" /> कश्मीर की कलह… हिंदुओं की हत्या का नया दौर!

कश्मीर की कलह… हिंदुओं की हत्या का नया दौर!

कश्मीर घाटी में हिंसा और हत्या का नया दौर शुरू हुआ है। आतंकवादियों ने सरकारी विद्यालय में घुसकर एक सिख महिला प्राचार्य सतिंदर कौर और हिंदू शिक्षक दीपक पंडित की पहचान करके हत्या कर दी। जबकि मुस्लिम शिक्षकों को बख्श दिया। आतंकियों का पहचान-पत्र देखकर हत्या का तरीका बताता है कि अब आतंकी संगठन घाटी में सांप्रदायिक-सद्भाव को रक्तरंजित कर देना चाहते हैं। क्योंकि इसके पहले जिहादी अलग-अलग हमलों में तीन आम नागरिकों की हत्या कर चुके हैं। मारे गए लोगों में से एक कश्मीरी पंडित माखनलाल बिंदरू श्रीनगर के प्रसिद्ध दवा विक्रेता थे। दूसरी घटना श्रीनगर के लाल बाजार क्षेत्र में बिहार के गोलगप्पे बेचनेवाले वीरेंद्र पासवान की हत्या थी। वह बिहार के भागलपुर का रहनेवाला था। तीसरी घटना बांदीपोरा में घटी, जिसमें मोहम्मद सफी लोन की आतंकियों ने निर्मम हत्या कर दी थी। साफ है, आतंकियों ने तीन धर्मों से जुड़े लोगों की हत्या करके सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की कोशिश की है। दरअसल घाटी की बदलती स्थिति को आतंकी कुबूल नहीं कर पा रहे हैं। नतीजतन वे सिलसिलेवार बचे-खुचे अल्पसंख्यकों की हत्याएं करके ऐसी दहशत पैदा करना चाहते है कि घाटी से तीन दशक पहले खदेड़ दिए गए हिंदुओं की वापसी की जो उम्मीदें बंधी हैं, उन पर पानी फिर जाए। इस दहशतगर्दी के पीछे एक वजह यह भी है कि धारा-३७० और ३५-ए के खात्मे के बाद विस्थापित गैर-मुस्लिमों की संपत्तियों से अवैध कब्जे हटाने की मुहिम तेज हो गई है। १९९० के बाद यह पहला अवसर है कि विस्थापितों की जायदाद से कब्जे छुड़ाकर वास्तविक भूमि-स्वामियों को संपत्ति सौंपी जा रही हैं। लिहाजा पाकिस्तान परस्त आतंकी चाहते हैं कि कश्मीरी हिंदुओं की वापसी मुश्किल बनी रहे। कश्मीर का एकतरफा सांप्रदायिक चरित्र तब गढ़ना शुरू हुआ था, जब ३१ साल पहले नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री डॉ. फारूख अब्दुल्ला के घर के सामने सितंबर, १९८९ में भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष टीकालाल टपलू की हत्या जिहादियों ने कर दी थी। अलगाववादी हड़ताल तथा उग्र व हिंसक प्रदर्शन करने लगे। ९ जनवरी, १९९० को चरमपंथियों ने तुगलकी फरमान सुनाया था कि कश्मीरी पंडित एवं अन्य हिंदू काफिर हैं। इसी समय मस्जिदों से एलान किया गया, हम क्या चाहते हैं? निजाम-ए-मुस्तफा, रलीव, गलीव, चलीव (धर्म बदल लो, मारे जाओ या भाग जाओ) अपनी युवा पत्नियों और कुंवारी कन्याओं को यहीं छोड़ जाओ। इस एलान के साथ ही उन्मादी भीड़ गैर-हिंदुओं पर टूट पड़ी थी। इसके बाद हिंदुओं से जुड़ी १५० शैक्षिक संस्थाओं में आग लगा दी गई। १०३ मंदिरों, धर्मशालाओं और आश्रमों को तोड़ दिया गया। पंडितों की दुकानों और कारखानों को लूट लिया। आगजनी और लूट की १४,४३० घटनाएं घटीं। २०,००० से ज्यादा पंडितों की खेती योग्य जमीन छीनकर उन्हें भगा दिया गया। ११,०० से ज्यादा पंडितों की निर्मम हत्याएं कर दी गईं। नतीजतन ९५ प्रतिशत पंडित घर छोड़ने के लिए विवश हो गए और १९ जनवरी, १९९० अल्पसंख्यक हिंदुओं के सामूहिक पलायन का सिलसिला शुरू हो गया। उस समय जम्मू-कश्मीर राज्य में कांग्रेस तथा नेशनल कांप्रâेंस गठबंधन की सरकार थी और डॉ. फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे। इस बेकाबू हालत को नियंत्रित करने में राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने की बजाय २० जनवरी, १९९० को एकाएक अब्दुल्ला कश्मीर को जलता छोड़ लंदन भाग गए। केंद्र में वीपी सिंह प्रधानमंत्री और मुफ्ती मोहम्मद सईद गृहमंत्री थे। कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन ने सेना के हस्तक्षेप के लिए केंद्र सरकार से गुहार लगाई लेकिन मंडल-कमंडल के राजनैतिक खेल में लगे वीपी सिंह ने देश की संप्रभुता को सर्वथा नजरअंदाज कर दिया। गोया, घाटी में आतंक व अलगाव को फलने-फूलने का खुला अवसर मिल गया। इस पूरे घटनाक्रम में यासीन मलिक और बिट्टा कराटे उर्फ फारूख अहमद डार की प्रमुख भूमिका रही थी, जिसे इन दोनों अलगाववादियों ने सार्वजनिक मंचों से स्वीकारा भी था। बिट्टा और मलिक नरसंहार और आगजनी के अरोपों में दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं लेकिन उन्हें अभी वह सजा नहीं मिली है, जिसके वे वास्तव में कसूरवार हैं।
१९९० में शुरू हुए इस पाक प्रायोजित आतंकवाद के चलते घाटी से कश्मीर के मूल सांस्कृतिक चरित्र के प्रतीक कश्मीरी पंडितों को बेदखल करने की सुनियोजित साजिश रची गई थी। इस्लामी कट्टरपंथियों का मूल मकसद घाटी को हिंदुओं से विहीन कर देना था। इस मंशापूर्ति में वे सफल भी रहे। देखते-देखते वादी से हिंदुओं का पलायन शुरू हो गया और वे अपने ही पुश्तैनी राज्य में शरणार्थी बना दिए गए। ऐसा हैरान कर देनेवाला दूसरा उदाहरण अन्य किसी देश में नहीं है। पूरे जम्मू-कश्मीर में करीब ४५ लाख कश्मीरी अल्पसंख्यक हैं, जिनमें से ७ लाख से भी ज्यादा विस्थापन का दंश झेल रहे हैं। घाटी में मुस्लिम एकरूपता इसलिए है, क्योंकि वहां से मूल कश्मीरी हिंदुओं का पलायन हो गया है और जो शरणार्थी हैं, उन्हें बीते ७४ साल में न तो देश की नागरिकता मिली है और न ही वोट देने का अधिकार मिला है। इन सिलसिलेवार हमलों के बाद कश्मीर में एक बार फिर अल्पसंख्यक पलायन को मजबूर हो रहे हैं। दरअसल अनुच्छेद-३७० हटने के बाद भी हालातों में सुधार नहीं हो पा रहा है, तो इसका एक बड़ा कारण मजहबी कट्टरता पर चोट नहीं कर पाना है। अफगानिस्तान में तालिबानी कब्जे के बाद इस सोच को बल मिला है। गोया, साफ है कि यह समस्या अब राजनीतिक व संवैधानिक नहीं रह गई है, बल्कि अब धार्मिक चरमपंथ के रूप में सामने आ रही है। इस हिंसक उन्माद की सोच पाकिस्तान से निर्यात आतंकवाद तो है ही, घाटी में कुकुरमुत्तों की तरह मस्जिदों और मदरसों में पैâला, वह शिक्षा का तंत्र भी है, जो आतंक की फसल बोने और उगाने का काम करता है। यही वजह है कि जितने भी इस्लामिक देश हैं, उनमें न तो अल्पसंख्यकों का जनसंख्यात्मक घनत्व बढ़ रहा है और न ही उन्हें नागरिक समानता के अधिकार मिल रहे हैं। कश्मीर में भी जिहादी चाहते हैं कि गैर-मुस्लिम या तो इस्लाम स्वीकार करें या फिर घाटी छोड़ जाएं।
दरअसल मुस्लिमों की इस दोषपूर्ण मंशा को संविधान निर्माण के समय ही डॉ. भीमराव आंबेडकर ने समझ लिया था। शेख अब्दुल्ला ने जब जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने की मांग की तो आंबेडकर ने सख्त लहजे में कहा था कि आप चाहते हो कि हिंदुस्थान, कश्मीर की रक्षा करे, कश्मीरियों की आर्थिक सुरक्षा करे, कश्मीरियों को संपूर्ण हिंदुस्थान में समानता का अधिकार मिले लेकिन हिंदुस्थान और अन्य भारतीयों को आप कश्मीर में कोई अधिकार देना नहीं चाहते? मैं देश का कानून मंत्री हूं और मैं अपने देश के साथ कोई अन्याय या विश्वासघात किसी भी हालत में नहीं कर सकता हूं। विडंबना देखिए कि मुस्लिम समाज देश में हर जगह वृहद हिंदू समाज के बीच अपने को सुरक्षित पाता है, किंतु जहां कहीं भी हिंदू, अल्पसंख्यक मुस्लिमों के बीच रह रहे हैं, उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। बावजूद पं. नेहरू के अनावश्यक दखल से कश्मीर को विशेष दर्जा मिल गया। इस भिन्नता का संकट देश बंटवारे से लेकर अब तक भुगत रहा है। यही वजह है कि इस बंटवारे के बाद पाकिस्तान से जो हिंदू, बौद्ध, सिख और दलित शरणार्थी के रूप में जम्मू-कश्मीर में ही ठहर गए थे, उन्हें मौलिक अधिकार आजादी के ७४ साल बाद भी पूरी तरह नहीं मिले हैं। इनकी संख्या करीब ७०-८० लाख है, जो ५६ शरणार्थी शिविरों में सभी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से महरूम रहते हुए बद से बदतर जिंदगी का अभिशाप धारा-३७० हटने से पहले तक भोगते रहे हैं।
वर्तमान में कश्मीरी पंडितों का घर वापसी का मुद्दा वैसा नहीं रह गया है, जैसा शुरू के कुछ वर्षों तक था। दरअसल ३१ साल की इस लंबी अवधि में एक पूरी पीढ़ी बदल जाती है, जो विस्थापन के समय बालक थे, वे अब युवा हो चुके हैं और जो उस समय जवान थे, वे अब बूढ़े हो रहे हैं। अपनी मूल जड़ों से जुदा होकर विस्थापितों ने बदहाल शिविरों में वैâसे दिन गुजारे, इसकी कल्पना ही रूह कंपा देनेवाली है। देश की राजधानी दिल्ली समेत कई हिस्सों में आज भी कश्मीरी पंडित शरणार्थियों का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बावजूद अनेक युवाओं ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कमयाबी हासिल की और समाज पर छाप छोड़ी है लेकिन उन्हें जम्मू-कश्मीर का मूल नागरिक होने के पश्चात भी लाचारी का जो जीवन गुजरना पड़ा है, उससे पूर्व की केंद्र व राज्य सरकारों तथा घाटी के समुदाय विशेष के लोगों का अपराध कम नहीं हो जाता? आखिर किसी भी सभ्य और संवैधानिक व्यवस्था में ऐसी स्थिति को किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि देश के ही एक हिस्से के नागरिकों को जान बचाने के लिए घर-बार छोड़कर पलायन को मजबूर होना पड़ा हो। यह सवाल जहां कानूनी राज्य व्यवस्था पर हैं, वहीं उस राजनीतिक प्रक्रिया पर भी है कि वह ३१ साल बीत जाने के बावजूद विस्थापितों का पुनर्वास नहीं कर पाई है। जबकि उस गलती को नरेंद्र मोदी सरकार ने सुधार दिया है, जो कश्मीर को विशेष दर्जा देने के अधिकार के साथ नेहरू से हुई थी। बहरहाल गैर-मुस्लिमों की हत्या का जो नया दौर शुरू हुआ है, उससे कश्मीरियत तो कलंकित हुई ही है, संपूर्ण विपक्ष का चेहरा भी बेनकाब हुआ है। आखिर ये सभी दल यह सामूहिक कोशिश और साझा संकल्प क्यों नहीं लेते कि पंडितों समेत जो भी निर्वासित लोग हैं, उन्हें बसाने की पहल करें ?
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)