" /> चीन के कर्ज तले दबी आधी दुनिया, अमेरिका को पीछे छोड़ बनना चाहता है आर्थिक महाशक्ति

चीन के कर्ज तले दबी आधी दुनिया, अमेरिका को पीछे छोड़ बनना चाहता है आर्थिक महाशक्ति

ड्रैगन का सीधा पंगा अमेरिका के साथ है। वह सैन्य के साथ ही दुनिया की आर्थिक महाशक्ति भी बनना चाहता है। उसने आधी से ज्यादा दुनिया को कर्ज बांट रखा है या वहां निवेश कर रखा है। एक रिपोर्ट के अनुसार तो उसने अमेरिका से भी ज्यादा कर्ज बांट रखा है। ऐसे में कोरोना वायरस और गलवान वैली के सैन्य विवाद के बावजूद उसे उम्मीद है कि दुनिया में उसे कई देशों का समर्थन मिलेगा।

लद्दाख के गलवान घाटी में भारत और चीनी सेना के बीच हिंसक झड़प में २० भारतीय जवानों के शहीद होने के बाद तनाव काफी बढ़ गया है। देश में लोग चीनी उत्पादों का विरोध कर रहे हैं और इनपर प्रतिंबध लगाने के लिए सोशल मीडिया पर कैंपेन चल रहा है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में ही बल्कि दुनिया के १०० से भी ज्यादा देशों में चीन ने अपने उत्पाद और कर्ज के जरिए पैठ बना ली है।

चीन शुरुआती समय से ही एक नीति को लेकर चल रहा है, वो नीति है कमजोर पड़ोसियों को कर्ज के जाल में फंसाए रखना और सक्षम देशों को विवादों में उलझाए रखना। चीन अपनी इसी नीति के जरिए १५० से ज्यादा देशों में ११२.५ लाख करोड़ रुपये का बांट चुका है। कमजोर देशों को भारी भरकम कर्ज देकर चीन उन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिश में लगा रहता है ताकि दुनिया में उसे अमेरिका के मुकाबले एक वैश्विक ताकत माना जाए। चीन सरकार और उसकी सहायक कंपनियां दूसरे देशों को करीब १.५ ट्रिलियन डॉलर यानी की ११२.५ करोड़ से ज्यादा रुपये का कर्ज दे चुकी है। इतना ही नहीं चीन अब विश्व बैंक और आईएमएफ से भी बड़ा कर्जदाता बन गया है। साल २००० से २०१४ के बीच में अमेरिका ने अन्य देशों को ३९४.६ अरब डॉलर का कर्ज दिया जबकि चीन ने भी ३५४.४ अरब डॉलर का कर्ज कमजोर देशों के बीच बांटा। बाद के सालों में जब अमेरिका ने कर्ज में कटौती की तो चीन इस मामले में उससे आगे निकल गया।

बता दें कि विश्व बैंक, आईएमएफ और सभी वित्तीय अंतरराष्ट्रीय समूहों द्वारा बांटा गया कर्ज अकेले चीन के बांटे गए कर्ज से कम ही है। चीन ने ज्यादातर देशों में लोन इंप्रâास्ट्रक्चर, एनर्जी और माइनिंग जैसे क्षेत्रों के लिए दिया है। इससे समझा जा सकता है कि अप्रत्यक्ष तौर पर चीन उसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कभी भी कर सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि ५० से ज्यादा गरीब देशों को चीन ने जो कर्ज दिया था वो साल २००५ में उसकी जीडीपी का एक फीसदी से भी कम था। लेकिन साल २०१७ में बढ़कर यह १५ फीसदी तक पहुंच चुका है।