" /> झांकी… नड्डा का फंडा

झांकी… नड्डा का फंडा

नड्डा का फंडा
बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे, यह घोषणा कर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक तीर से कई निशाने लगा दिए हैं। पहला चिराग पासवान को बिना कहे संदेश कि अब जो कुछ (सीटों का बंटवारा) होगा वह बिना नीतीश की सहमति के नहीं होगा। दूसरा अपनी ही पार्टी के बड़बोले नेताओं को इशारा जो खुद को मुख्यमंत्री पद का दावेदार कहते नहीं अघाते। तीसरा अगर किसी कारणवश चुनाव परिणाम अनुकूल न हुए तो असफलता का ठीकरा नीतीश के सर फोड़ने में सुविधा हो। चौथा विपक्ष यानी अभी तक बिखरे पड़े महागठबंधन पर मुख्यमंत्री पद का चेहरा बताने का मानसिक दबाव बनाना और पांचवां नीतीश पर चुनाव जीतने की पूरी जिम्मेदारी डालकर बाहर से तमाशा देखने की सुविधा। वर्ष २०१५ के विधानसभा चुनाव में आमने-सामने की जंग में भाजपा ने २८ सीटें जदयू को हराकर जीती थीं। जदयू ने भी भाजपा को हराकर कई सीटें जीती थीं। इन पर मौजूदा विधायकों का क्या होगा? जो कम अंतर से हारे पार्टी के उन प्रत्याशियों का क्या होगा? तब भाजपा नीत राजग को केवल ५८ सीटें ही मिली थीं। अब बदले हुए राजनीतिक समीकरण में हारने और जीतने वाले नेताओं के लिए ऊहापोह की स्थिति है। खतरा यह है कि सीटों के बंटवारे में मन की न होने पर राजग में भगदड़ मच सकती है। इस भगदड़ का सीधा फायदा महागठबंधन को मिल सकता है। २०१५ में कुल २४३ सीटों में से महागठबंधन ने १७८ सीटों पर बंपर जीत हासिल की थी। इस बार जदयू विपक्षी खेमे में है। राजग में सबसे बड़ा फच्चर लोजपा का ही है, जो उन ९३ सीटों पर दावा कर रही है जहां पिछले चुनाव में न भाजपा जीती थी और न जदयू। दूसरा फच्चर हाल ही में राजग में आए जीतनराम मांझी भी हैं।
भाजपा के कांग्रेसी ‘यार’?
राजस्थान में ऑपरेशन लोटस की अपार विफलता के बाद भारतीय जनता पार्टी अपने घर की मरम्मत में जुटी है। पार्टी उन विधायकों की पहचान में जुटी है जो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सीधे संपर्क में थे। फिलहाल भाजपा की तलाश चार विधायकों पर जीरो डाउन हुई है। ये विधायक गत १४ अगस्त को सदन में विश्वासमत के दौरान गैरहाजिर थे। खबर है कि सचिन पायलट की वापसी न होने की उम्मीद में गहलोत ने सदन में ही भाजपा में सेंध लगाने की पूरी तैयारी कर ली थी। सवाल है कि क्या गहलोत ने कुछ विधायकों के विश्वास मत के दौरान अनुपस्थित रहने का बंदोबस्त किया था? खुद अशोक गहलोत ने पायलट के लौटने के बाद विधायक दल की बैठक में कहा था कि सरकार तो पायलट गुट के नहीं लौटने पर भी बचा लेते। यही वजह है कि चार विधायकों के गैरहाजिर रहने की वजह से ही भाजपा ने सदन में विश्वासमत पर मत विभाजन की मांग नहीं की थी। अगर ऐसा होता तो विपक्ष में ७५ की बजाय ७१ वोट ही पड़ते। इससे भाजपा की ही फजीहत होती। इन विधायकों से विधानसभा में विपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया से लेकर प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया तक ने पूछा कि व्हिप जारी होने के बावजूद विश्वासमत पर मतदान के वक्त वे कहां थे? इस पर चारों विधायकों के जवाब भी बड़े रोचक थे। एक ने तबीयत खराब होने, दूसरे ने गाड़ी बिगड़ने, तीसरे ने जानकारी ही न होने और चौथे ने मौसम की खराबी को अपनी गैरहाजिरी का कारण बताया था। साथ ही चारों ने सफाई दी कि उन्होंने पार्टी के साथ गद्दारी नहीं की है। विश्वासमत से पहले पार्टी को जानकारी मिली थी कि गहलोत उसके १२ विधायकों के संपर्क में थे, उनमें ये चार विधायक गोपीचंद मीणा, हरेंद्र निनामा, गौतम मीणा और कैलाश मीणा भी शामिल थे। इस सूचना के बाद ही भाजपा ने अपने १८ विधायकों को गुजरात भेजकर बाड़ेबंदी की थी।
‘हाथी’ पर नजर
ऊंट की करवट पर अटकलों की उलटबांसी अब नए कलेवर में मध्यप्रदेश की राजनीति में नजर आएगी। पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता कमलनाथ ‘हिंदुत्व’ का चोला धारण कर राज्य में २७ सीटों पर होने वाले उप चुनाव में कांग्रेस को अधिक से अधिक सीटें जिताने की व्यूहरचना में जुटे हैं। सारा खेल हाथी अर्थात बसपा पर टिक गया है। बसपा का हाथी जिस भी करवट बैठेगा, उससे भाजपा को ही राहत मिलने वाली है। २७ में से २२ सीटें ऐसी खाली हुई हैं, जिनके विधायक कांग्रेस छोड़ ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा में शामिल हुए हैं। कमलनाथ की रणनीति है कि उपचुनाव में इन सभी सीटों पर इस तरह की नाकेबंदी हो कि भाजपा अपने ही कारण हारे। इसमें सबसे ज्यादा ध्यान उन २२ सीटों पर है, जिन पर सिंधिया समर्थक जीते थे। अगर इस चुनाव में कांग्रेस बाजी मार ले जाती है तो सिंधिया का हर तरह से नुकसान होगा। वैसे भी सिंधिया की परेशानी ग्वालियर-चंबल संभाग में भाजपा के अंदर से है। खबर है कि कांग्रेस से बेहद नाराज चल रहीं मायावती की पार्टी बसपा ने भी उपचुनाव में सभी २७ सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने का फैसला किया है। २७ सीटों में से आधे से ज्यादा सीटें उन इलाकों में हैं, जहां बसपा का अच्छा-खासा दखल है। भले इन इलाकों में बसपा कोई सीट न जीत पाए लेकिन नुकसान करने की स्थिति में है। जाहिर है कि भाजपा के चुनावी प्रबंधक परदे के पीछे की रणनीति बनाने में जुटे हैं। भाजपा का मानना है कि चुनाव में बसपा का उतरना कांग्रेस के लिए सिरदर्द हो सकता है। वैसे भी भाजपा पर मायावती के तेवर इन दिनों नरम हैं।
झटके की तैयारी
ब्राह्मण राजनीति के मुद्दे पर घिरी उत्तर प्रदेश सरकार और सत्ताधारी पार्टी जल्द ही बहन जी अर्थात बसपा अर्थात मायावती को तगड़ा झटका दे सकती है। खबर है कि बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे कद्दावर नेता रामवीर उपाध्याय पर भाजपा ने डोरे डाले हुए हैं। नतीजा यह है कि विधायक जी के बेटे चिराग उपाध्याय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तारीफ में कशीदे पढ़ते हुए राम भक्त बन गए हैं। चूंकि अब राम मंदिर बनने जा रहा है तो भाजपा की विचारधारा में सपिता डुबकी लगाने को तैयार हैं। उपाध्याय का राजनीतिक गोत्र परिवर्तन जल्द ही लखनऊ में समारोह पूर्वक होगा। हाथरस के सादाबाद से बसपा के विधायक रामवीर उपाध्याय को पार्टी महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के बाद प्रमुख ब्राह्मण चेहरा माना जाता है। उन पर लोकसभा चुनाव में आगरा, फतेहपुर सीकरी, अलीगढ़ समेत कई सीटों पर पार्टी प्रत्याशी का विरोध करने का आरोप है। उन्हें बसपा ने विधानसभा में बहुजन समाज पार्टी के मुख्य सचेतक पद से भी हटा दिया है। साथ ही कहा गया है कि वे अब पार्टी के किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे और न ही उन्हें इसमें आमंत्रित किया जाएगा। बसपा ने रामवीर उपाध्याय की पत्नी सीमा उपाध्याय को फतेहपुर सीकरी से प्रत्याशी बनाया था, लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। इसके बाद रामवीर उपाध्याय अलीगढ़ में भाजपा प्रत्याशी सतीश गौतम और आगरा से भाजपा प्रत्याशी एसपी बघेल के साथ भी दिखे। कहा तो यह भी गया कि उन्होंने लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के लिए वोट मांगे थे। रामवीर ने सत्र समापन के बाद योगी के साथ लंबी बातचीत भी की है। तभी से उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलों को पंख लग गए हैं।