" /> हृदय के ‘राम’ हाईजैक नहीं होते!

हृदय के ‘राम’ हाईजैक नहीं होते!

आज अयोध्या जी में भव्य-दिव्य श्रीराम मंदिर का शिलान्यास हो रहा है। उसी श्रीराम मंदिर का.., जिसका सपना देश के करोड़ों हिंदुओं ने लगभग एक सदी से देख रखा था और जिस सपने को साकार करने के लिए हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था। उसी श्रीराम मंदिर का.., जिसके लिए अयोध्या आंदोलन में हजारों शिवसैनिक, शिवसेनाप्रमुख के आदेश पर शामिल हुए थे। उसी श्रीराम मंदिर का.., जिसमें देश के तमाम दिग्गजों ने अपना अमूल्य योगदान दिया था। आज उन सभी का सपना साकार होने जा रहा है। शिवसेनापक्षप्रमुख और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने इस स्वर्णिम पल के साकार होने पर अपार खुशी व्यक्त करते हुए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ न्यास को पत्र लिखकर अपनी शुभेच्छा दी है और कहा है कि करोड़ों हिंदुओं को जिस क्षण की प्रतीक्षा थी, वो क्षण आ गया है। साथ ही उन्होंने इस महती कार्य में शिवसैनिकों की सहभागिता याद दिलाते हुए उनके योगदान के लिए आभार भी माना है।
आज वैसा ही आभार संपूर्ण अयोध्या और देश मान रहा है, शिवसेना और हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे का। अयोध्या के इतिहास की अहम समझ रखनेवालों मेंं से एक हैं ‘विराजमान रामलला’, श्री राम जन्मभूमि अयोध्या के पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास। वे उन महात्मा अभिराम दास के शिष्य हैं, जिनकी अगुआई में २२ दिसंबर, १९४९ की रात मंत्रोच्चार और घंटानाद के बीच श्री राम जन्मभूमि में रामलला को विराजमान किया गया था। जो २० साल की उम्र में संन्यास लेकर अयोध्या जी के साक्षी हैं। वे कहते हैं, ‘राममंदिर आंदोलन में शिवसेना का योगदान महत्वपूर्ण है। शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे हिंदुत्व को लेकर कभी नहीं झुके। उनका सहयोग राममंदिर आंदोलन के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हो गया है।’ उनका तर्क है कि श्रीराम जन्मभूमि स्थान पर बना ढांचा जब ढहा तो बड़े-बड़े दिग्गज गायब हो गए थे पर बालासाहेब ने यह कहकर कि ढांचा शिवसैनिकों ने गिराया है तो मुझे उन पर गर्व है, पुन: पूरे देश में उत्साह और उमंग का संचार कर दिया। वे जोर देकर कहते हैं, ‘अब जब अयोध्या में राममंदिर बनने जा रहा है, तब यह नहीं भूलना चाहिए कि इस स्थिति में पहुंचने में बहुत कुछ बालासाहेब की देन है।’ अयोध्या में इस समय सबसे महत्वपूर्ण संत-महंत कोई है तो वे हैं श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के अध्यक्ष, महंत नृत्य गोपालदास। आज जब महंत नृत्य गोपालदास कहते हैं कि बालासाहेब का योगदान हम कभी भुला नहीं सकते, तो अयोध्या के हृदय में हिंदूहृदयसम्राट किस तरह का स्थान रखते हैं इसका साफ-साफ अंदाजा हो जाता है। अयोध्या मानता है कि हिंदूहृदयसम्राट न केवल राम मंदिर, बल्कि हिंंदुत्व के समस्त मान बिंदुओं के प्रणेता हैं। ‘६ दिसंबर, ९२ को जब बाबरी ढांचा ढाहा, उस समय अयोध्या में १०,००० शिवसैनिकों की मौजूदगी रही होगी।’ यह कहना है अयोध्या की प्राचीन सिद्ध पीठ दंतधवन कुंड के महंत नारायणाचारी महाराज का। वे कहते हैं कि राममंदिर आंदोलन में बालासाहेब के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। इसी कड़ी में जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी रत्नेश महाराज भी मानते हैं कि बालासाहेब की अयोध्या आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
अयोध्या के संत-महंतों के अलावा वहां का प्रबुद्ध वर्ग भी अयोध्या आंदोलन में बालासाहेब के योगदान का कायल है, फिर चाहे उनकी विचारधारा शिवसेना से मेल खाती हो या नहीं। भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व सदस्य ९० वर्षीय वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह का जो बालासाहेब को याद करते हुए कहते हैं कि अपने इरादे के पक्के थे बालासाहेब। सर्वोच्च अदालत से श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के पक्ष में फैसला आने के बाद से ही भाजपा-विहिप समेत अनेक हिंदूवादी संगठन अयोध्या आंदोलन का श्रेय लेने के लिए दावे-प्रतिदावे कर रहे हैं, लेकिन सच तो ये है कि शिवसैनिकों ने ही दिसंबर, १९९२ को ढांचा गिराने में महती भूमिका निभाई थी। अयोध्या की सरजमीं इसकी गवाह है। इसका जिक्र उन्होंने अपनी चर्चित पुस्तक ‘अयोध्या: राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का सच’ में प्रमुखता से किया है। अयोध्या के इतिहास को उन्होंने काफी करीब से देखा है और इस संबंध में वे काफी करीबी जानकारियां भी रखते हैं। वे धुर वामपंथी होने के बावजूद हिंदूहृदयसम्राट की शख्सियत के कायल हैं। तभी तो वे कहते हैं, ‘दृढ़ निश्चयी, बगैर लाग-लपेट के बात कहनेवाले हिंदुत्व को लेकर समर्पित बेबाक शैली के राजनेता थे बालासाहेब।’ ६ दिसंबर, १९९२ को अयोध्या में तैनात थे वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक देवेंद्र बहादुर राय। उन्हें ढांचा विध्वंश के वक्त कारसेवकों पर फायरिंग न करवाने के लिए सस्पेंड कर दिया गया था। आज वे इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके बेटे पुनीत राय जोर देकर कहते हैं कि वास्तव में अयोध्या आंदोलन को धार दी थी तो बालासाहेब ने ही। मंदिर आंदोलन में सबसे मुखर वो ही थे। उन्हीं की प्रेरणा से हजारों रामभक्तों में उत्साह जागा। सही मायने में वे महानायक और ‘अयोध्या’ के सूत्रधार थे। ९० के दशक में अयोध्या आंदोलन के एक और गवाह हैं सेवानिवृत्त आईएएस अफसर रामशरण श्रीवास्तव। जो उस दौरान अयोध्या में डीएम पद पर तैनात थे। ‘अयोध्या: एक दृष्टिकोण’ चर्चित पुस्तक लिखकर मंदिर आंदोलन को भी परिभाषित कर चुके हैं। कहते हैं..‘गजब के व्यक्तित्व थे, महानायक थे वो तो। उस दौर में तमाम चुनौतियों से जूझते कारसेवकों को उर्जस्वित करने का जो कार्य बालासाहेब ने किया वो अतुलनीय है। अयोध्या के लिए उन्होंने जो ठाना वो कर डाला। उनके जोशीले भाषणों ने रामभक्तों में जोश भरा। उसी का परिणाम है कि यह दिन आया है। खुशी है..हम सबका सपना साकार हो रहा है।
आज से एक-डेढ़ वर्ष पहले तक शायद ही किसी को यह उम्मीद होगी कि ५ अगस्त, २०२० को अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के विशाल भव्य-दिव्य मंदिर का सपना साकार हो रहा होगा, क्योंकि देश में राम-नाम का जप करके जो आए थे वे ५ वर्ष बीत जाने के बाद भी उसे भुलाए बैठे थे। दोबारा सरकार बनने पर भी न प्रत्यक्ष और न ही अप्रत्यक्ष तौर पर इस दिशा में कोई कदम उठाया जा रहा था। लिहाजा, जनता में इसे लेकर आक्रोश था, चिंताएं थीं। तब एक बार फिर मोर्चा संभाला तो शिवसेना ने ही। शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने सपरिवार अयोध्या पहुंचकर श्री रामलला के दर्शन किए, मां सरयू की आरती की और फिर वहीं से केंद्र की सरकार से आवाहन किया कि राम मंदिर पर तुरंत निर्णय लें। अध्यादेश लाएं या कानून बने पर श्री राम मंदिर का निर्माण शीघ्र शुरू होना ही चाहिए। विगत डेढ़ वर्षों में शिवसेनापक्षप्रमुख तीन बार अयोध्या दौरा कर चुके हैं, मुख्यमंत्री बनने से पहले भी और बाद में भी।
आज इस ऐतिहासिक क्षण में अयोध्या आंदोलन को जिन्होंने करीब से देखा है, जो साधु-महंत शिवसेना के आंदोलन के साक्षी रह हैं, वे खुले दिल से शिवसेना और शिवसेनाप्रमुख का आभार मान रहे हैं। उनके योगदान की सराहना कर रहे हैं। महंत सत्येंद्र दास जी ने कभी कहा था, ‘मैं तो १९५८ से अयोध्या में हूं। मैंने १९९० की पुलिस फायरिंंग भी देखी है, जिसमें ३२ लोगोंं की मौत हुई थी। ६ दिसंबर को जब बाबरी ढांचे का विध्वंस हुआ था तब मैं पुजारी के रूप में वहीं था। ११ बजे कारसेवकों ने हमसे कहा कि हमें कुछ नारियल व लाल कपड़ा दीजिए हम पूजा करेंगे। वह मैंने ही दिया था।’ आज अंततोगत्वा उसी स्थान पर श्रीराम मंदिर का निर्माण आरंभ होने जा रहा है। बहरहाल, हिंदूहृदयसम्राट शिवसेनाप्रमुख श्री बालासाहेब ठाकरे का एक ही संकल्प था ‘अयोध्या में राममंदिर बनना ही चाहिए। शिवसेनाप्रमुख का यह संकल्प आज पूरा हो रहा है। शिवतीर्थ पर उनके स्मृतिस्थल की पवित्र मिट्टी भी ट्रस्ट के अध्यक्ष नृत्यगोपाल दास को सुपुर्द की जा चुकी है। तमाम हिंदुओं समेत शिवसैनिकों की भावनाओं की जीत हो चुकी है और पूरे देश में राम मंदिर निर्माण को लेकर उत्साह और उमंग है। हालांकि, इस पुनीत कार्य में भी नए दौर की सियासत राजनैतिक मायने खोज ही रही है। यूपी की सियासत में आरोप लग रहे हैं कि शिलान्यास को हाईजैक करने का प्रयास सरकार कर रही है। उस पर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरकार्यवाह ही जब कह दें कि राम मंदिर देश और समाज का संकल्प है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और राजस्थान की मरुभूमि से मणिपुर की पहाड़ियों तक यह संकल्प फैला हुआ है। तब उनका भाजपा के लिए संकेत साफ हो जाता है।
अलबत्ता, यही संकेत आज संपूर्ण राष्ट्र दे रहा है भाजपा के आत्ममुग्ध सत्ताधीशों को। खैर, शिवसेना के हृदय में तो श्रीराम बसते ही हैं, उन्हें कोई हाईजैक नहीं कर सकता, उसी तरह जिस तरह अयोध्या के हृदय में बसे हिंदूहृदयसम्राट के योगदान को चाहकर भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चाहे कोई कितना ही प्रताप क्यों न कर ले, मामले को कितना ही हाईजैक करने की कोशिश क्यों न करें। इसका लाभ न उत्तरप्रदेश में मिलेगा, न देश में!
(इनपुट: मनोज श्रीवास्तव, विक्रम सिंह व
रमेश मिश्रा- अयोध्या से)