" /> मध्यांतर….ढाई घर की शतरंजी चाल में उलझी सियासत!

मध्यांतर….ढाई घर की शतरंजी चाल में उलझी सियासत!

छत्तीसगढ़ में राजनैतिक समीकरण तेजी के साथ बन-बिगड़ रहे हैं। शक्ति प्रदर्शन प्रदेश की राजधानी रायपुर से लेकर दिल्ली तक हो रहे हैं। एक तरफ टीएस बाबा हैं तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठोंकते नजर आ रहे हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में पिछले दिनों फिर उबाल आ गया, जब भूपेश बघेल को दिल्ली आलाकमान ने बुलवाया और उनके साथ ही छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टीएस बाबा को भी बुलवाया और चर्चा की।
दरअसल छत्तीसगढ़ में पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापस लौटी और चार बड़े नेताओं ने मुख्यमंत्री बनने के लिए दावेदारी की थी, जिसमें चरणदास महंत, ताम्रध्वज साहू, मोहन मरकाम और भूपेश बघेल थे।
इन सभी चारों नेताओं का अपने-अपने क्षेत्र में अच्छा खासा प्रभाव है और अघोषित रूप से इनके क्षेत्र में कांग्रेस के जीतने का एक कारण भी यही था, छत्तीसगढ़ के साहू वोटर जो बड़ी संख्या में हैं उन्हें आखिरी तक ताम्रध्वज साहू के मुख्यमंत्री बनाए जाने की उम्मीद थी तो वहीं कोरबा क्षेत्र में चरणदास महंत को। ठीक इसी प्रकार कुर्मी वोटर भूपेश बघेल को लेकर उम्मीद से था तो यही स्थिति सरगुजा में टीएस बाबा को लेकर बनी हुई थी। बकौल चरणदास महंत मुख्यमंत्री की दावेदारी में चार खिलाड़ी सेमीफाइनल में पहुंचे थे, जिसमें से फाइनल में दो पहुंचे भूपेश बघेल और टीएस बाबा।
दरअसल, टीएस बाबा और भूपेश बघेल को कांग्रेस आलाकमान ने तथाकथित तौर पर ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था। जिसके बाद उस समय कौन बनेगा मुख्यमंत्री, वाला विवाद समाप्त हो गया था? और उसके बाद टीएस बाबा सरकार में मंत्री के रूप में सम्मिलित हो गए थे।
ढाई साल वाली थ्योरी कोरी अफवाह थी, ऐसा इसलिए भी नहीं माना जा सकता क्योंकि टीएस बाबा से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जो लगातार असुरक्षा की भावना सताती रही, उससे इस थ्योरी को ही बल मिला कि दाल में जरूर कुछ काला है। आपसी खींचतान और एक-दूसरे के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन कांग्रेस में नई बात बिल्कुल नही है लेकिन उसका रूप कुछ निराले अंदाज में देखने को मिला, जब सरगुजा में कांग्रेस भवन का उद्घाटन टीएस बाबा के द्वारा हो जाने के बाद भी कांग्रेस के एक नेता अमरदीप सिंह मरकाम ने इसका दोबारा उद्घाटन किया। इस घटना से पूरे छत्तीसगढ़ में सन्नाटा छा गया था, ये किसकी शह पर हुआ ये बताने को कोई भी तैयार नहीं है लेकिन सभी जानते हैं कि टीएस बाबा के परिवार की प्रतिष्ठा छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग से लेकर मध्य प्रदेश के सत्ता के गलियारों तक मानी जाती है।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में ये कोई नई बात नहीं है आपको याद होगा, जब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ अलग नहीं हुए थे। बात अस्सी के दशक की थी, जब ठीक यही पैंतरेबाजी तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह, शुक्ल बंधुओं की राजनीति को खत्म करने के लिए इस्तेमाल करते थे। तब रायपुर में जो भी विद्याचरण शुक्ल और श्यामाचरण शुक्ल को खुले तौर पर सड़क पर आकर चुनौती देता था, उसे प्रदेश में बड़े पद से और विधानसभा के टिकिट से नवाजा जाता था। तब अजीत जोगी मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के खासमखास कलेक्टर हुआ करते थे, जिन्हें बाद में छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनाया गया। निगम मंडलों के अध्यक्ष केवल इसी एक मानदंड पर बनाए जाते थे। विडंबना ही है कि टीएस बाबा का परिवार भी अर्जुन सिंह के बेहद निकट माना जाता था, आज वही सब टीएस बाबा को देखना पड़ रहा है।
इधर, ताजा घटनाक्रम में दिल्ली से लौटने के बाद रायपुर में मुख्यमंंत्री भूपेश के लोगों ने जबरदस्त शक्ति प्रदर्शन किया, जिसकी खबर कांग्रेस आलाकमान को दी गई। जिस पर अंदरखाने की खबर है कि कांग्रेस आलाकमान ने इस घटना पर नाराजगी भी जताई। इसके ठीक बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को दिल्ली तलब किया गया, जहां मुख्यमंत्री भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के प्रभारी वेणु गोपाल से भी मिले। हद तब हो गई जब भूपेश बघेल के पीछे विधायकों और समर्थकों का हुजूम दिल्ली की एआईसीसी तक शक्ति प्रदर्शन करने पहुंच गया। अंदरखाने की छनती हुई खबरें बता रही थीं कि कांग्रेस आलाकमान इस बात से हैरान थीं कि जब पंजाब में पार्टी समस्या से दो चार हो रही है, तब ये बवंडर किस लिए? छत्तीसगढ़ के प्रदेश अध्यक्ष ने कांग्रेस आलाकमान को अपनी सफाई में बताया कि हमारी ओर से लोगों को दिल्ली नहीं भेजा गया।
इन सारी बातों से ये साफ हो गया कि ढाई साल वाली थ्योरी में दम है और यदि ऐसा है तो पिछले जून में भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बने ढाई साल पूर्ण हो गए हैं लेकिन भूपेश बघेल इस समझौते का कितना पालन करेंगे? ये दिखाई नहीं दे रहा है बल्कि दोनों ही खेमों में आर-पार की लड़ाई को लेकर सुगबुगाहट देखी जा रही है। हालांकि टीएस बाबा और भूपेश की इस लड़ाई में ढाई साल वाली थ्योरी कहां तक सच साबित होगी? ये किसी को भी नहीं पता। पर, एक बात तो तय है कि चुनावों में ७०० करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित करनेवाले टीएस बाबा के सामने अस्तित्व की लड़ाई मुंह बाए खड़ी है। उनका आत्मबल देखकर तो यही लग रहा है कि इस बार हो सकता है कि सरगुजा का दशहरा शानदार हो, लेकिन ये तो आलाकमान और उस ढाई साल की ढाई घर वाली शतरंजी बिसात पर तय होगा कि छतीसगढ़ कांग्रेस इस बिसात से वैâसे आगे निकलेगी? बस कुछ दिन और इंतजार कीजिए सवालों के जवाब जल्द ही मिलने की उम्मीद है।
(लेखक मध्यप्रदेश की राजनीतिक पत्रकारिता में गहरी पकड़ रखते हैं, मध्यप्रदेश के सामाजिक-आर्थिक विषयों पर लगातार काम करने के साथ कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेखन भी करते हैं।)
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)