" /> अबला नहीं सबला हूं मैं!

अबला नहीं सबला हूं मैं!

अबला नहीं सबला हूं मैं,
आंख उठाकर देखो ज्वाला हूं मैं,
चांदनी सी शीतल, सूरज सा तेज हूं मैं,
अपना कौन पराया समझाने की परिस्थिति हूं मैं,
तालाब सी शांति, नदी में उफान सी हूं मैं,
सुबह की नई किरण, अंधकार में रोशनी हूं मैं,
गर्मी में शीतल, ठंड में बरफ हूं मैं,
अच्छे समय की खुशी हूं, बुरे समय में मजबूत घड़ी हूं मैं,
धूप में छांव, मरूस्थल में पानी की एक बूंद सी हूं मैं,
गौरा सी शांति, मां काली सी ज्वाला हूं मैं,
एक नारी मोम जैसी मधुर और कोमल अच्छे के लिए होती है,
एक नारी कठोर पत्थर और चट्टान बुरे के लिए होती है।
अबला नहीं सबला हूं मैं, अबला नहीं सबला हूं मैं।
-श्रद्धा सिंह, प्रतापगढ़ (यूपी)