत से गिलानी के हकालपट्टी के बाद कश्मीर की सियासत में क्या बदलाव आ सकते हैं, इसको लेकर यहां की राजनीतिक गलियों में चर्चाओं का बाजार गर्म है।

गिलानी के हुर्रियत से नाता तोड़ लिए जाने के बाद क्या कश्मीर में कथित ‘आजादी’ पाने का आंदोलन अपनी मौत मर जाएगा? यह सवाल अब कश्मीर में सबसे बड़ा इसलिए है क्योंकि सईद अली शाह गिलानी को ही आजादी का आंदोलन माना जाता था और अब ९० साल की उम्र में उनके द्वारा हुर्रियत से जाने के बाद यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है। ५ अगस्त, २०१९ के बाद जम्मू-कश्मीर में लगातार बदल रहे सियासी हालात के बीच यह अलगाववादी खेमे की सियासत का सबसे बड़ा घटनाक्रम है। वयोवृद्ध गिलानी, जो इस समय सांस, हृदय रोग, किडनी रोग समेत विभिन्न बीमारियों से पीड़ित हैं, ने कल एक ऑडियो संदेश जारी कर अपने जाने का एलान किया है। इस एलान के बाद कश्मीरी सकते में हैं। खासकर वह तबका जो कश्मीर को आजाद देखना चाहता था या फिर इसे पाकिस्तान के साथ मिलाए जाने के पक्ष में था।

सर्वदलीय हुर्रियत कॉन्प्रâेंस कश्मीर में सक्रिय सभी छोटे-बड़े अलगाववादी संगठनों का एक मंच है। इसका गठन १९९० के दशक में कश्मीर में जारी आतंकी हिंसा और अलगाववादी सियासत को संयुक्त रूप से एक राजनीतिक मंच प्रदान करने के इरादे से किया गया था। कश्मीर में १९९० के दशक की शुरुआत में सक्रिय सभी स्थानीय आतंकी संगठन प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से किसी-न-किसी अलगाववादी संगठन से जुड़े थे।

हुर्रियत की सियासत पर नजर रखनेवालों के मुताबिक कट्टरपंथी गिलानी के खिलाफ हुर्रियत के भीतर बीते कुछ सालों से विरोध लगातार बढ़ता जा रहा था। इसके अलावा वह वर्ष २०१७ से कश्मीर में अलगाववादी सियासत को कोई नया मोड़ देने में असमर्थ साबित हो रहे थे। वह कोई भी बड़ा फैसला नहीं ले पा रहे थे। बीते एक साल के दौरान उन्होंने लगभग चुप्पी साध ली थी। इतना जरूर था कि कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन की नींव रखनेवाले गिलानी के इस कदम के बाद एक तबका कश्मीर में शांति के लौट आने की उम्मीद भी लगाने लगा है। यह सच है कि अब उनकी सेहत भी जवाब देने लगी है।