" /> भाजपा-बसपा की जुगलबंदी!

भाजपा-बसपा की जुगलबंदी!

लंबे समय से अपने बयानों से अपरोक्ष रुप से भारतीय जनता पार्टी की मदद करती आ रहीं बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती के इस प्रेम का राज आखिरकार बाहर आ ही गया। उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनावों में भाजपा ने थाली में सजाकर एक सीट बसपा को भेंट कर दी। अपनी इस छुपी दोस्ती का खुलासा राज्यसभा चुनावों के लिए नामांकन के बस एक दिन पहले किया और इस तरह जरूरी विधायकों की आधी तादाद होने के बाद भी बसपा के एक सदस्य का राज्यसभा पहुंचना तय हो गया है। हालांकि आखिरी क्षणों ने समाजवादी पार्टी ने एक निर्दलीय प्रत्याशी प्रकाश बजाज को समर्थन देकर भाजपा-बसपा के इस प्यार में रोड़े अटकाने की कोशिश की है। कोई बड़ा उलटफेर न हुआ तो फिलहाल संसद के उच्च सदन के लिए उत्तर प्रदेश से रिक्त दस सीटों में से भाजपा के आठ, सपा व बसपा के एक-एक प्रत्याशी का चुना जाना लगभग तय हो गया है। केंद्र में मंत्री रहे दिवंगत अखिलेश दास की पत्नी डॉक्टर अलका दास ने आखिरी दिन पर्चा खरीदा तो लगा कि सियासी गणित में उथल-पुथल के साथ ही खरीद-फरोख्त की संभावनाएं जन्म लेंगी। लेकिन उन्हें पर्याप्त प्रस्तावक ही नहीं मिले। आखिरी पलों में सपा समर्थित प्रकाश बजाज के आने से एक बार फिर चुनाव होना तय हो गया है। प्रकाश बजाज का आखिरी मिनट में नामांकन जीत से ज्यादा बसपा-भाजपा का खेल बिगाड़ने के लिए और उन्हें कड़ी मशक्कत कराने की कवायद लग रहा है।
दरअसल, उत्तर प्रदेश में लंबे समय से विपक्ष यह आरोप लगाता आ रहा है कि बसपा विरोध की जगह भाजपा की बी टीम काम कर रही है। हाल ही में बिहार के चुनावों में महागठबंधन को नुकसान पहुंचाने के लिए छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ना हो या फिर मध्यप्रदेश में होने वाले उपचुनावों में प्रत्याशी उतारना हो, चाहे तमाम महत्वपूर्ण मौकों पर खुल कर केंद्र व राज्य सरकार के पाले में खड़ा होना रहा हो। विपक्ष मायावती पर लगातार भाजपा के लिए काम करने का आरोप लगाता रहा है। बसपा को राज्यसभा की सीट दिलाने के लिए भाजपा की कुर्बानी ने इन आरोपों पर मुहर लगा दी है।
दरअसल उत्‍तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव २०२२ में होने हैं लेकिन राजनीतिक दल इसकी तैयारियां अभी से शुरू कर चुकी हैं। भारतीय जनता पार्टी एक बार जीत कर सत्‍ता में बैठने की कोशिश में लगी है तो वहीं समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी जनता को लुभाने की पूरी तैयारी कर रही है। वहीं कांग्रेस भी अपनी पार्टी को दोबारा खड़ा करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।
इस बीच कई दल मिल रहे हैं तो कई के दिल‍ मिल रहे हैं। कभी बीजेपी के सहयोग से यूपी में मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर बैठी मायावती वैसे तो बीजेपी को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ती हैं। लेकिन इन दिनों उन पर आरोप लग रहे हैं कि उन्‍होंने बीजेपी से अंदरखाने गठबंधन कर लिया है। इस बात को और बल मिल गया जब बीजेपी ने राज्‍यसभा चुनाव के लिए अपने उम्‍मीदवारों की लिस्‍ट जारी की। इस चुनाव में ऐसे समीकरण बन रहे है जिससे बीजेपी १० में से ९ सीटों पर जीत सकती है। लेकिन बीजेपी ने केवल आठ उम्‍मीदवारों की लिस्‍ट जारी की। बीजेपी के सभी ८ प्रत्याशी बुधवार को नामांकन कर चुके हैं।
दिलचस्प बात ये है कि कम विधायक संख्या होने के बावजूद इस बार बसपा ने भी अपना प्रत्याशी खड़ा किया है। अगर बीजेपी प्रत्याशी खड़ा करती तो बसपा की राहें आसान नहीं होती। इसे कहीं न कहीं बीजेपी के मिशन २०२२ में बसपा के लिए एक संकेत माना जा सकता है क्योंकि बीजेपी या उसके सहयोगी दल का ९वां प्रत्याशी अगर मैदान में नहीं होगा तो चुनाव नहीं होगा और बसपा-सपा सहित सभी बीजेपी के प्रत्याशी आराम से राज्यसभा पहुंच जाएंगे। बसपा राज्यसभा की एक सीट के लिए अपने कद्दावर दलित नेता रामजी गौतम का नामांकन कराया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा के केवल १८ विधायक ही हैं। इनमें से भी दो पहले के नाराज चल रहे हैं और सत्तारुढ़ भाजपा के नजदीक हैं। इतना ही नहीं महज १६ विधायकों के दम पर अपना प्रत्याशी उतारने से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने अन्य विपक्षी दलों सपा या कांग्रेस को विश्वास तक में नहीं लिया था। इन पैंतरों से भी साफ हो जाता है कि कहीं न कहीं उन्हें भाजपा की ओर से हरी झंडी मिल चुकी थी। अपना एक प्रत्याशी जिताने के बाद सपा के पास एक दर्जन तो कांग्रेस के पास पांच विधायक थे। इस बीच सपा समर्थित प्रकाश बजाज के मैदान में आ जाने से जरूर नीरस चुनाव में रंग आ गया है। प्रकाश बजाज के साथ सपा के बचे हुए विधायकों के अलावा, कांग्रेस के पांच, राजभर की पार्टी के चार और कुछ असंतुष्ट आकर भाजपा-बसपा जुगलबंदी का खेल खराब कर सकते हैं।
इस बीच यूपी कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि बीएसपी और बीजेपी के बीच छुपन-छुपाई गठबंधन हुआ है। बीजेपी उम्मीदवार की लिस्ट जारी होने के बाद यूपी कांग्रेस ने ट्वीट किया, ‘बीजेपी की हालत पतली है। बीएसपी उपचुनावों में बीजेपी को वोट ट्रांसफर करे इसके लिए बीएसपी-बीजेपी के छुपन-छुपाई गठबंधन का एलान हुआ। दूसरी ओर इस लिस्ट में बीजेपी ने जातीय समीकरण को साधने की पूरी कोशिश की है। तमाम विपक्षी दलों द्वारा योगी सरकार में ब्राह्मण विरोध के सुर बुलंद किए जा रहे थे।
वहीं, इस लिस्ट में पार्टी ने दो क्षत्रियों के साथ दो ब्राह्मण प्रत्याशियों को जगह देकर कहीं न कहीं संतुलन साधने और विरोधियों को जवाब देने की कोशिश की है। बीजेपी ने क्षत्रिय, पिछड़े, एससी और अल्पसंख्यक समुदाय के साथ महिलाओं की नुमाइंदगी का भी खयाल रखा है। बीजेपी की लिस्ट में सीमा द्विवेदी और गीता शाक्य दो महिला चेहरे भी हैं। वहीं, जातियों की बात करें तो अरुण सिंह, नीरज शेखर (क्षत्रिय), हरिद्वार दुबे और सीमा द्विवेदी (ब्राह्मण), बीएल वर्मा और गीता शाक्य (पिछड़े वर्ग) से हैं, जबकि यूपी के पूर्व डीजीपी बृजलाल एससी और हरदीप सिंह पुरी सिख हैं। भाजपा ने विधायकों की संख्याबल के हिसाब से दस में से आठ सीटों पर जीत की तैयारी शुरू कर दी है। गौरतलब है कि निर्वाचन आयोग ने राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव की घोषणा १३ अक्टूबर को की थी। इन सीटों के लिए चुनाव की अधिसूचना २० अक्टूबर को जारी हो गई है। घोषित कार्यक्रम के अनुसार २७ अक्टूबर नामांकन की अंतिम तिथि है। २८ अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच की होगी। जरुरी हुआ तो नौ नवंबर को मतदान होगा वरना सभी प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिए जाएंगे।
जानकारों का कहना है कि राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के आठ उम्मीदवारों की सूची जारी कर मतदान के सीधे शक्तिप्रदर्शन से बचाव किया है। पार्टी ने जातीय संतुलन साधने के साथ बृजलाल, गीता शाक्य व बीएल वर्मा जैसे नये चेहरों को भी मौका दिया है। भाजपा ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री महासचिव तथा केंद्रीय कार्यालय प्रभारी अरुण सिंह के साथ पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर को फिर से राज्यसभा में भेजने का फैसला लिया है। सेवानिवृत डीजीपी बृजलाल तथा पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के करीबी समाज कल्याण निर्माण निगम के अध्यक्ष बीएल वर्मा भी उम्मीदवार बनाए गए हैं। पूर्व मंत्री हरिद्वार दुबे व पूर्व विधायक सीमा द्विवेदी को राज्यसभा भेजा जा रहा है। औरैया की जुझारू नेता गीता शाक्य के जरिए नेतृत्व ने महिला व पिछड़ा कोटा पूरा करने के साथ बुंदेलखंड को भी प्रतिनिधित्व प्रदान किया है। भाजपा ने आठ उम्मीदवार उतारकर मतदान की जंग में सीधे नहीं उतरने का इरादा बनाया था जिस पर सपा की पैंतरेबाजी ने पानी फेर दिया है।
उत्‍तर प्रदेश से नवंबर में १० राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल खत्म होने जा रहा है। इन नेताओं में भाजपा के अरुण सिंह, नीरज शेखर, हरदीप सिंह पुरी, समाजवादी पार्टी के जावेद अली खान, राम गोपाल यादव, चंद्रपाल सिंह यादव, रवि प्रकाश वर्मा, बसपा के राजाराम, वीर सिंह, कांग्रेस के पीएल पुनिया जैसे दिग्‍गज शामिल हैं।
बहरहाल राज्यसभा की एक सीट के लिए भाजपा की बसपा के लिए दी गयी कुर्बानी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति के लिए आगे की तस्वीर साफ कर दी है। इतना तय माना जा रहा है कि बसपा अब यूपी में भाजपा की राह आसान करने और सपा व कांग्रेस के लिए कांटे बोने का काम करेगी। अब बसपा सुप्रीमो अपने लिए यह आत्मघाती कदम उठाकर क्या हासिल कर पाती हैं, ये तो आने वाला समय ही बताएगा।