" /> कोरोना काल में आई इम्यूनिटी बूस्टर साड़ी, ५ धुलाई तक रहता है असर

कोरोना काल में आई इम्यूनिटी बूस्टर साड़ी, ५ धुलाई तक रहता है असर

कोरोना वायरस का प्रकोप कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। दवा और वैक्सीन अभी आई नहीं है, ऐसे में इससे बचने का एक ही उपाय है कि अपनी इम्यूनिटी को बूस्ट यानी मजबूत किया जाए। इसी कड़ी में एक इम्यूनिटी बूस्टर साड़ी आई है। इस साड़ी के निर्माता का दावा है कि यह शरीर की इम्यूनिटी को बढ़ाती है। इस साड़ी के निर्माण में कई मसालों का प्रयोग किया जाता है और करीब ५ से ६ धुलाई तक इसका असर रहता है।
मिली जानकारी के अनुसार मध्य प्रदेश में इन दिनों ऐसी साड़ियों का निर्माण कया जा रहा है, जो प्राचीन काल से मसालों का इस्तेमाल करके तैयार की जाती हैं। इन खास साड़ियों को इम्यूनिटी बूस्टर भी कहा जाता है। कोरोना का कोई पर्याप्त उपचार नहीं मिल सका है, ऐसे में विशेषज्ञ हर इंसान को अपनी इम्यूनिटी मेंटेन रखने की सलाह दे रहे हैं। ऐसे में लोग आयुर्वेदिक दवाओं और काढ़े से अपनी इम्यूनिटी बनाए रखने में जुटे हैं।
कोरोना के प्रकोप ने पूरी दुनिया को त्रस्त कर रखा है। हर कोई इससे बचने के उपायों की खोज में लगा हुआ है। ऐसे में मध्य प्रदेश से एक अच्छी खबर आई है। वहां इमयूनिटी बूस्टर साड़ियों का निर्माण किया गया है। इन साड़ियों के निर्माण में मसालों का प्रयोग किया गया है। ये साड़ियां शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाती हैं। इन साड़ियों का नाम दिया गया है ‘आयुर्वस्त्र।’
मिली जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश हथकरघा एवं हस्तशिल्प निगम ने नया प्रयोग करते हुए साड़ियों को सैंकड़ों साल पुराने प्राचीन हर्बल मसालों से ट्रीट किया है। निगम के दावे के मुताबिक इस इम्यूनिटी बूस्टर साड़ी से लोगों की स्किन इम्यूनिटी बनी रहेगी। इम्यूनिटी बूस्टर साड़ी बनाने की जिम्मेदारी भोपाल के एक टेक्सटाइल एक्सपर्ट को सौंपी गई है। इम्यूनिटी बूस्ट करने वाली इन साड़ियों का एक विशेष नाम भी है। इन्हें ‘आयुर्वस्त्र’ कहा गया है। इन खास साड़ियों को बनाने के लिए खास हुनर और तय समय की जरूरत होती है। यहां साड़ियां कई पड़ाव और बारीकियों से गुजारी जाती हैं, तब कहीं जाकर ये इस्तेमाल के लिए तैयार होती हैं। इसे बनाने के लिए सबसे पहले लौंग, बड़ी इलायची, छोटी इलायची, चक्रफूल, जावित्री, दालचीनी, काली मिर्च, शाही जीरा, तेजपत्ता के मसाले का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बाद औषधीय मसालों को लोहे के इमाम दस्ते से बारीकी से कूटा जाता है। ४८ घंटे से ज्यादा समय तक इन मसाले की पोटली को पानी में रखकर एक भट्टी पर औषधी युक्त पानी की पोटली रखकर इसकी भाप से वस्त्र बनाने वाले कपड़े को घंटों तक ट्रीट किया जाता है। इसके बाद इम्यूनिटी बूस्टर वस्त्र से साड़ियां और मास्क तैयार होते हैं। बता दें कि एक साड़ी बनने में करीब ५ से ६ दिन का समय लगता है।
इम्यूनिटी बढ़ाने का दावा करने वाली इस साड़ी को तैयार करने वाले टेक्सटाइल एक्सपर्ट मालेवर के मुताबिक, संक्रमण से बचे रहने का ये एक प्राचीन उपाय है। कोरोना के चलते इस पर करीब २ महीने ट्रायल किया गया। इसके बाद सटीक हल निकला और इन मसालों का मिश्रण तैयार किया गया। बता दें कि इन वस्त्रों की इम्यूनिटी पावर का असर कपड़ों की ४-५ धुलाई तक बना रहता है। ऐसे में ग्राहक को सलाह दी जाती है कि वो इनकी धुलाई के लिए कम से कम केमिकल युक्त पाउडर का इस्तेमाल करें। टेक्सटाइल एक्सपर्ट विनोद मालेवर का दावा है कि इन वस्त्रों को धारण करने से स्किन की इम्यूनिटी बढ़ती है। साड़ी और मास्क वाले इम्यूनिटी बूस्टर आयुर्वस्त्र आम लोगों तक वैâसे पहुंचे, इसके लिए प्रदेश सरकार के हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम ने बकायदा सरकारी एम्पोरियम से इन साड़ियों को बेचने की व्यवस्था की है।

प्राचीन विद्या-परंपरा जीवित
एमपी हथकरघा एवं हस्तशिल्प निगम के कमिश्नर राजीव शर्मा ने कहा कि अलग-अलग प्रिंट की इन साड़ियों की कीमत करीब ३ हजार रुपए से शुरू होती है। उन्होंने कहा कि इस प्रयोग के जरिए देश के ऋषि मुनियों के द्वारा स्वास्थ्य और इम्यूनिटी बढ़ाने वाले वस्त्रों की प्राचीन विद्या और परंपरा को जीवित करने का मौका मिला है। वो भी इस दौर में जब बीमारी की वजह से लोगों का मनोबल कम हो रहा है। उन्होंने बताया कि फिलहाल इन साड़ियों का विक्रय भोपाल और इंदौर में किया जा रहा है, लेकिन आगामी दिनों में इसे देश के हर शहर तक पहुंचाने का लक्ष्य है।