" /> मेजर ओंकारनाथ ने 16 गोलियां खाकर छुड़ाए थे चीनी फौज के छक्के! 1962 में युद्ध लड़नेवाले एक मेजर की जीवंत कहानी

मेजर ओंकारनाथ ने 16 गोलियां खाकर छुड़ाए थे चीनी फौज के छक्के! 1962 में युद्ध लड़नेवाले एक मेजर की जीवंत कहानी

-भारतीय सेना थ्री-नॉट-थ्री के भरोसे लड़ रही थी युद्ध
-लद्दाख की नामकाचू नदी का पानी हो गया था लाल
-आमने-सामने से युद्ध नहीं जीत सकता है चीन

राजपूत रेजीमेंट के सेकंड लेफ्टिनेंट रहे मेजर ओंकार नाथ दुबे के जेहन में 58 साल पूर्व भारत- चीन के बीच लड़े गए युद्ध की यादें आज भी ताजा हैं। 21 साल की उम्र में इस जांबाज़ ने सीने में 16 गोलियाँ खाकर भी दुश्मन फौज के दाँत खट्टे कर दिए थे। घायल होने की वजह से उन्हें समय से पहले सेना से 1980 में रिटायर कर दिया गया। मेजर के सीने में 1962 के जख्म आज भी हरे हैं। भारत कुछ गलतियों की वजह से यह लड़ाई जीत कर भी हार गया था। उस दौर में भारतीय सेना बटालियन सिर्फ़ एक- एक एलएमजी और थ्री- नॉट- थ्री के भरोसे शत्रु फौज से लड़ती थी। गलवान की घटना पर उन्होंने दुःख जताया। धोखेबाज चीन से हमेशा सतर्क रहने को कहा।

भदोही जिले के औराई के विक्रमपुर गांव निवासी मेजर ओंकारनाथ दुबे एक गौरव हैं। वह भाजपा नेता शैलेन्द्र दुबे उर्फ टुन्ना के चाचा हैं। 1962 में भारत-चीन युद्ध में मेजर ने अहम भूमिका निभाई थी। भारत- चीन सीमा पर अरुणाचल के नामचाकू घाटी में यह युद्ध लड़ा गया था। इसे ऑपरेशन ओंकार के नाम से भी जाना जाता है। मेजर बताते हैं कि उस दौरान भारतीय सैनिकों के पास आज की तरह आधुनिक युद्धपोत, टैंक, लड़ाकू विमान, इंसास रायफल और आधुनिक संचार की सुविधा नहीँ थी। सिर्फ़ थ्री- नॉट- थ्री रायफल के भरोसे सेना युद्ध लड़ रहीं थी। लद्दाख में नामचाकू की लड़ाई सबसे भीषण थी। दोनों तरफ़ से काफी सैनिक हताहत हुए थे। नामचाकू नदी का पानी ख़ून से लाल हो गया था। यह लड़ाई 20 अक्टूबर को शुरू हुई थी।

मेजर ओंकार ने बताया कि 1962 में भारत- चीन के बीच नामकाजू घाटी में युद्ध लड़ा गया था। यह जंग 72 घंटे तक चली थी। भारतीय फौज ने चार हजार चीनी सैनिकों को ढेर कर दिया था। उन्होंने बताया कि वह ख़ुद अंत तक चीनी सेना से एक एलएमजी और थ्री- नाट- थ्री जैसे साधारण हथियार से लोहा ले रहे थे। मेजर ने बताया कि युद्ध के दौरान जब गोलियां खत्म हो गई तो 300 की संख्या में चीन की सेना के जवानों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां दाग कर घायल कर दिया और हवलदार रोशन सिंह के साथ मुझे 24 घंटे बाद बंदी बना लिया। बंदी सैनिकों की अदला बदली के बाद वह रिहा हुए थे। उस दौरान 16 गोलियां लगने से नामकाचू घाटी में घायल पड़े रहे। गोलियां दाहिने तरह लगी थी इसलिए बच गया।

मेजर ओंकाननाथ ने बताया कि 1962 के युद्ध में ना ही उनके पास समुचित हथियार थे और ना ही आज के जैसी का कुशल नेतृत्व वाली सरकार। आज जैसी स्थिति होती तो वह चीनी सैनिकों को बीजिंग और शंघाई तक खदेड़ देते। उन्होंने दावा किया कि युद्ध के दौरान रसद और गोलियां ख़त्म हो गई तो जिस जहाज से रसद और युद्ध सामन भेजा गया उसने बहोत बड़ी गलती कर दिया। उसने रसद एक तरफ़ गिरा दिया जबकि हथिया दूसरी तरफ़। जिसकी वजह से हम यह जंग हार गए। मेजर ने बताया कि चीन के साथ अरूणांचल के नामकाचू वैली की इस जंग को जेपी डालवी की पुस्तक हिमालयन ब्लंडर और रिवर आफ साइलेंस में विस्तार से जाना जा सकता है। भदोही का यह वीर सपूत 1962 के साथ 1965 और वर्ष 1971 में पाकिस्तान से हुई जंग में भी दुश्मनों के छक्के छुड़ाए थे।

भारतीय फौज को संदेश, बीजिंग पर लहराना तिरंगा
मेजर ओंकारनाथ दुबे दावा करते हैं कि 1962 में मोदी सरकार होती तो बीजिंग पर भारतीय सेना तिरंगा लहराता नजर आता। हमारे एक- एक जवान के खिलाफ़ चीन के पांच- पांच जवान होते थे। क्योंकि भारतीय सेना के शौर्य और पराक्रम से चीनी सेना डर गई थी। जिसकी वजह से पांच- पांच जवानों की संख्या के झुंड बनाकर हमला करते थे। जबकि भारतीय फौज आज भी एक पर तीन जवान का टारगेट रखती है। जबकि चीनी एक पर पांच से दस का टारगेट रखते हैं। गलवान ने चीन ने यहीं नीति अपनाई। मेजर का दावा है कि चीन की सेना आमने- सामने के युद्ध में भारतीय फौज का मुकाबला नहीँ कर सकती है। 82 वर्षीय मेजर ओंकारनाथ दुबे ने भारतीय सैनिकों को संदेश दिया है कि खून की अंतिम बूंद तक मेरी तरह गोली भलें सीने पर खाना, लेकिन बीजिंग पर भारतीय तिरंगा अवश्य लहराना। भारत और उसके सैन्य गौरव का अभिमान हमेशा ध्यान में रखना।