मुझ में देशप्रेम का जज्बा स्वाभाविक है! जॉन अब्राहम

आज से कुछ साल पहले जॉन अब्राहम देश के सुपर मॉडल थे। जॉन ने बॉलीवुड में २००३ में आई फिल्म ‘जिस्म’ से बॉलीवुड में कदम रखा। इस फिल्म की सफलता के बाद जॉन के लिए बॉलीवुड के दरवाजे तो खुल गए पर उनकी मॉडल और माचो मैन की इमेज दूर होने में तकरीबन १० वर्ष बीते। ‘विकी डोनर’ और ‘मद्रास वैâफे’ जैसी सशक्त फिल्मों का निर्माण उन्होंने किया। उसके बाद उनके प्रति बॉलीवुड, मीडिया और उनके पैंâस का नजरिया बदल गया। १५ अगस्त को उनकी फिल्म ‘बाटला हाउस’ रिलीज हो रही है। जॉन से बातचीत की पूजा सामंत ने। प्रस्तुत है मुख्य अंश-
देशभक्ति या देश से संबंधित घटनाओं-सामाजिक सरोकार की मुद्दों पर बनी फिल्म का इन दिनों जब निर्माण होता है मेकर्स आपको याद करते हैं। आप इस बात को किस रूप में लेते है?
बेहद अच्छा लगता है। शायद मेरा देशप्रेम, मेरी फिजीकेलिटी को देख नजर आता होगा। मैं फिल्मों का एक्टर और फिर निर्माता बाद में बना हूं लेकिन हिंदुस्थान के लिए मेरा प्रेम बचपन से है। यह नैचरल जज्बा है देश के लिए। हम सभी में होता है, होना भी चाहिए। अपने देश से प्यार यानी अपनी मातृभूमि-मां से प्यार!
आपने इसमें एक्टिंग की और साथ में निर्माता भी बने। क्या खास लगा इस फिल्म में?
निर्देशक निखिल आडवाणी ने इस फिल्म की स्क्रिप्ट मुझे दी और पढ़ने को कहा। मैंने इसे तुरंत पढ़ा और हां कह दिया। सच्चाई हकीकत से काफी अलग और चौंकाऊ होती है। जितना मैंने ‘बाटला हाउस’ के बारे में सुना था, उससे कहीं अधिक इस फिल्म की कहानी और सच्चाई है। मेरा किरदार संजीव कुमार के जितना हो सके मैंने साकार करने की कोशिश की है। संजीव कुमार (बाटला हाउस के पुलिस अफसर ) की पत्नी गृहिणी दिखाने से बेहतर होगा अगर हम इसे न्यूज रीडर दिखाएं यह मैंने कहा निर्देशक निखिल आडवाणी से। और यही सच निकला। संजीव की पत्नी सचमुच न्यूज रीडर है। ऐसे तथ्य चौंकाऊ लगे।
सेंसेटिव इशूज पर जब भी फिल्में बनी हैं निर्माता को सावधानियां बरतनी पड़ती हैं, आपने किन बातों का ध्यान रखा?
हां, सेंसेटिव विषयों पर फिल्मों का निर्माण जब होता है मेकर्स को जनहित में उन मुद्दों का खासा ध्यान रखना पड़ता है। अगर मैं अपनी बात करूं -मेरे डैड पारसी और मां प्रोटेस्टेंट-केरल की हैं यानी मैं अपने दोनों पेरेंट्स की तरफ से मायनॉरिटी में हूं। किसी की धार्मिक भावनाओं को हमने दुखाया नहीं, ध्यान दिया। मैं जब रियलिस्टिक फिल्म बनाता हूं तो ऐसे में मुझे अपने किरदार का ही ध्यान रखना पड़ता है। किरदार के जीवन में अगर कुछ कांड हुआ है। कुछ गलतियां हुई हैं तो फिल्म में भी वही दिखाना होगा। मैं क्रिएटिव लिबर्टी नहीं ले सकता।
फिल्म १५ अगस्त को रिलीज होने पर कोर्ट ने बैन लगा रखा है। क्या कहना चाहेंगे?
यह मैटर इस समय कोर्ट में है, इस टॉपिक पर कुछ कहने में असमर्थ हूं। इतना जरूर कह सकता हूं कि सेंसर बोर्ड ने फिल्म को सर्टिफाई कर दिया है, उन्हें इस फिल्म कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा।
आप पर निर्माता और एक्टर दो-दो जिम्मेदारियां हैं…
यह सवाल मुझे बहुत अच्छा लगा। मैं निर्माता इसीलिए बना क्योंकि मुझे वैसे रोल नहीं मिल रहे थे, जिसे करने के लिए मैं उत्सुक था। एक्टर के रूप में मेरी ग्रोथ सभी ने तब देखी जब मैं खुद प्रोड्यूसर बना। मैंने वही फिल्में बनानी चाहीं जो नए दौर की है।  मेरे ‘विकी डोनर’ बनाने के बाद ‘शुभमंगल सावधान’, ‘बधाई हो’, ‘खानदानी शफाखाना’ फिल्मों के लिए रास्ता बना। मेरे ‘मद्रास वैâफे’ बनाने बाद अभी रिलीज हुई फिल्म ‘आर्टिकल १५’ का निर्माण हुआ।
आपकी हर फिल्म में लीड एक्ट्रेस रिपीट नहीं होती। हर फिल्म में आपके साथ अलग-अलग अभिनेत्रियां होती हैं जबकि बॉलीवुड में ऐसा माना जाता है कि हीरो और हीरोइन में केमिस्ट्री होनी चाहिए। ऐसा क्यों?
अगेन अ गुड क्वेश्चन! सच यही है कि मैं अपनी फिल्मों की नायिकाओं का चयन करने में कोई निर्णायक भूमिका नहीं लेता। यह तो निर्देशक का अपना लुकआउट है कि उन्हें मेरी फिल्म के बजट, कितने समय में इसे पूरा करना है और मेरी उपलब्धियों के अनुसार जो भी नायिका मिले, उसे वो ले लेते हैं।