" /> ‘नाजायज’ वायरस का ‘जायज’ नाम!

‘नाजायज’ वायरस का ‘जायज’ नाम!

भूमिका बांधने से पहले एक किस्सा जरूरी है। किस्सा क्या, हिस्सा ही है इस घटनाक्रम का। दिन- २४ मार्च, २०२०। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने अपने भारतीय समकक्ष डॉ. एस. जयशंकर को फोन करके एक खास अपील की। अपील यह कि ‘सार्स सीओवी-२’ वायरस को लेकर हो रहे वैश्विक दुष्प्रचार का हिंदुस्थान हिस्सा न बने। ‘‘अमेरिका में कुछ लोग इस वायरस को चीन से जोड़कर उसे कलंकित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिस पर चीन को कड़ी आपत्ति है। खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और अंतरराष्ट्रीय समुदाय किसी वायरस या बीमारी को देश, धर्म या किसी समुदाय से जोड़ने के खिलाफ है। इसलिए चीन को हिंदुस्थान से सहयोग की उम्मीद है।’’ उम्मीद यह भी कि हिंदुस्थान चीन को कलंकित करनेवालों का विरोध करेगा।

अभी तीन माह पहले तक चीन हमसे यही अपील कर रहा था, गुजारिश कर रहा था कि ‘सार्स सीओवी-२’ वायरस को किसी तरह ‘वुहान’ या ‘चीन’ से जोड़कर निरूपित न किया जाए। साथ ही इससे होनेवाले रोग को डब्ल्यूएचओ द्वारा दिए गए नाम ‘कोविड-१९’ से ही संदर्भित किया जाए। कहने को तो ये चीन की अपील थी, रिक्वेस्ट थी पर इस दौरान भी उसकी भाषा में तल्खी कमाल की थी। चीन ने जोर देकर कहा कि उसे बदनाम करना न केवल संकीर्ण मानसिकता का परिचायक होगा, बल्कि वायरस को चीनी नाम देना अस्वीकार्य और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए हानिकारक भी। मतलब, अपीलीय जुबान में भी खुल्लमखुल्ला धमकी। पिछली डेढ-दो दहाई से चीन इसी आक्रामकता से हमें घेरने और तोड़ने का पुख्ता काम करता आ रहा है, यह हम बखूबी जानते हैं फिर भी हम उसकी धूर्त मानसिकता पर हर बार आंखें मूंदे रहते हैं। हम यह भी जानते हैं कि वो जिससे सहयोग मांगता है, उसी को मुसीबत में भी डालता है। फिर भी हम हमेशा उससे नावाकिफ बने रहते हैं। अलबत्ता, इसी बीच खबर आई कि हमारे विदेश मंत्री ने चीन की ‘चिकनी चुपड़ी अपील’ पर तुरंत रजामंदी दर्शा दी है। यह कहकर कि किसी वायरस को लेबल नहीं किया जाना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मिलकर एकजुटता का संदेश देना चाहिए, उन्होंने सहमति का सिर भी हिला दिया है। खैर, इसके पीछे की सच्चाई, कूटनीतिक जरूरत और ‘दोस्ती’ की जल्दबाजी का सच तो केंद्र की सरकार ही जाने। परंतु हां, अब दुनिया जरूर जान चुकी है। जान चुकी है कि जिस वक्त चीन इस ‘सहयोग’ का ‘दोस्ताना’ दौर चला रहा था, उसी वक्त से उसकी सेना इंडो-तिब्बत सीमा पर कदम-दर-कदम हमारी भूमि हथिया रही थी… एक सोची-समझी रणनीति के तहत। परंतु ताज्जुब यह कि इस बार भी हमें इसकी भनक ही नहीं लगी… और जब लगी भी तो काफी देर हो चुकी थी। खैर, चीन के कपटी स्वभाव और ‘सहयोग’ के ढोंग का पोस्टमार्टम बाद में। फिलहाल तो बात उसके ‘नाजायज’ वायरस के ‘जायज’ नाम की।

‘स्पेनिश फ्लू’ किसका कलंक?
‘सार्स सीओवी-२’ वायरस पर बात करने से पहले थोड़ा इतिहास में चलते हैं। बात शुरू करते हैं एक सदी पहले की त्रासदी ‘स्पेनिश फ्लू’ से। १९१८ के बसंत में इस महामारी ने दुनिया में पहली दस्तक दी थी, आज से तकरीबन सौ साल पहले। प्रथम विश्व युद्ध के खत्म होने के साथ ही। पहले विश्व युद्ध ने जहां ४ करोड़ से अधिक जानें लीं तो उसके बाद आई महामारी ने उससे दोगुनी यानी करीब ८ करोड़। अनुमान अधिकतम १० करोड़ तक का भी है। सिर्फ हिंदुस्थान में ही तब डेढ से लेकर दो करोड़ जानें गई थीं। उस महामारी के तीन दौर चले थे। कुछ देशों ने तो चार दौर तक देखे। स्पेन.., जिसके नाम पर सहस्त्राब्दी की इस भीषण महामारी का कलंक है, असलियत में वो महामारी वहां पैदा ही नहीं हुई थी। माना जाता है कि इसका पहला चरण जर्मनी से शुरू हुआ था। तब दुनिया भर में प्रेस की स्वतंत्रता पर संकट था। सिर्फ स्पेन में उस पर प्रतिबंध न के बराबर थे। इसलिए स्पेन में महामारी की भरपूर खबरें छपीं। इसी वजह से उसका नाम पड़ गया ‘स्पेनिश फ्लू’। जैविक या जैनेटिक नाम के आभाव में यह प्रचलित भी हो गया। गुजरते समय ने न केवल इसे सही नाम दिया, बल्कि इसके असल स्त्रोत की करीब-करीब पहचान भी कर ली… और तब नाम सामने आया तो चीन का। दरअसल, ‘स्पेनिश फ्लू’ के लिए जर्मन भी नहीं, बल्कि चीनी ही जिम्मेदार थे। कहते हैं कि तब एक ‘दरवाजा बंद गाड़ी’ में चीनी मजदूरों को कनाडा भेजे जाने से इस रोग ने चीन से बाहर पहला कदम रखा। फिर सैनिकों के लिए जो सुअरों का मांस खरीदा जाता रहा, उससे उसका प्रसार तेज हुआ। देखते ही देखते वह दुनिया भर में फैल गया। कुल मिलाकर आज तस्वीर साफ है। भले ही उस वायरस की पैदाइश अनजाने में हुई होगी पर पैदाइश तो चीन में ही हुई थी, यह अब लगभग तय है। चीन से निकला यह पहला ज्ञात वायरस था, जो आज भी किसी और देश के लिए ‘कलंक’ बना हुआ है। लिहाजा, बार-बार कलंक-कलंक की रट लगाने से पहले चीन को अपना यह अतीत भी खंगाल लेना चाहिए। मान लेना चाहिए कि यदि ‘स्पेनिश फ्लू’ कलंक है, तब भी वो उसी का कलंक है और यदि वो नियति है तब भी उसी की बदनीयती। इसलिए किसी दूसरे देश को बेवजह कलंकित क्यों किया जाए? ‘स्पेनिश फ्लू’ की त्रासदी के १० से १५ साल बाद जब दुनिया ने वायरसों और एंटी-बायोटिक के बारे में जाना, तब जाकर ‘स्पेनिश फ्लू’ को जैनेटिक नाम मिला ‘एच१-एन१’ इन्फ्लुएंजा।

कोविड-कोरोना की कहानी
आज किसी भी वायरस का जैनेटिक नाम ‘इंटरनेशनल कमिटी ऑन टैक्सोनॉमी ऑफ वायरस’ (आईसीटीवी) द्वारा रखा जाता है, जो उसकी आनुवांशिक संरचना के आधार पर होता है। जिसे नैदानिक परीक्षणों, टीकों और दवाओं के विकास को सुविधाजनक बनाने के लिए वायरोलॉजिस्ट और अन्य वैज्ञानिक समुदाय द्वारा अंजाम दिया जाता है। ‘एच१-एन१’ इन्फ्लुएंजा के बाद वर्ष २००३ में चीन में ही एक और घातक वायरस पाया गया, जिसने करीब ८,००० जानें ले लीं। तब उस वायरस का जैनेटिक नाम रखा गया ‘सिवर एक्यूट रेस्पिरेटोरी सिंड्रोम’ यानी ‘सार्स’। ‘सार्स’ के बाद आज जब वुहान में मिले ताजा वायरस का अध्ययन हुआ तो उसकी अनुवांशिकी का मेल भी ‘सार्स’ से ही हुआ। लिहाजा, वुहान वाले नए वायरस को जैनेटिक नाम मिला ‘सिवर एक्यूट रेस्पिरेटोरी सिंड्रोम कोरोना वायरस-२ यानी ‘सार्स सीओवी-२’। इस नाम में ‘कोरोना’ कैसे जुड़ा, ये भी जान लिजिए। दरअसल, जब इस वायरस पर शुरुआती अध्ययन चल रहा था और जब वैज्ञानिकों ने इसे पहली बार इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से देखा तो वो एक प्लाज्मा की तरह दिखाई दिया। गोलाकार और सतह पर प्रोटीन की स्टेंस यानी शाखाएं। ये शाखाएं हर दिशा में फैली थीं, बिलकुल सूर्य और उसकी किरणों की तरह। सूर्य के इस प्लाज्मा का लैटिन में अर्थ होता है कोरोना। इस कोरोना को ग्रहण के दौरान या कोरोनोग्राफ की मदद से देखा जा सकता है। इसी आधार पर इस वायरस को जैनेटिक नाम मिलने से पहले जो प्रारंभिक नाम मिला वो है, ‘२०१९ कोरोना वायरस’। वैज्ञानिकों की नजर में यह एक अनोखा वायरस था इसीलिए उसके नाम के आगे लग गया ‘नॉवेल’। इस तरह नाम हो गया ‘नॉवेल कोरोना वायरस’। लिहाजा, जब इस वायरस को जैनेटिक नाम देने का समय आया तो उसके नाम में कोरोना जोड़ दिया गया। अब जानिए इस वायरस से होनेवाली बीमारी का नाम ‘वुहान डिजीज’ रखने की बजाए ‘कोविड-१९’ कैसे रख दिया गया। दरअसल, एक वायरस और उससे पैâलने वाले रोग का नाम अलग होता है। जैसे ‘एचआईवी’ वायरस है और उससे होनेवाले रोग का नाम ‘एड्स’। इसी प्रकार ‘रुबेला’ वायरस है तो उससे फैलनेवाले रोग का नाम ‘खसरा’। ‘सार्स सीओवी-२’ वायरस है तो उससे फैलनेवाले रोग का नाम कथित तौर पर ‘कोविड-१९’। इस नाम की कलाकारी में अहम रोल निभाया है विश्व स्वाथ्स्य संगठन ने। कैसे और क्यों? इस पर चर्चा आगे। पहले जान लीजिए वायरस से इतर रोग को एक विशेष नाम क्यों दिया जाता है। जवाब है, ताकि उसकी गंभीरता, संक्रामकता, प्रसार, रोकथाम और उपचार के लिए टीके के प्रयास सफल दिशा में ले जाए जा सकें। यदि रोग का नाम ही नहीं रखा जाएगा तो यह जानने में परेशानी होगी कि बीमारी क्या है और उसका इलाज क्या? इसलिए रोगों को आधिकारिक तौर पर डब्ल्यूएचओ द्वारा अंतर्राष्ट्रीय वर्गीकरण (आईसीडी) में नामित किया जाता है। इसी आधार पर ‘सार्स सीओवी-२’ से होने वाले रोग का नाम पड़ा ‘कोरोना वायरस डिजिज-१९’…. संक्षिप्त में ‘कोविड-१९’। इसमें ‘को’ का मतलब ‘कोरोना, ‘वि’ का मतलब वायरस और ‘ड’ का मतलब है ‘डिजीज’, जबकि ‘१९’ वर्ष २०१९ का द्योतक है। आज चीन और डब्ल्यूएचओ की नजर में इस रोग का यही जायज नाम है तो वहीं वायरस से प्रभावित शेष दुनिया की नजर में नाजायज।

‘जायज’ और ‘नाजायज’ का सच
‘कोविड-१९’ और ‘एचआईवी-एड्स’ जैसे कुछ मामले छोड़ दिए जाएं तो अतीत के तमाम वायरसों और उससे होनेवाली बीमारियों का नामकरण भौगोलिक आधार पर ही हुआ है। वायरस का नाम, किसी स्थान विशेष से जोड़ने में आज यदि किसी को कोई अनैतिकता नजर आती है वो ‘स्पेनिश फ्लू’ के संदर्भ में भी नजर आनी चाहिए थी। क्या इस नाम से स्पेन ने एक सदी तक कलंकित महसूस नहीं किया होगा? शर्मिंदगी महसूस नहीं की होगी? ऐसे जुर्म की शर्मिंदगी, जो उसने किया ही नहीं। न जाने में, न अनजाने में। इस वर्ष के प्रारंभ तक चीन तो चीन विश्व स्वास्थ्य संगठन भी दावा ठोंकता रहा था कि वुहान में मिले ताजा वायरस का ‘ह्यूमन टू ह्यूमन ट्रांसमिशन’ नहीं होता। तकरीबन साढ़े तीन महीनों तक वायरस को लेकर दोनों की संदिग्ध भूमिका से दुनिया स्तब्ध थी। लिहाजा, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत तमाम देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने इस घातक वायरस के नाजायज वैश्विक प्रसार के लिए चीन को ही दोषी माना। इसे ‘चायनीज’ और `वुहान’ वायरस जैसे नाम दिए। अब तो वे इसे व्यंग्यात्मक लहजे में `कुंग फ्लू’ भी कहने लगे हैं। कटाक्ष के इस संबोधन को छोड़ भी दिया जाए तब भी चीन के हुवेई प्रांत की राजधानी वुहान से इसके फैलने की हकीकत को कैसे झुठलाया जा सकता है? इसलिए आज दुनिया को लगता है कि इस वायरस के ताजा नामकरण में डब्ल्यूएचओ की भूमिका संदिग्ध है। वो चीन की हर हां में हां मिलाकर उसी की बोली बोलने लगा है। दुनिया को चीन के मनमाफिक हिदायत देने लगा है। वो असल नाम और असल काम दोनों छिपा रहा है। तर्क दे रहा है कि किसी देश या क्षेत्र को कलंकित करने से बचने के लिए जानबूझकर इस नई बीमारी का नाम ‘कोरोना वायरस रोग २०१९’ यानी ‘कोविड-१९’ दिया गया है। हालांकि वो इस बात पर चुप्पी साधे है कि अतीत में उसने ऐसा कैसे होने दिया? तब उसने रचनात्मक या संरचनात्मक तथ्यों को प्राथमिकता क्यों नहीं दी? जैसी आज कोविड-१९ के संदर्भ में दी है। तब क्यों नामकरण वायरस की भौगोलिक पृष्ठभूमि पर धड़ल्ले से होते रहे? इसीलिए जब दुनिया का एक बड़ा तबका इस वायरस की उत्पत्ति के कारक व उसके उद्गम के कारण इसे ‘वुहान’ से संदर्भित करता है, ‘वुहान वायरस‘ कहकर निरुपित करता है, तो वो जायज ही लगता है। आखिर नाजायज ही क्या है इसमें? क्यों आपत्ति है चीन को इस नाम पर?

‘वुहान’ कहने पर कलंक कैसा?
आज चीन को उसकी ‘नाजायज’ पैदाइश का नाम खुद की मिट्टी से जोड़ने से परहेज है, उसे ‘वुहान’ कहने पर आपत्ति है। यदि आज इस पर उसे आपत्ति है तो फिर ‘इबोला वायरस’ के नाम पर सहमति क्यों?…, ‘जिका वायरस’ के नामकरण पर चुप्पी क्यों?… इस आधार पर तो ‘निपाह वायरस’ का नाम भी गलत ही हुआ न… नोरो वायरस, मारबर्ग वायरस, जुनिन वायरस, हार्टलैंड वायरस वगैरह… वगैरह, जैसे तमाम वायरसों समेत बोरहोम डिजीज, मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटोरी सिंड्रोम, लासा फीवर, वेस्ट नील फीवर, वैली फीवर, रिफ्ट वैली फीवर, रॉकी माउंटेन स्पोटेड फीवर जैसी तमाम डिजीज के नाम भी तो उनकी भौगोलिक पृष्ठभूमि के आधार पर ही रखे गए हैं न? फिर उनके ‘नामकरण’ पर चुप्पी क्यों? ‘वुहान वायरस’ नाम पर आपत्ति दर्ज करने से पहले चीन को इस सवाल का जवाब भी देना होगा। चीन को जान लेना चाहिए रिपब्लिक ऑफ कांगो की इबोला नदी के नाम पर ही ‘इबोला वायरस’ का नामकरण हुआ है। मलेशिया के निपाह नामक स्थान के नाम पर ‘निपाह वायरस’ की पहचान बनी है। युगांडा के जिका फॉरेस्ट से ही ‘जिका वायरस’ जाना गया। अमेरिका के नोरोवॉक के नाम पर ‘नोरो वायरस’, इसी तरह यूएस के ही सेंट हार्टलैंड के नाम पर हार्टलैंड वायरस, नाइजीरिया के लासा नाम पर ‘लासा फीवर’, डेनमार्क के बोरहोम आइलैंड पर ‘बोरहोम डिजीज’, जर्मनी के मारबर्ग पर ‘मारबर्ग वायरस’, यूएस के ओल्ड लीमी पर ‘लीमी डिजीज’, यूगांडा की नाइल नदी पर ‘वेस्ट नाइल फीवर’, यूएस की सेन जो चिन वैली पर ‘वैली फीवर’, अर्जेंटीना के जुनिन पर ‘जुनिन वायरस’, सऊदी अरब पर ‘मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटोरी सिंड्रोम’, केन्या की रिफ्ट वैली पर ‘रिफ्ट वैली फीवर’ और यूएस की रॉकी माउंटेन पर ‘रॉकी माउंटेन स्पोटेड फीवर’ जैसे नाम पड़े हैं। सूची लंबी है पर सवाल वही कि इन सभी के ‘नामकरण संस्कार’ के वक्त आखिर चीन चुप क्यों था? तब क्यों उसे यह किसी देश विशेष के लिए कलंक नहीं लगा?
चीन का तर्क है कि किसी वायरस या डिजीज के नाम में किसी देश, धर्म या समुदाय का उल्लेख होने पर वह उसके नाम पर कलंक लगाता है, उसकी बदनामी करता है तो जान लीजिए यह तर्क पूर्णत: सच नहीं है। पूर्ण सत्य तो यह है कि यदि उसकी उत्पत्ति नाजायज नहीं है तो फिर कलंक कैसा? और यदि उसकी उत्पत्ति नाजायज है तब तो कलंक भी जायज ही है। इतिहास गवाह है ‘नाजायज’ के नाम कभी ‘जायज’ नहीं होते। हां, एक बात और… कलंक किसी वायरस के नाम भर रख देने से नहीं लगता, कलंक लगता है मानव जाति को बर्बाद करने के गंदे मंसूबे पालने से, कलंक लगता है गरीब देशों को कर्ज देकर उन पर कब्जा करने की लालची नीयत से, कलंक लगता है खुद पर विश्वास करनेवाले की पीठ में चाकू मारने की धोखेबाज प्रवृत्ति से, कलंक लगता है अपनी विस्तारवादी विषैली मानसिकता पर अमल से और कलंक लगता है अपनों पर ही दमनकारी डंडे चलाने की गंदी फितरत से…। यदि यह सब कोई देश करता है तो फिर उसका कलंकित होना तय है… एक बार नहीं, बल्कि बार-बार कलंकित होना जरूरी है…! (जारी)
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