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झांकी…उड़ता हिमाचल

उड़ता हिमाचल
किसी समय मादक पदार्थ चिट्टा अर्थात हेरोइन के लिए पंजाब बदनाम था। अब हिमाचल में ‘हेरोइन’ के नशे में युवा झूम रहे हैं और राज्य ‘उड़ता हिमाचल’ हो गया है। चिट्टे की गिरफ्त का नजारा शिमला के उपमंडल ठियोग के बाजार में दिखा। एक युवती चिट्टे के लिए रो रही थी और चीख रही थी। लड़की कह रही थी कि उसे चिट्टा दे दो, नहीं तो मर जाऊंगी। घटना यानी ९ सितंबर की है। लड़की की बाजू में इंजेक्शन के काफी गहरे निशान थे। थोड़ी पूछताछ के बाद लड़की के बताने पर उसकी मां को मौके पर बुलाया गया। जब मां वहां पहुंची तो पता चला कि १०-१२ दिन से गायब यह लड़की एक दिन पहले घर लौटी और थोड़ी देर रुकने के बाद फिर से भाग गई। ठियोग थाने में पुलिस उपाधीक्षक ने लड़की से पूछताछ की मगर लड़की पहले चिट्टा देने की जिद्द पर अड़ गई। काउंसलिंग के बाद लड़की ने बताया कि वह कुछ लड़कों के साथ थी। एक पूरी गैंग है, जिसके साथ मिलकर चिट्टा पार्टी की जाती है। लड़की बार-बार घर से भाग जाती है। कुछ समय पहले भी लड़की की मां ने पुलिस में शिकायत की थी। पुलिस ने जब पता किया तो लड़की ने खुद कहा कि वो अपनी मर्जी से घर से आई है और अपनी दोस्त के पास है। उल्लेखनीय यह है कि उसी समय देश का मीडिया हिमाचल से मुंबई तक दूसरा ही प्रसंग दिखाने पर आमादा था। लेकिन उसे हिमाचल में ड्रग का काला सच नहीं पता था या फिर पता रहा होगा सच्चाई नहीं दिखाना चाहते।
बेनीवाल की काट
राजस्थान में ऑपरेशन कमल की शानदार विफलता के बाद भाजपा पार्टी से बाहर गए बागियों की घर वापसी की मुहिम में जुट गई है। इनमें घनश्याम तिवाड़ी और मानवेंद्र सिंह के अलावा वसुंधरा सरकार के दो पूर्व मंत्रियों ऊषा पूनिया और सुरेंद्र गोयल के नाम शामिल हैं। कांग्रेस में जाने के बाद भी ये नेता कभी पार्टी के किसी मंच पर नजर नहीं आए। सुरेंद्र गोयल ने विधानसभा चुनाव-२०१८ में टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर कांग्रेस का दामन थाम लिया था। दिग्गज जाट नेता ऊषा पूनिया ने भी हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से उनके निवास में पहुंचकर मुलाकात की थी। राजे के जरिए पूनिया की पार्टी में वापसी हो सकती है। वैसे पूनिया के प्रति राजे के अतिरिक्त प्रेम के कारण अलग हैं। वसुंधरा को अपने घोर विरोधी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी नेता हनुमान बेनीवाल के खिलाफ एक मजबूत जाट नेता चाहिए, जिसे वे पार्टी में ऊषा पूनिया और उनके पति विजय पूनिया को मजबूती से खड़ा कर इस्तेमाल कर सकती हैं। इसकी वजह यह है कि ऊषा पूनिया विधानसभा चुनाव में मूंडवा में हनुमान बेनीवाल को शिकस्त दे चुकी हैं। हनुमान बेनीवाल अभी अपनी आरएलपी पार्टी के साथ भाजपा के सहयोगी के तौर पर ही हैं लेकिन वसुंधरा राजे के खिलाफ खुलकर बोलने का कोई मौका नहीं चूकते।
सामने समधन है…
राजनीति में मित्र और शत्रु स्थाई नहीं होते, स्थाई होते हैं स्वार्थ। इसी स्वार्थ का तकाजा है कि मध्यप्रदेश में ग्वालियर की डबरा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी सुरेश राजे एक बार फिर अपनी समधन से भिड़ेंगे। उनके सामने होंगी शिवराज सरकार में मंत्री इमरती देवी। यह दूसरा मौका है जब इस सीट पर इनके बीच टक्कर होगी। मजेदार बात यह है कि पिछले चुनाव में सुरेश राजे ने अपनी समधन इमरती का चुनाव प्रचार किया था। समधी-समधन के बीच २०१३ में भी मुकाबला हो चुका है। तब सुरेश राजे इमरती देवी के खिलाफ भाजपा के टिकिट पर चुनाव लड़े और ३२ हजार वोटों से चुनाव हार गए थे। २०१८ में सुरेश राजे भाजपा छोड़ कांग्रेस में आए और इमरती देवी के लिए प्रचार किया। किसी जमाने में सुरेश डबरा में भाजपा के बड़े नेता थे। विधानसभा चुनाव में अपनी समधन इमरती देवी का जोरदार प्रचार किया। जिसके चलते इमरती ने ५७ हजार की शानदार जीत हासिल की थी। २००८ में इमरती देवी १० हजार वोट से जीतीं। २०१३ में जीत का आंकड़ा ३२ हजार तो २०१८ में बढ़कर ५७ हजार पहुंच गया। उच्च वर्ग के वोटर पर मजबूत पकड़ के कारण डबरा सीट इमरती का गढ़ बन गया है। अब इस गढ़ को इस बार उनके समधी भेद पाते हैं की नहीं यह देखना रोचक होगा। वैसे यह सीट परंपरागत रूप से कांग्रेस की रही है।
वफादार बकरा
जब कोरोना संक्रमित मरीज से उसके अपने भी दूरी बना लें तब एक मूक प्राणी अपने मालिक का साथ न छोड़े तो इंसानों को सबक लेना चाहिए। बेजुबान जानवर भले ही इंसानों की भाषा न बोल सकें, लेकिन संवेदनशीलता के मामले में कभी-कभी उनका व्यवहार इंसानों को भी मात दे जाता है। झारखंड के सिमडेगा के बोलबा प्रखंड की मुखियाटोली में कोरोना जांच शिविर में ५० लोगों की जांच में दो लोगों को कोरोना संक्रमित पाया गया। कोरोना संक्रमितों को ले जाने के लिए जब एंबुलेंस आई तो एक बकरे के व्यवहार ने गांव वालों की आंखें नम कर दीं। एक कोरोना संक्रमित शख्स का पालतू बकरा एंबुलेंस में चढ़ गया और अपने मालिक के करीब जा खड़ा हो गया। उसकी पूरी कोशिश थी कि वह अपने मालिक के साथ ही जाए। काफी कोशिश के बावजूद उसे नीचे उतारना मुश्किल हो रहा था। नीचे उतारने के बाद जब एंबुलेंस चलने वाली थी तो बकरा एंबुलेंस के अगले चक्के के पास जा खड़ा हुआ। बकरे को किसी तरह से हटाकर एंबुलेंस चली गई तो वह घर की सीढ़ियों पर उदास होकर बैठ गया। लोगों ने कहा कि कोरोना के दौर में जब लोग अपनों से भी परहेज कर रहे हैं, उस समय इस बकरे ने संवेदनशीलता का एक सबक इंसानों को दिया है।