बढ़ते तापमान से हो सकते हैं बेरोजगार! गर्मी से काम हो रहा है प्रभावित

पूरी दुनिया का तापमान बढ़ रहा है। बढ़ती गर्मी सभी प्राणियों के लिए जानलेवा होती जा रही है। इसी साल मुंबई में मार्च के महीने में अचानक एक दिन तापमान ४१ डिग्री जा पहुंचा था और मुंबई भट्ठी में तब्दील हो गई थी। हालांकि अगले दिन तापमान नीचे आ गया था। कमोबेश दुनिया में हर क्षेत्र में ग्लोबल वार्मिंग अपने वार्निंग मोड में है। अभी ४ दिन पहले पेरिस में तापमान ४५ डिग्री तक पहुंच गया। फ्रांस और स्पेन जैसे देश इस समय भीषण गर्मी से गुजर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के बड़े खतरे आनेवाले दिनों में सामने आएंगे। यह रहन-सहन, खान-पान, नौकरी, उद्योग-धंधे हर किसी को प्रभावित करेगा। यहां तक कि इस कारण मौतों की संख्या भी बढ़ेंगी।
ग्लोबल वार्मिंग का खतरा कितना बढ़नेवाला है, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ती गर्मी के कारण पूरी दुनिया में वर्ष २०३० तक ८ करोड़ लोग बेरोजगार हो जाएंगे। इस रिपोर्ट के अनुसार २०५० तक तापमान में १ डिग्री और इस सदी के आखिर तक १.५ से २ डिग्री तक तापमान बढ़ जाएगा। इससे कार्य के समय में २.२ प्रतिशत की गिरावट आएगी। यह ८ करोड़ लोगों के पूरे कार्य समय के बराबर होगा। इससे पूरी दुनिया में ८ करोड़ नौकरियों में कटौती होगी। सीधी सी बात है कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर करीब ढ़ाई लाख करोड़ रुपए की चपत लगेगी।
वैश्विक गर्मी से पड़ेंगे खाने के लाले!
गर्मी आपकी कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। ज्यादा गर्मी में काम करने की क्षमता कम हो जाती है। पूरी दुनिया में बढ़ती गर्मी के लिए आजकल ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक गर्मी) प्रचलित शब्द है। इसके कारण आनेवाले वक्त में लोग काफी बिमार होंगे जिससे उनका काम प्रभावित होगा। संयुक्त राष्ट्र संघ से जुड़ी संस्था आईएलओ (अंतर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन) का कहना है कि आगामी २०३० तक ही इसका बुरा प्रभाव झलकने लगेगा। संगठन के अनुसार इसका सबसे बुरा प्रभाव कृषि के क्षेत्र में पड़ेगा, जहां गर्मी के कारण ६० प्रतिशत कार्य क्षमता का ह्रास होगा। ऐसे में अनाज का उत्पादन प्रभावित होगा और यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि गर्मी के कारण आनेवाले दिनों में खाने के लाले पड़ेंगे।
ग्लोबल वार्मिंग से निर्माण उद्योग में १९ प्रतिशत कार्य घंटे का नुकसान होगा। गरीब व विकासशील देश इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। ग्लोबल वार्मिंग का सबसे ज्यादा असर मनुष्य पर ही पड़ेगा। कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा। गर्मी बढ़ने से मलेरिया, डेंगू और यलो फीवर जैसे संक्रामक रोग बढ़ेंगे। वह समय भी जल्दी ही आ सकता है जब हममें से अधिकांश को पीने के लिए स्वच्छ जल, खाने के लिए ताजा भोजन और सांस लेने के लिए शुद्ध हवा भी नसीब नहीं हो। गर्मी के कारण सबसे ज्यादा हीट स्ट्रोक, शरीर में पानी की कमी, और लोगों की मृत्यु दर में वृद्धि आदि देखने को मिलेगी। ग्लोबल वार्मिंग का पशु-पक्षियों और वनस्पतियों पर भी गहरा असर पड़ेगा। माना जा रहा है कि गर्मी बढ़ने के साथ ही पशु-पक्षी और वनस्पतियां धीरे-धीरे उत्तरी और पहाड़ी इलाकों की ओर रवाना होने लगेंगी। लेकिन इस प्रक्रिया में कुछ अपना अस्तित्व ही खो देंगे।
गर्म होती पृथ्वी
ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है ‘पृथ्वी के तापमान में वृद्धि और इसके कारण मौसम में होने वाले परिवर्तन। ग्लोबल वार्मिंग या वैश्विक तापमान बढ़ने का मतलब है कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आनेवाले दिनों में सूखा बढ़ेगा, बाढ़ की घटनाएं बढ़ेंगी और मौसम का मिजाज पूरी तरह बदला हुआ दिखेगा। आज ग्लोबल वार्मिंग विश्व की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। इससे न केवल मनुष्य, बल्कि धरती पर रहनेवाला प्रत्येक प्राणी परेशान है। सभी को यह खतरे में डालते जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग या वैश्विक तापमान बढ़ने का मतलब है कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है। सभी को यह खतरे में डालते जा रहा है।
पिघलते ग्लेशियर
पिछले १० सालों में धरती के औसत तापमान में ०.३ से ०.६ डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। आशंका यही जताई जा रही है कि आनेवाले समय में ग्लोबल वार्मिंग में और बढ़ोतरी ही होगी। ग्लोबल वार्मिंग से धरती का तापमान बढ़ेगा जिससे ग्लेशियरों पर जमी बर्फ पिघलने लगेगी। कई स्थानों पर तो यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है। हाल ही में खबर आई थी कि हिमालय पर गंगा के उद्गम स्थल पर जो ग्लेशियर है, वो पिघलकार काफी छोटा हो गया है। इसी तरह उत्तरी ध्रुव के ग्लेशियर के भी पिघलने की रिपोर्ट आई है। ग्लेशियरों की बर्फ के पिघलने का नतीजा होगा कि समुद्रों में पानी की मात्रा बढ़ जाएगी। साल-दर-साल उनकी सतह में भी बढ़ोतरी होती जा रही है। समुद्रों की सतह बढ़ने से प्राकृतिक तटों का कटाव शुरू हो जाएगा, जिससे एक बड़ा हिस्सा डूब जाएगा। इस प्रकार तटीय इलाकों में रहनेवाले अधिकांश लोग बेघर हो जाएंगे। इसका असर निसंदेह मुंबई जैसे शहरों पर पड़ेगा।
दक्षिण एशिया पर ज्यादा प्रभाव
‘मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ के वैज्ञानिकों की मानें तो धरती के तापमान में बढ़ोत्तरी का सबसे अधिक दुष्प्रभाव दक्षिण एशिया पर पड़ेगा। खासकर हिंदुस्थान, पाकिस्तान और बांग्लादेश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। जाहिर है जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा खामियाजा भी इन्हीं देशों को उठाना पड़ेगा। यहां लू के थपेड़ों में समय-समय पर विस्तार होगा और यहां रहने-बसने वाले लोगों के लिए सामान्य परिस्थितियों में रह पाना असंभव हो जाएगा। देखा जाए तो इन्हीं तीन देशों में दुनिया के २० फीसदी से अधिक गरीब रहते हैं जो सीधे तौर पर इस आपदा का मुकाबला कर पाने में अक्षम होंगे। सच तो यह है कि इन देशों की तकरीबन १.५ अरब आबादी उस स्थिति में जलवायु परिवर्तन की आपदा से सीधे-सीधे प्रभावित होगी। इसे झुठलाया नहीं जा सकता।
किसानों की खुदकुशी
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि हिंदुस्थान में किसानों की खुदकुशी के पीछे ग्लोबल वार्मिंग एक अहम वजह है। उनका मानना है कि देश में वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के साथ ही किसानों की खुदकुशी के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। उनकी मानें तो फसल तैयार होने के दौरान यदि तापमान में एक डिग्री की बढ़ोत्तरी होती है तो देश में ६५ किसान खुदकुशी करते हैं। और यदि तापमान ५ डिग्री बढ़ जाता है तो यह आंकड़ा ५ गुना और बढ़ जाता है। ऐसी परिस्थितियां ही किसानों को आत्महत्या के लिए विवश करती हैं। समूची दुनिया में ७५ फीसदी आत्महत्या की घटनाएं विकासशील देशों में होती हैं। इनमें २० फीसदी हिंदुस्थान में ही होती हैं। हमारे देश में हर साल एक लाख ३० हजार से अधिक आत्महत्याएं होती हैं। बीते ३० सालों में ५९ हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। वर्ष १९८० के मुकाबले देश में खुदकुशी की दर दोगुनी से भी ज्यादा हो गई है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि अगर २०५० तक तापमान में ३ डिग्री की बढ़ोत्तरी हुई जिसकी आशंका ज्यादा है तो आत्महत्या के मामले बढ़ेंगे।