" /> सरकार तीनों की; संवाद बढ़ना चाहिए!-शरद पवार

सरकार तीनों की; संवाद बढ़ना चाहिए!-शरद पवार

प्रियंका गांधी का घर वापस लेना यह बेहद ओछी हरकत; शरद पवार का हमला

राष्ट्रवादी कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए भाजपा से कभी चर्चा की नहीं। शिवसेना को दूर करके हम सरकार बनाएं यह प्रपोजल उन्हीं का था: लेकिन अब ‘ठाकरे सरकार’ पांच साल चलेगी!

शरद पवार ये देश की राजनीति के ‘पितामह’ हैं। महाराष्ट्र की सरकार बनने के बाद सभी राजनीतिक चाणक्यों के आकलन मिट्टी में मिल गए तब एक सवाल दिल्ली में पूछा गया, ‘आज कल चाणक्य कहां हैं?’ इस पर जवाब था, ‘चाणक्य तो दिल्ली में है। चाणक्य के पिताजी महाराष्ट्र में हैं!’, ऐसे चाणक्य के पितामह ने ‘सामना’ में जोरदार साक्षात्कार देकर पूरे देश में खलबली मचा दी। देवेंद्र फडणवीस के विस्फोट से लेकर चीन की घुसपैठ तक सभी मुद्दों पर शरद पवार जोरदार तरीके से बोले। साक्षात्कार के अंतिम भाग में शरद पवार ने स्पष्ट रूप से फटकारा, ‘प्रियंका गांधी का घर लेना, यह सुसंस्कृति नहीं बल्कि एक ओछी राजनीति है!’

विरोधी विचारों की सरकारें अस्थिर करना यह सत्ता का दुरुपयोग है। ‘ऑपरेशन कमल’ उसी का हिस्सा है लेकिन महाराष्ट्र में वो नहीं चलेगा, ऐसा पवार ने कड़े शब्दों में कहा।
महाराष्ट्र में तीन दलों की सरकार है। तीनों में संवाद रहना महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री ने ये संवाद रखा तो कोई भी ऑपरेशन फेल साबित होगा, ऐसा भी पवार ने कहा।
शरद पवार ने देवेंद्र फडणवीस के सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। भारतीय जनता पार्टी के साथ सरकार बनाने के संदर्भ में हमने कभी भी चर्चा की नहीं। यह प्रपोजल लेकर भाजपा के नेता ही कई बार चर्चा के लिए आए थे।
शरद पवार के साक्षात्कार से राजनीति को गति मिली है। कहां झटका लगा है। साक्षात्कार के अंतिम भाग की शुरुआत में ही पवार ने स्पष्ट किया, ‘सत्ता का दर्प सिर पर चढ़ा तो, मानवता की हार होती है।’ इस पर मेरा पहला ही प्रश्न था…

प्रियंका गांधी को उनके आवास से मोदी सरकार ने बाहर निकाला। ये इंसानियत की ही पराजय है, ऐसा नहीं लगता?
– ऐसा है कि सत्ता हाथों में हो तो उसका इस्तेमाल विनम्रतापूर्वक करना चाहिए। सत्ता का दर्प अगर एक बार आपके सिर पर चढ़ गया तो फिर इस प्रकार की चीजें होती हैं। जो भी हो लेकिन एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि जवाहरलाल नेहरू का योगदान स्वतंत्रता के आंदोलन में बहुत बड़ा था। लोकतंत्र की राह पर देश को ले जाने का रास्ता उन्होंने वर्कआउट किया, यह योगदान ही है। उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने भी देश के लिए बलिदान दिया। इंदिरा जी के पुत्र राजीव गांधी ने भी देश के लिए बलिदान दिया। देश के लिए बलिदान देनेवाले एक परिवार के दो लोग और उनकी पहली पीढ़ी ने संपूर्ण जीवन देश के लिए दिया। ऐसे परिवार की बेटी यानी प्रियंका। राजीव गांधी की हत्या होने के बाद पुन: एक बार अपनी पार्टी एवं सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने के लिए सोनिया जी एवं वो प्रयास कर रही हैं… ठीक है, पॉलिटिकली मतभेद होंगे, लेकिन इसका मतलब मेरे हाथों में सत्ता है, उस सत्ता का दुरुपयोग करके तुम्हें हम तकलीफ दे सकते हैं, उस सत्ता का इस्तेमाल तुम्हारे खिलाफ कर सकते हैं… इसमें कोई बुद्धिमानी नहीं। एक पूर्व प्रधानमंत्री की बेटी को दिया गया आवास तुम छीन लेते हो और अब उनपर लखनऊ में कहीं जाकर रहने की नौबत आ गई। मुझे खुद इसमें सभ्यता नजर नहीं आती।

एक बदले की राजनीति इस प्रकार की जा रही है, ऐसा आपको लगता है क्या?
– ओछी राजनीति है ये!…हां, बिल्कुल ओछी।

क्योंकि ममता बनर्जी का आरोप हमेशा रहता है… और भी ऐसे कई नेता होंगे, मोदी सरकार उनसे हमेशा बदले की भावना से पेश आते हैं। उनके विचारों की सरकार जिन राज्यों में नहीं, उनसे ठीक से पेश आना नहीं… उन्हें तकलीफ देना। विरोधी दलों की सरकारें टिकने नहीं देना, जोड़-तोड़ करना। इसका ताजा उदाहरण मध्य प्रदेश है। इस प्रकार विपक्ष की सरकार अस्थिर करने के लिए सत्ता का दुरुपयोग हो रहा है क्या?
– सीधे-सीधे हो रहा है। मैंने ऐसा देखा है जब मनमोहन सिंह की सरकार में मैं था। उस समय मोदी साहब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और कुछ राज्य भी भाजपा के पास थे। कई बार मैंने ऐसा देखा कि मुख्यमंत्रियों की परिषद है तो उससे पहले दिन या दो-तीन दिन पहले इनकी अलग से बैठक होती थी। उनकी पार्टी या उनके सरकार के मुख्यमंत्रियों की अलग बैठक ली, यह मैं समझ सकता हूं, उस बैठक का नेतृत्व मोदी साहब करते थे। उन बैठकों में उनका भाषण इतना कठोर होता था मनमोहन सिंह के बारे में कि पूछो मत। और उसके बाद मीटिंग में आते और अपने सवाल रखते थे। वो उनका अधिकार था, उस बारे में मेरा कुछ कहना नहीं लेकिन देश के प्रधानमंत्री को लेकर राज्य का एक मुख्यमंत्री वैâसी निर्णायक भूमिका रखता है, यह हमने उसी समय पहली बार देखा। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था।

आज क्या परिस्थिति है?
– आज परिस्थिति उसके उलट है। कुछ राज्य उनके साथ नहीं, उन्होंने ऐसी निर्णायक भूमिका कभी नहीं ली। वे केंद्र से तालमेल बिठा रहे हैं। उल्टा मनमोहन सिंह ने कभी अपने ऊपर हो रही टिप्पणी को लेकर कभी द्वेष नहीं पाला। मोदी तक तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे। वे हमेशा मनमोहन सिंह पर टिप्पणी करते थे लेकिन मनमोहनसिंह ने कभी उसका गुस्सा गुजरात पर नहीं निकाला। मैं कृषि विभाग का मंत्री था। मुझे हमेशा सभी राज्यों में जाना पड़ता था। कृषि उत्पादन बढ़ाने की दृष्टि से और मैंने गुजरात में भी उस समय बहुत यात्रा की। मोदी साहब के साथ मैं गुजरात में घूमा। वहां कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कई योजनाएं लागू कीं। उस समय कांग्रेस के कुछ लोगों ने हमारे मंत्रिमंडल पर टिप्पणी की कि मोदी इतना कटाक्ष करते हैं और हमारे कृषि मंत्री उनके यहां जाकर पूरी मदद करते हैं। तब मनमोहन सिंह ने मीटिंग में कहा था कि गुजरात यह इस देश का हिस्सा है। हम सभी हिंदुस्थान के सभी राज्यों के संरक्षण के लिए यहां बैठे हैं। इसलिए पवार साहब जो करते हैं, वो सही है। वह उन्हें करना चाहिए। मनमोहन सिंह की वो नीति और आज हम जो देख रहे हैं वो नीति, अलग है। इनकी सरकार गिराओ, उनकी गिराओ। अब राजस्थान की सरकार को लेकर और क्या किया जा सकता है तो करो, इसकी चर्चा है।

लेकिन इसमें अपने राज्य का नंबर आएगा ऐसा लगता है क्या? महाराष्ट्र का?
– ऐसा कहते हैं, कई बार कहते हैं। यानी कुछ लोग कहते हैं उनकी पार्टी के, लेकिन उनकी जनमानस में कितनी कीमत है और वहां कितनी कीमत है, ये मुझे पता नहीं लेकिन वो कहते हैं।

आपके पुलोद की सरकार भी बाद में बरखास्त की गई क्योंकि आप अलग विचार के थे…
– इंदिरा गांधी ने उस समय सभी सरकारों को बरखास्त कर दिया और उसकी वजह क्या बताई? उसके बाद ८० का चुनाव हुआ और वहां कांग्रेस की सत्ता सभी ओर आई। जहां विरोधी सरकार थी, वहां भी कांग्रेस की मेजोरिटी आई। इसलिए ये लोगों का जनमत है, ऐसा कहकर इंदिरा गांधी ने सभी सरकार बरखास्त कर दी। आज वैसी स्थिति नहीं है।

ये ऑपरेशन कमल क्या है?
– ऑपरेशन कमल का मतलब सीधे-सीधे सत्ता का दुरुपयोग करके लोगों द्वारा बनाई गई सरकार को कमजोर करना, डिस्टेबिलाइज करना और उसके लिए केंद्र की सत्ता का पूरा-पूरा दुरुपयोग करना।

महाराष्ट्र में अक्टूबर महीने में ऑपरेशन कमल होगा, ऐसा लगातार पैâलाया जा रहा है…
– पहले तीन महीने में कहते थे.. बाद में छह महीना हुआ। अब छह महीना होने के बाद सितंबर का वादा है। कुछ लोग अक्टूबर का कर रहे हैं। मुझे विश्वास है कि पांच वर्ष यह सरकार उत्तम तरीके से राज्य का कामकाज करेगी और ऑपरेशन कमल हो या और कुछ, इसका कुछ भी परिणाम उद्धव ठाकरे की सरकार पर नहीं होगा।

देवेंद्र फडणवीस ने बीच के दिनों में दो गंभीर आरोप आप पर लगाए। वे कहते हैं यह गुप्त धमाका है। इसमें उन्होंने जो पहला आरोप लगाया कि वर्ष २०१४ में आपको भाजपा के साथ सरकार बनानी थी। शुरुआत के काल में आपने समर्थन घोषित किया, इसके बाद सरकार शिवसेना के साथ बनी ये सही, लेकिन बीच के दिनों में आप और भाजपा के वरिष्ठ नेता महाराष्ट्र में सरकार बनाने के संदर्भ में चर्चा कर रहे थे, ऐसा उन्होंने विश्वासपूर्वक कहा है।
– उन्होंने कहा… मैंने भी पढ़ा, लेकिन मजेदार बात ये है कि वे उस समय कहां थे, यह मुझे पता नहीं। डिसिजन मेकिंग प्रोसेस में उनका क्या स्थान था? ये मुख्यमंत्री बनने के बाद लोगों को पता चला। उनसे पहले विरोधी दल के जागरूक विधायक के रूप में उनका नाम था। लेकिन पूरे राज्य या देश के नेतृत्व में बैठक लेने का अधिकार उन्हें था, ऐसा मुझे कभी महसूस हुआ नहीं। वे कहते हैं उसके अनुसार उस काल में एक बार मैंने कॉन्शियसली स्टेटमेंट दिया वो यह कि शिवसेना और भाजपा की सरकार न बने…

ऐसा किसलिए किया?
– मेरी पहले से ही दिली इच्छा थी कि शिवसेना को भाजपा के साथ नहीं जाना चाहिए। जब ऐसा लगा कि वे जाएंगे तो मैंने जान-बूझकर स्टेटमेंट दिया कि हम आपको अर्थात बाहर से समर्थन देते हैं। उद्देश्य यह था कि शिवसेना उनसे अलग हो जाए। ये हुआ नहीं… उन्होंने सरकार बनाई और चलाई… इस पर कोई वाद नहीं है। लेकिन हमारा यह सतत प्रयास रहा कि भाजपा के हाथ में सत्ता चलाने देना शिवसेना के हित में नहीं है। क्यों? दिल्ली की सत्ता उनके हाथ में… राज्य की सत्ता अर्थात मुख्यमंत्री उनके हाथ में। इसके कारण शिवसेना अथवा अन्य पार्टियों को लोकतंत्र में उनकी पार्टी का काम करने का अधिकार है, असल में उन्हें यही मंजूर नहीं है। और इसलिए आज नहीं तो कल वे निश्चित रूप से सभी को धोखा देंगे। और इसीलिए ये हमारा राजनीतिक कदम था।

अच्छा… मतलब फडणवीस जो कहते हैं वो आपको मंजूर नहीं है… 
– बिलकुल मंजूर नहीं है। लेकिन उनमें और शिवसेना में ये दूरी बढ़े, इसके लिए हमने जान-बूझकर ये कदम बढ़ाए, ये मैं कबूल करता हूं।

ये दूरी तो अब बढ़ गई है… दूसरा आरोप उन्होंने ऐसा लगाया है कि वर्ष २०१९ की जो तीन पार्टियों की सरकार अब बनाई गई है, उस सरकार की स्थापना के दौरान भी राष्ट्रवादी के सर्वेसर्वा ऐसा उन्होंने उल्लेख किया, वही भाजपा के साथ सरकार बनाने के संदर्भ में अंतिम चरण में चर्चा करते रहे और बाद में पवार साहब ने यू टर्न ले लिया। अचानक।   
– नहीं। ये सही नहीं है। सीधी सी बात है कि शिवसेना को हमें साथ में लेना नहीं है। आप साथ आकर हमें स्थिर सरकार बनाने में साथ दें, ऐसा भाजपा के कुछ नेता हमारे लोगों से कह रहे थे। हमारे कुछ सहयोगियों से और मुझसे भी एक-दो बार बोले। बोले नहीं, ये सच नहीं है। वे बोले थे… एक बार नहीं… दो बार नहीं… तीन बार बोले… और इसमें उनकी ऐसी अपेक्षा थी कि प्राइम मिनिस्टर के और मेरे संबंध अच्छे हैं और इसलिए प्राइम मिनिस्टर इसमें हस्तक्षेप करें और मैं उसे मंजूरी दे दूं। इसीलिए ये संदेश मेरे कानों तक भी पहुंचा था। और उस समय ये संदेश आने के बाद देश के प्रधानमंत्री हैं, प्रधानमंत्री तक अपने बारे में और अपनी पार्टी के बारे में गलत जानकारी न जाए। इसलिए मैंने खुद पार्लियामेंट में उनके चैंबर में जाकर उनसे कहा था कि हम आपके साथ नहीं आएंगे। संभव हुआ तो हम शिवसेना के साथ सरकार बनाएंगे अथवा विरोधी पार्टी में बैठेंगे। परंतु हम आपके साथ नहीं आ सकते। और जब मैं यह कहने जा रहा था तब एक गृहस्थ पार्लियामेंट में मेरे बगल में थे। उनका नाम संजय राऊत है। उन्हें मैं कहकर गया कि मैं ऐसा उनसे (प्रधानमंत्री) कहने जा रहा हूं। मैं वापस लौटा तब राऊत वहीं थे। उन्हें भी मैंने प्रधानमंत्री के साथ हुई चर्चा की जानकारी दी।

इस सरकार के साथ कई लोग हैं, जो हस्तक्षेप करते हैं। खासकर राज्यपाल, ऐसी आपकी एक भूमिका आपने एक मीटिंग के दौरान प्रधानमंत्री से व्यक्त की थी। राज्यपाल को सरकार में कितना ध्यान देना चाहिए?
– मैंने ऐसा कहा, यह कोई सिर्फ महाराष्ट्र के राज्यपाल के लिए सीमित नहीं था। मेरा स्टेटमेंट ऐसा था कि राज्यों में सेंटर ऑफ पॉवर एक ही होनी चाहिए और वह मतलब मुख्यमंत्री। सेंटर ऑफ पॉवर यदि दो होने लगे तो गड़बड़ होती है। कुछ राज्यों में यह हुआ। जैसे कश्मीर में, वहां एक राज्यपाल थे… वहां के मुख्यमंत्री के लिए काम करना, उन्होंने लगभग मुश्किल कर दिया था। उसके बाद पश्चिम बंगाल में। वहां से भी ऐसा ही मामला सुनने को मिलता था। सच कहें तो लोकतंत्र में बहुमत प्राप्त सरकार बनने के बाद राज्यपाल द्वारा हस्तक्षेप करने की कोई वजह नहीं बचती और अधिकार भी नहीं है। परंतु यदि इसमें हस्तक्षेप करते बैठे तो इस तरह सत्ता के एक से ज्यादा केंद्र, लोकतंत्र की दृष्टि से और संसदीय प्रणाली की दृष्टि से ठीक नहीं है। मेरे ये विचार मैंने उस समय प्रधानमंत्री को बताए थे और यह जनरल मत था। एक राज्य के लिए सीमित नहीं था।

कांग्रेस के जो नेता राज्य मंत्रिमंडल में हैं, उनकी ऐसी पहली शिकायत है कि समन्वय का अभाव है। उनकी दूसरी शिकायत ये है कि सरकार में राष्ट्रवादी को ज्यादा महत्व मिल रहा है…
– एक बात सही है कि उद्धव ठाकरे के काम करने की जो शैली है, जो मैं देखता हूं। हम सभी से अलग है। इसकी वजह ये है कि उद्धव ठाकरे के काम करने की शैली शिवसेना के काम करने की शैली है।
शिवसेना में मैं कई वर्षों से देख रहा हूं, ठीक शिवसेना की स्थापना के समय से। आदेश आता है और आदेश आने के बाद चर्चा भी नहीं होती। कांग्रेस अथवा राष्ट्रवादी में जिस विचार से बढ़े हैं, हम वरिष्ठों के मतों का सम्मान करते हैं लेकिन वरिष्ठों का आदेश आता ही है, ऐसा नहीं है। और समझो एकाध मत व्यक्त किए जाने के बाद हम उस पर चर्चा कर सकते हैं। यह हमारे काम करने की शैली है। शिवसेना में एक बार नेतृत्व द्वारा निर्णय लेने के बाद उस मार्ग से हमें जाना है और उसका पालन करना है। यह शैली एकदम छोटे बड़े सभी में है। इस विचार से वह पार्टी चली और सफल भी हुई। फिलहाल मुख्यमंत्री उसी विचारधारा वाले हैं और काम की शैली वही है। इसमें मेरी कोई शिकायत ही नहीं है।

फिर आपको कोई परेशानी दिखती है क्या?
– परेशानी बिलकुल भी नहीं। सरकार आघाड़ी की है। शिवसेना के साथ हम दोनों लोग हैं। हमारे काम की शैली यह नहीं है और वर्तमान जो सरकार है, वह अकेले की ही नहीं है। ये तीनों की है और इन तीनों में दोनों के कुछ मत होंगे तो मत जानने के संबंध में भी यह जरूरी है और इसलिए हम लोगों का एक सुझाव होता है, अनुरोध होता है कि आप बातचीत जारी रखें। संसदीय लोकतंत्र में बातचीत जारी रहनी चाहिए। वह बातचीत जारी रही तो ऐसी चर्चा भी नहीं होगी क्योंकि ठाकरे के काम की शैली हमें कुछ खराब नहीं दिखती, सिर्फ बातचीत नजर नहीं आती।

संवाद चाहिए।
– हां… वह तो चाहिए!

कई जगह पढ़ता हूं कि कांग्रेस के कुछ मंत्री सरेआम कहते हैं कि प्रशासन में थोड़ी बेचैनी है, अथवा सरकार चलाने में प्रशासन का ज्यादा जोर है। बालासाहेब इसे नौकरशाही कहते थे। लालफीताशाही… ऐसा आपको महसूस हुआ क्या?
– नहीं… अब जानते हो क्या… यह जो कोरोना का काल था न… मतलब अभी भी खत्म हो गया है, ऐसा नहीं है। इस काल में यह चैलेंज था… चुनौती ही थी। और इस चुनौती में बाकी सभी समस्याएं एक तरफ रखकर इस कोरोना का सामना करने की चुनौती मुख्यमंत्री के सामने थी और इसलिए सहज ही मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव पर यह जिम्मेदारी ज्यादा थी तथा अब हमें एकजुट होकर रात-दिन प्रयत्न करके कोरोना का युद्ध जीतना ही चाहिए, यह नीति है तथा इस नीति को सभी का समर्थन है और इसलिए या तो संवाद अथवा काम की शैली के कारण थोड़ा ऐसा हो रहा है, ये बात सही है। लेकिन इसका मतलब हमेशा के लिए ही रहेगा, ऐसा नहीं लगता। प्रशासन तंत्र की आज इसीलिए मदद ली और इसे लेने की आवश्यकता भी थी। अब मनोहर जोशी की सरकार, वे भी शिवसेना के ही मुख्यमंत्री थे। तब कभी भी ऐसी चर्चा नहीं हुई। उस समय, मनोहर जोशी के दौर में शिवसेना और भाजपा एक साथ थी। अब शिवसेना भाजपा की बजाय शिवसेना, कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस की सरकार है और इसलिए मनोहर जोशी के दौर में जिस ढंग से सरकार को चलाया, उसी तरह यहां भी सरकार चलाई जाएगी ही, लेकिन आज चुनौती है वह कोरोना की ही है।

महाराष्ट्र में बीते कुछ वर्षों से एक सामाजिक समस्या लगातार संघर्ष खड़ा कर रही है, जो कि जाति आरक्षण विशेषत: मराठा समाज के आरक्षण की है, धनगर समाज के आरक्षण की है। दोनों समाज आरक्षण के मुद्दे पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं…
– सरकार को दोनों समाजों के आरक्षण के संबंध में जो नीति अपनानी चाहिए, वह अपनाई है। पिछली सरकार ही अथवा अब आज की सरकार… आरक्षण दोनों को ही दिया है। सवाल सिर्फ आरक्षण को न्यायालय में टिकने के संबंध में है। दो बातें हैं। धनगर समाज की मांग और दो कदम आगे बढ़कर ऐसी है कि आदिवासियों के संबंध में आरक्षण की जो भूमिका है वह एप्लीकेबल करें और इसके पीछे कारण भी कई हैं। धनगर समाज का एक वर्ग ऐसा है, जो भेड़ें पालता है। एक बार बारिश खत्म हो गई तो वह अपनी भेड़ें घाटों से कोकण में ले जाते हैं और बारिश शुरू होने से पहले फिर अपने क्षेत्र में लौट आते हैं। यह एक ट्राइब जैसे एक गांव से दूसरे गांव में जाते हैं, उसी ढंग से धनगर समाज का यह वर्ग भी उसी शैली में रहता है। और इसलिए एक नजरिये से ये आदिवासियों का जैसे घर-बार नहीं होता है, भोजन नहीं होता है। जैसे-जैसे जो खाने को मिले वैसा वह आगे बढ़ता रहता है। स्थिरता नहीं है। ऐसे परिवारों के संदर्भ में आपने ट्राइबल के संबंध में जो अलग भूमिका अपनाई। वही भूमिका अपनाकर उसी तरह की सहूलियतें यहां दी जानी चाहिए। यह धनगर समाज की मांग है। यह कोई सीधे नजरअंदाज करने जैसा नहीं है। आदिवासियों जैसी जो सहूलियतें हैं, वो दी जाएं, ऐसा उनका कहना है। इसके विपरीत आदिवासी समाज के नेतृत्व का यह कहना है कि हमारे कोटे में और कोई न आए। इसलिए थोड़ा-सा एक प्रकार का भेद है। अब यह एक तरफ का ऐसा भेद रहते मराठा समाज की समस्या आ गई तथा मराठा समाज में जो बहुसंख्य लोग किसानी में लगे हैं, नौकरी कर रहे हैं, खेतिहर मजदूर की हैसियत से कार्य करनेवाला वर्ग है। महाराष्ट्र में कृषि कहें तो लगभग ८० फीसदी कृषि वर्षा पर आधारित है। इस बार बरसात अच्छी हुई तो अच्छी बात है। बारिश नहीं हुई तो पूरी कृषि व्यवस्था बर्बाद हो जाती है और उसमें खपनेवाला यह वर्ग बर्बाद हो जाता है। इसलिए इस वर्ग को कुछ सहूलियतें दी जानी चाहिए। ऐसी उनकी मांग थी। कुछ प्रमाण में वो सहूलियतें दीं। अब उन सहूलियतों के विरोध में कुछ लोग कोर्ट पहुंच गए। वह मामला, सुप्रीम कोर्ट में आजकल चल रहा है। अब महाराष्ट्र सरकार ने… मतलब उद्धव ठाकरे की सरकार ने देश के श्रेष्ठ वकील दिए हैं। और सरकार का यह जो निर्णय है वह बरकरार रहे, इस नजरिये से ध्यान रखा जा रहा है। कोर्ट क्या तय करेगी ये हम देखेंगे। परंतु यदि कल कोर्ट का निर्णय कुछ अलग आया तो अभी बच्चों को शिक्षा में, नौकरी में जो सहूलियतें मिल रही हैं वो भी चली जाएंगी, इसकी चिंता है। और इसलिए इसे लेकर मांग है।

पूरे देश में विरोधी दल इतना जागरूक नहीं दिख रहा है। कई मामलों पर विरोधी दल बिखरा हुआ है। सही मायने में विरोधी दल की भूमिका लोकतंत्र में बहुत महत्वपूर्ण है। आपने भी राज्य और संसद में विरोधी दल के नेता के रूप में जिम्मेदारी संभाली है। यह विरोधी दल भविष्य में एक होकर देश के समक्ष कुछ अच्छा काम करेगा क्या? जैसे जनता पार्टी के काल में सरकार के समक्ष एक चुनौती खड़ी हुई थी। ऐसी आपको कोई संभावना भविष्य में दिख रही है क्या?
– मुझे ऐसा लगता है कि कोरोना संकट एक बार कम हुआ और पार्लियामेंट शुरू होगी, तब इस कार्य को गति मिलेगी। देश के विविध राजनीतिक दल के नेताओं में यह भावना है कि हमें एक साथ मिलकर बैठना चाहिए और बात करनी चाहिए। हमें एक साथ मिलकर एक निश्चित कार्यक्रम तय करके देशवासियों के समक्ष एक विकल्प देना चाहिए और उस विकल्प को देने की शक्ति हमारे विरोधी दल के नेताओं और उनकी एकता में निश्चित रूप से है। लेकिन सारे दलों के कोरोना की ओर डायवर्ट हो जाने के कारण यह काम रुका हुआ है। कोरोना का संकट आने से पहले देश के विरोधी दल के नेता एक दो बार एक साथ बैठे और चर्चा भी हुई। कुछ बातों पर नीति निश्चित करने की दृष्टि से विचार किया गया। बाद में इस रोग के कारण सारी तस्वीर बदल गई। लेकिन मुझे विश्वास है कि एक बार पार्लियामेंट शुरू हो जाने के बाद देश के सभी विरोधी दलों को एक साथ लाने की तैयारी करनी पड़ेगी।

इसके लिए आप अगुवाई करनेवाले हैं?
– मेरे जैसा कोई व्यक्ति उस पर ज्यादा ध्यान देगा। इस मामले में किसी से मिलने के लिए मैं अपने आप को छोटा नहीं समझूंगा। यदि हम सभी से मिलकर और एक विचार के साथ एक विकल्प के साथ आ सकते हैं, तो यह राष्ट्रीय आवश्यकता है और उस राष्ट्रीय आवश्यकता को पूरा करने के लिए बिना किसी उम्मीद के मैं और कई अन्य पार्टी के सहयोगी इस बारे में सोच रहे हैं और हम इस पर काम करना भी शुरू कर देंगे।

आखिरी प्रश्न पूछता हूं, महाराष्ट्र का विरोधी दल अलग है और राष्ट्रीय स्तर का विरोधी दल अलग है। आपने महाराष्ट्र विधिमंडल में विरोधी दल नेता के रूप में काम किया है। महाराष्ट्र के विरोधी दल की एक वृहद परंपरा रही है। विधानसभा हो या विधान परिषद, अगर विरोधी दल के नेतृत्व को देखें… आज के महाराष्ट्र के विरोधी दल को आप क्या सलाह देंगे?
– ऐसा है कि एक तो विधानपरिषद में विरोधी दल की जो टीम है, वह अपनी जिम्मेदारी और उससे संबंधित इंपैक्ट करने में सफल होती नहीं दिख रही। विधानसभा की तस्वीर अलग है। विधानसभा में विरोधी दल नेता बहुत कम घूम रहे हैं, बोल रहे हैं, मुद्दे समझने का कम प्रयास करते हैं। विरोधी दल का टीका-टिप्पणी करना काम है। सत्ताधारी दल की नीतियां कहां गलत हो रही हैं, तो उस बारे में बोलने का उन्हें अधिकार है। लोकतंत्र जिसे स्वीकार है, उसे यह स्वीकार करना ही चाहिए। लेकिन उसमें द्वेष नहीं दिखना चाहिए।

आपको यह द्वेष महसूस होता है क्या?
आज ऐसा दिख रहा है कि एक समय वर्तमान मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी और विरोधी दल में काम करनेवाले लोग एक थे। उन्होंने एक साथ सरकार चलाई और आज उनसे मिलकर काम करने की भूमिका आज के मुख्यमंत्री ने नहीं ली, इसलिए हमारे हाथ की सत्ता चली गई, उसकी पीड़ा और बेचैनी विधानसभा के विरोधी दल के नेताओं में दिख रही है। सत्ता आती है, जाती है। लोगों को दी गई जिम्मेदारी संभाल कर आगे बढ़ना होता है। मैं मुख्यमंत्री था। मेरा मुख्यमंत्री पद ८० के दशक में जाने के बाद मैं विरोधी दल का नेता बना। लेकिन मेरा व्यक्तिगत अनुभव ऐसा है कि मुझे विरोधी दल के नेता के रूप में काम करने में मजा आ रहा था। उसमें एक प्रकार की संतुष्टि थी। आज क्या दिख रहा है? विरोधी दल नेता अगर आज ऐसा कहते हैं कि मेरे मुख्यमंत्री रहते, मेरा मुख्यमंत्री पद गया चला गया और इस बात को पचाने में मुझे समय लगा। मतलब सत्ता के बिना मैं रह सकता हूं कि नहीं, ऐसे सवाल पर हम कुछ नहीं कह सकते, उनका अप्रत्यक्ष रूप से यही कहना है। मुझे खुद ऐसा लगता है कि विरोधी दल के नेता को फिलहाल ये स्वीकारना चाहिए कि यह सत्ता अब मेरा रास्ता नहीं है। हम किसी दौर में थे लेकिन आज इस पर विचार करने की जरूरत नहीं है। लोगों ने विरोधी दल का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी है, उसे अच्छे से पूरा करना चाहिए तथा उसके लिए हर प्रकार के कष्ट को सहना चाहिए। और मेरे पास सत्ता नहीं है और मैं इसे डाइजेस्ट नहीं कर सकता… भूल नहीं सकता, ऐसा सोचना अच्छी बात नहीं है।

ठाकरे सरकार का भविष्य क्या है?
– भविष्य यही है कि यह सरकार ५ साल अच्छे से चलेगी। इस बारे में कोई शंका नहीं है और हमने इसी प्रकार संभाल लिया तो हम अगला चुनाव भी एक साथ लड़ेंगे।
पवार साहेब धन्यवाद… आपने महाराष्ट्र और देश के लोगों के मन के सवालों का दिल खोलकर जवाब दिया। धन्यवाद…