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सुनो जनता, किसान मर रहे हैं!

पंजाब और हरियाणा के किसानों के आंदोलन का अर्थ पूरे देश के किसानों की भावना नहीं है, यह दुष्प्रचार है। इसलिए किसानों के हित के लिए जो तीन कानून मोदी सरकार ने लाए हैं, वो निश्चिततौर पर क्या हैं? वो तीन कानून मतलब कृषि की कब्रगाह और किसानों की मौत है। ऐसा जिन्हें लगता है, उन्हें यह मुद्दा लोगों को समझाकर बताना चाहिए।

पंजाब और हरियाणा के किसानों की समस्या देशभर के किसानों की समस्या नहीं है, ऐसा हमारी प्रिय मोदी सरकार ने तय कर लिया है। ८ दिसंबर को किसान संगठनों ने देशव्यापी बंद ‘सफल’ बनाकर सरकार को चुनौती दे दी। दिल्ली की सीमा पर किसानों का आंदोलन शांतिपूर्ण, अहिंसक मार्ग से चल रहा है। परंतु उन्हें भड़काने, बदनाम करने का प्रयास लगन से किया गया। परंतु इसका असर अपने पर न होने देनेवाला ऐसा आंदोलन मैंने पहली बार ही देखा है। पंजाब के किसान आतंकी और खालिस्तानी हैं, यह पहला आरोप है। किसानों के आंदोलन के पीछे पाकिस्तान और चीन का हाथ है, यह दूसरा आरोप है। ऐसे तमाम आरोप पचाकर दिल्ली-हरियाणा के सिंधु बॉर्डर पर किसान लड़ रहे हैं। अंतत: मुख्यतौर पर इंसान जीने के लिए ही लड़ता रहता है। किसान अलग क्या कर रहे हैं? किसानों के संदर्भ में जो तीन कानून नए सिरे से तैयार किए गए वे किसानों के अस्तित्व, स्वाभिमान को खत्म कर देनेवाले हैं। मोदी सरकार ने इसे संसद में जल्दबाजी में मंजूर किया। इस पर सही ढंग से मतदान नहीं होने दिया। ध्वनिमत से मंजूर किए गए इस कानून को किसानों ने फेंक दिया है।
तीन कानून, तीन तरीके!
किसान कानून में सुधार करो, ऐसी मांग किसने की? लेकिन मोदी सरकार ये तीन कानून लेकर आई। इस कानून का स्याह पक्ष क्या है, इसे कम-से-कम महाराष्ट्र को तो समझ लेना चाहिए। किसानों से संबंधित नए कानून से पसंदीदा बड़े उद्योगपतियों को लाभ पहुंचे, इसी मकसद से बनाए गए हैं। किसान जिस कानून के विरोध में खड़े हुए हैं, उन तीन कानूनों की जानकारी कितने लोगों को है? कानूनी भाषा जबरदस्त उलझी हुई, आम लोगों को समझ न आनेवाली है। इसलिए योगेंद्र यादव आदि लोग इस कानून को आसान बनाकर लोगों तक पहुंचा रहे हैं। ‘सामना’ के पाठक भी इसे समझ लें, इसलिए प्रस्तूत कर रहा हूं।
१) नए कानून में अनाज की जमाखोरी पर से पाबंदी हटा ली गई है। पूर्ववर्ती सरकारों ने जमाखोरी पर बंदिशें लगा रखीं थीं। खासकर खाने-पीने के उत्पादों का भंडारण व्यापारी निर्धारित सीमा से अधिक नहीं कर सकते थे। अब सरकार कहती है, व्यापारी जितना चाहें, उतना माल जमा करके रख सकते हैं। कोई सीमा नहीं है। क्यों? इसे समझ लो। पंजाब का किसान भड़ककर सड़क पर क्यों उतर आया, यह देखो। पंजाब में अडानी उद्योग के मार्फत अतिप्रचंड ‘सायलो’ खड़ा किया जा रहा है। यह हमारे गोदामों जैसा नहीं है। हमारे बड़े-से-बड़े गोदाम से सौ गुना बड़ा ये गोदाम है। उद्योगपति पंजाब में ये ‘सायलो’ बनाने लगे हैं। अब अडानी जैसे उद्योगपति गेंहू, चावल, दाल, शक्कर, मक्का का जितना चाहे उतना स्टॉक इस महाप्रचंड गोदाम में कर सकेंगे। इसका परिणाम क्या होगा? किसान जब अपना माल लेकर बाजार में आएंगे, उसके ५-१० दिन पहले ही अडानी के गोदाम का ‘स्टॉक’ बाजार में लाया जाएगा। इससे किसानों के माल की कीमतें एकदम से गिर जाएंगी। बाजार की जरूरत को कृत्रिम तरकीब से मार दिया जाएगा। जब किसान हताश होकर अपना माल बाजार में गिरी हुई कीमतों में फेंककर चला जाएगा, उसके बाद अचानक अनाज की कीमत ऊपर। यह एक व्यापारी खेल है, जिसे नए कानून के दायरे में बैठाया गया है।
२) दूसरा कानून है, ठेके पर खेती का। कार्पोरेट कंपनियों एवं किसानों के बीच कृषि करार होगा। देश के अन्य हिस्सों में शुरुआत होनी है, परंतु पंजाब के किसानों ने इसका तजुर्बा ‘पेप्सी’ जैसी कंपनियों से ले लिया है। पंजाब में पेप्सी कंपनी आई। पेप्सी कंपनी ने आलू उत्पादक किसानों से करार किया। वैâसे? तो किसान ६ रुपए की दर से आलू कंपनी को देंगे। एक तरह से किसानों को लगा कि यह समर्थन मूल्य ही है। लेकिन पहले ही वर्ष में क्या हुआ? मंडी में अर्थात बाजार में आलू के दाम १० रुपए। कंपनी किसानों के पास कॉन्ट्रैक्ट का डंडा लेकर पहुंच गई। ‘तुमने ६ रुपए किलो में करार किया है। तुम्हें ६ रुपए में आलू देने ही होंगे, अन्यथा कोर्ट में खींचेंगे।’ बेचारा किसान डर गया। अगले साल क्या हुआ? आलू का दाम ‘मंडी’ में ४ रुपए तक गिर गया। किसान कंपनी के पास गया, ‘हमारा तो ६ रुपए किलो में सौदा हुआ है।’ इस पर कंपनी ने कहा, ‘सही है, लेकिन तुम्हारे आलू का आकार सही नहीं है। तुम्हारे आलू स्वाद में थोड़े मीठे हैं। माल खराब हैं। ४ रुपए में देने हों तो दे दो, अन्यथा गेट आउट।’ अर्थात ६ रुपए में तय दाम देने को तैयार नहीं। इसी ‘पेप्सी’ के खिलाफ तब पंजाब में बड़ा आंदोलन हुआ ही था। नया कानून क्या कहता है? कंपनी ने करार तोड़ा तो किसान पहले ‘एसडीएम’ के पास अपील करें। वहां भी न्याय नहीं मिला तो दूसरी अपील ‘डीएम’ के पास करें। आम किसान को पटवारी भाव नहीं देते हैं, वहां ‘डीएम’ मतलब कलेक्टर वगैरह तो दूर की बात है। ‘डीएम’ के चपरासी ही किसान को रोक देंगे। किसान गुलाम और बेबस हो जाएगा इन ऐसी कंपनियों का।
३) तीसरा कानून है कृषि उत्पन्न बाजार समिति के संदर्भ में। कानून क्या है? ‘एपीएमसी’ सरकारी मंडी है। इस सरकारी मंडी के बाहर और एक ‘प्राइवेट मंडी’ बनेगी। प्राइवेट मंडी कौन बनाएगा? कार्पोरेट कंपनियां ही बनाएंगी। उनका भव्य कार्पोरेट आलीशान ऑफिस होगा। किसान अपना माल बेचने के लिए वहां जाएगा। कंपनी का एजेंट कहेगा, ‘चिंता मत करो। बाजार में तुम्हें दाम दिख रहा है १,७००। हम देंगे १,७५०।’ किसान वहां माल बेचकर आएगा। अगली फसल आएगी। उसमें जीरा होगा, धनिया होगी, हल्दी, मिर्च होगी। कंपनी कहेगी, ‘हम २५ रुपया दाम लगाते हैं। इसके अलावा रिलायंस कंपनी का बोनस, गिफ्ट वाउचर मिलेगा। मजा करो।’ किसान खुश होकर माल बेचकर बाहर निकलेगा। एक फसल, दूसरी फसल, चौथी, पांचवीं फसल आने तक किसानों की सरकारी ‘मंडी’ बंद ही हो जाएगी। सरकारी मंडी में कोई नहीं रहेगा। सभी आढ़ती बाहर निकल जाएंगे। मंडी खत्म होने पर जब किसान कार्पोरेट कंपनियों की निजी मंडी में माल लेकर जाएगा तब वास्तविक खेल शुरू होगा। किसानों को कहेंगे, ‘देखो, हम १,२०० रुपए का ही भाव दे सकते हैं। बेचना होगा तो बेचो, नहीं तो जाओ।’ इसके बाद किसान परेशानी में पड़ जाएगा। उसके पास जो मिलेगा उस भाव में माल बेचने के अलावा अन्य कोई पर्याय शेष नहीं बचेगा।
पवार की भूमिका
अब बड़े उद्योगपतियों के लिए कृषि सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने का साधन बन गया है, परंतु किसान फिर भी कंगाल है। किसी ने कहा, साढ़े ७ रुपए कीमत से मक्का खरीदा जा रहा है और मक्के का आटा रिलायंस स्टोर में डेढ़ सौ रुपए में बेचा जा रहा है। पंजाब के ही किसान सड़क पर क्यों, यह सवाल पूछा जाता है। पंजाब के किसान प्रगतिशील व आधुनिकता को अपनानेवाले हैं। वे प्रयोगशील हैं। इससे लिए गए अनुभव से वे आज तीन काले कानूनों के विरोध में सड़क पर उतरे हैं। शरद पवार जब कृषि मंत्री थे तब उन्होंने बाजार मंडियों में सुधार होना चाहिए क्या? ऐसी भूमिका अख्तियार करते हुए इस संदर्भ में एक पत्र राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भेजा था। भाजपा ने काले कानून के समर्थन के लिए श्री पवार के इस पत्र का सहारा लिया। पवार का आज का विरोध ढोंग है, ऐसा वे कहते हैं। इस पर मेरा कहना ऐसा है कि पवार ने १० साल पहले कृषि कानून में सुधार की भूमिका व्यक्त की तब उसमें किसानों के हित का ही विचार था। तब अंबानी, अडानी ने कृषि क्षेत्र में प्रवेश नहीं किया था। बड़े उद्योगपतियों का यह प्रसार विगत ६ वर्षों में बढ़ा है। कृषि माल के संदर्भ में नई नीति और कानून किसानों का दीवाला निकालनेवाली है। सब कुछ घाटे में ही चल रहा है। फसल उगानेवाले खर्च में बेशुमार वृद्धि व उसकी तुलना में मिलनेवाले कम दाम के कारण कृषि अब लाभदायक नहीं रही है इसलिए खतरा ही बन गया है। हिंदुस्थान मुख्य रूप से गांवों में है, कृषि हिंदुस्थानी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। पंजाब-हरियाणा के किसान इन सभी प्रमेयों को ही झूठे साबित करने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। किसान दूसरा कौन-सा व्यवसाय करेगा। किराना माल के कारोबार में भी बड़े उद्योगपति ही घुस गए हैं। किसान हार गया तो देश का पूरा अर्थतंत्र और समाज व्यवस्था भरभराकर गिर पड़ेगी। मंत्री आएंगे व जाएंगे, परंतु इस देश की कृषि ही नष्ट हो जाएगी तो देश बर्बाद हो जाएगा। चीन जैसा कम्युनिस्ट देश और अमेरिका जैसे निवेश नीतिवाले देश अपने किसानों का अर्थशास्त्र संभालते हैं। ऐसी परिस्थिति में हिंदुस्थान सरकार का यह अविश्वास क्यों? पंजाब-हरियाणा के किसानों को उन्होंने फुटबॉल बना दिया है। किसानों की समस्या, किसानों की याचना का कौड़ी बराबर मोल भी नहीं लग रहा है। किसान मर रहे हैं। उन्हें कोई बचानेवाला है क्या?