" /> कोरोना का कहर और हम : हम होंगे कामयाब!

कोरोना का कहर और हम : हम होंगे कामयाब!

अभी जैसे कल की ही बात हो जब हर गली, मोहल्ला, नुक्कड़, सड़क, चौराहे लोगों से गुलजार रहा करते थे। आज एकदम उसके विपरीत माहौल है, हर तरफ मरघट सा सन्नाटा पसरा है। आज पूरी दुनिया कोरोना की दहशत से अपने घरों में पनाह लिए सिमटी बैठी है। खुली आंखों से न दिखने वाले एक वायरस ने बड़े-बड़े सूरमाओं के चेहरों को फाख्ता कर रखा है। अब सवाल उठता है कि कोरोना वायरस के इलाज के लिए जब कोई दवा दुनिया के किसी देश के पास उपलब्ध नहीं है तो इसके मरीज ठीक कैसे हो रहे हैं? एक साथ इतने सारे लोगों पर चमत्कार भी तो नहीं हो सकता! हकीकत में यह हो रहा है कि अलग-अलग लक्षणों वाले लोगों के इलाज के लिए अलग-अलग इलाज के तरीके अपनाने से। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार फिलहाल जो लोग वायरस से ग्रसित हो अस्पतालों में भर्ती हैं, उनका इलाज उनके व्यक्तिगत लक्षणों के आधार पर किया जा रहा है।

चीन के वुहान शहर से शुरू हुए कोरोना वायरस के दुनिया भर में बढ़ते संक्रमण के बीच कई देशों में कोरोना के वैक्सीन और दवा को लेकर रिसर्च जारी है। कोरोना से लड़ने की दिशा में बड़ी कामयाबी के तहत वैज्ञानिकों ने 70 दवाओं की पहचान कर ली है, जो इस वायरस से लड़ने मे सहायक है। अब तक तो कोरोना नाम की इस महामारी का कोई पुख्ता इलाज सामने नहीं आया है लेकिन बहुत से रिसर्च के सकारात्मक परिणाम सामने जरूर आ रहे हैं। अमेरिका में जहां कोरोना की वैक्सीन का मानव शरीर पर परीक्षण का पहला दौर पूरा किया जा चुका है, वहीं जर्मनी, चीन, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया भी टीके के आविष्कार में जनवरी महीने से प्रयासरत हैं। दूसरी तरफ भारत में जून तक इसका परीक्षण जानवरों पर करने की संभावना है। भारत इस साल नवंबर या बहुत-बहुत दिसंबर तक कोरोना वायरस के टीके का इजाद कर चुका होगा और फरवरी-मार्च 2021 तक सबके लिए टीका मुहैया भी हो सकता है।

भारतीय आयुर्वेद में भी कोरोना के इलाज के लिए आशा की किरण नजर आ रही है। आयुर्वेद में दवा के लिए एक पौधे का इस्तेमाल किया जाता है, जिसका नाम है, ‘कालमेघ’। कालमेघ का पौधा भी कोरोना के इलाज के लिए सहायक हो सकता है। इसकी खासियत के कारण इसका प्रयोग करने की मंजूरी मिल सकती है। वही इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने सुझाव दिया है कि कोरोना वायरस के हाई रिस्क केस में मलेरिया के इलाज में कारगर हाईड्रोक्लोरोक्वीन जिसे आम देशी बोलचाल में कुनैन कहते हैं, का इस्तेमाल किया जा सकता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत को धमकी भरी विवादित घोषणा के बाद हाईड्रोक्लोरोक्वीन दवा का नाम सबकी जुबान पर चढ़ गया है। आज भारत लगभग 56 देशों को यह दवा सप्लाई कर रहा है।

अमेरिका के हयूटन के एक अस्पताल में कोविड-19 से ठीक हुई एक मरीज का प्लाज्मा इस बीमारी से ग्रसित दूसरे मरीज को चढ़ाया गया और वह मरीज कुछ दिनो में ठीक हो गया।प्लाज्मा से इलाज करने वाला अमेरिका विश्व का पहला देश बन चुका है। अब इसकी देखादेखी चीन, जर्मनी, फ्रांस में भी इलाज के पहले प्रयोग हो रहे हैं। कुछ दिन पहले दिल्ली सरकार ने भी प्लाज्मा से इलाज करने की पहल की है। कोविड-19 से ठीक हुए किसी व्यक्ति के प्लाज्मा मे एंटीबॉडी होते हैं, जो शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली द्वारा कोरोना वायरस पर हमला करने के लिए बनाए जाते हैं। इसके कारण कोरोना वायरस काफी कमजोर हो जाता है और कमजोर दुश्मन पर हमला करके उसको ठिकाने लगाना बहुत आसान हो जाता है। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साफ कह दिया है कि हाल फिलहाल कोविड-19 के किसी वैक्सीन के विकसित होने की कोई संभावना नहीं है जो विज्ञान ‘इति सिद्धम’ पर काम करता है वहां ‘कोई संभावना नहीं’ जैसा बयान थोड़ी शंका तो जरूर उत्पन्न करता है। वैसे भी आज विश्व स्वास्थ्य संगठन अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है। दुनिया भर के कई देशों को ऐसी शंका है कि इसके अध्यक्ष चीन के इशारों पर अपना करतब दिखाते हैं तो कुछ देश चोरी-छुपे कबूल करते हैं कि इस संगठन को चीन ने अपना प्यादा बना रखा है। कोविड19 का इलाज मिलने तक अगर हम अनुशासन का पालन करते हैं तब तक कोरोना से बचा जा सकता है। इलाज के मामले में फिलहाल दिल्ली थोड़ी दूर भले ही हो लेकिन शीघ्र ही हम कामयाब जरूर होंगे।

– धीरज फुलमती सिंह