साइलेंट स्ट्रेटेजी!- बहनजी को अब किसी पर भरोसा नहीं

यूपी में विधानसभा की १२ सीटों पर उपचुनाव होनेवाले हैं। इसके लिए बहनजी मायावती ने पूरा जोर लगा दिया है। कल इसकी एक झलक देखने को मिली जब बहनजी ने इस उपचुनाव के मद्देनजर अपने नेताओं के साथ एक गोपनीय बैठक ली। गोपनीय इसलिए क्योंकि वहां बैठक में शामिल होनेवाले नेताओं को अपने साथ कुछ भी लाने की इजाजत नहीं थी। हालत ऐसे थे मानो अंदर से बाहर कोई सूचना न जा सके। ऐसा इसलिए क्योंकि बहनजी के साथ हाल के वक्त में उनके कई करीबी नेताओं ने उनके साथ दगा किया जिससे न सिर्फ मायावती को राजनीतिक नुकसान हुआ बल्कि उनकी छवि को भी ठेस पहुंची। इसलिए इस बार बहनजी ने साइलेंट स्ट्रेटेजी बनाई है।
कल की बैठक में बहनजी की साइलेंट स्ट्रेटेजी का नमूना देखने को मिला जब वहां बैठक में पहुंचे बसपा के नेताओं के मोबाइल फोन, बैग, पेन और चाबियां आदि बाहर ही रखवा ली गर्इं। अंदर जब बैठक खत्म हुई और नेता बाहर निकले तभी उन्हें अपने सामान वापस मिले। इससे समझा जा सकता है कि बहनजी अपनी गोपनीय रणनीति को किसी को बताना नहीं चाहती। यह तो हुई एक बात। दूसरी तरफ यहां राजनीतिक गलियारों में चलनेवाली चर्चाओं को देखा जाए तो कहानी कुछ और लगती है। चुनाव हो या बहनजी का जन्मदिन या कोई और कार्यक्रम, वहां काफी चढ़ावा चढ़ता है। यह बात सबको पता चल चुकी है। अब संभावना व्यक्त की जा रही है कि शायद चुनाव के लिए धन की व्यवस्था संबंधी कोई निर्देश दिए गए होंगे और बात लीक न हो जाए इसलिए ये साइलेंट स्ट्रेटेजी बहनजी ने बनाई।
सिर्फ भाई और भतीजा पर बहनजी को भरोसा
लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद बसपा हार पर मंथन करने और उत्तर प्रदेश विधानसभा की १२ सीटों पर उपचुनाव की रणनीति तय करने में जुट गई है। इसी को लेकर कल लखनऊ में बसपा सुप्रीमो मायावती की अगुआई में उनके आवास पर पार्टी पदाधिकारियों की अहम बैठक हुई। लेकिन बैठक में पहुंचनेवाले नेताओं से मीटिंग रूम में जाने से पहले उनकी जरूरी चीजें जमा करा ली गई। इनमें मोबाइल फोन, बैग, पेन, कार की चाबी इत्यादि शामिल थीं। यानी नेताओं को मीटिंग हॉल में कुछ भी ले जाने की अनुमति नहीं दी गई।
सूत्र बताते हैं कि उपचुनाव में मायावती ने पार्टी पदाधिकारियों के साथ लोकसभा चुनाव में अपनी हार की समीक्षा की। लोकसभा चुनाव में बसपा ने अखिलेश यादव की सपा के साथ गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था। कल मायावती ने अखिलेश के प्रति अपनी नाराजगी भी व्यक्त कर दी। दोनों पार्टियों की यूपी के वोट बैंक पर अच्छी-खासी पकड़ है। लेकिन सारे समीकरण ध्वस्त करते हुए एनडीए ने ८० सीटों में से ६४ सीटों पर जीत हासिल की, वहीं बसपा को १० और सपा को ५ सीट मिलीं। लेकिन लोकसभा चुनाव की हार को पीछे छोड़ते और सपा से अलग होते हुए मायावती अब उपचुनाव की रणनीति बनाने में जुट गई हैं। ऐसा पहली दफा होगा, जब बसपा उपचुनाव लड़ने जा रही है। तैयारियों पर खासा जोर दिया जा रहा है। इस बार बसपा और सपा दोनों ने अलग-अलग उपचुनाव लड़ने का फैसला किया है। पिछले दिनों १८ जून को मायावती ने फोन कर पार्टी पदाधिकारियों से उपचुनाव को लेकर प्रत्याशियों के बारे में बात की। माना जा रहा है कि मायावती के घर पर हुई बैठक में उपचुनाव जीतने और धन की व्यवस्था करने की स्ट्रेटेजी पर बातचीत होगी। इसके अलावा उपचुनाव की तैयारियों पर भी मायावती ने पार्टी नेताओं से फीडबैक ली।
२०१७ के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ३२५ सीटें जीती थीं। इनमें से १२ सीटों पर उपचुनाव होने हैं। उनमें ९ सीटों के भाजपा विधायक सांसद बने हैं। इसके अलावा सपा और बसपा के एक-एक विधायक को भी जनता ने सांसद बनाया है। वहीं अशोक सिंह चंदेल को सजा मिलने के बाद हमीरपुर की सीट खाली हुई है।
भाई-भतीजे को तरजीह
लोकसभा चुनावों के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी के ढांचे में बड़ा बदलाव किया है। मायावती ने अपने भाई आनंद कुमार को एक बार फिर पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है जबकि भतीजे आकाश आनंद को राष्ट्रीय समन्वयक की जिम्मेदारी दी गई है। दूसरी बार है जब मायावती ने आनंद कुमार को पार्टी में इतना बड़ा ओहदा दिया है। कुछ दिन पहले मायावती ने पार्टी उपाध्यक्ष के पद से आनंद कुमार को हटा दिया था। तब कहा गया था कि भाई भतीजावाद का आरोप लगने पर उन्होंने यह कदम उठाया था। मगर सवाल है कि यदि उन्हें भाई भतीजावाद की इतनी फिक्र होती तो फिर परिवार के लोगों को पार्टी में अहम पद के लिए क्यों चुना गया?
स्वामी-सिद्दीकी का झटका
बहनजी को हाल ही में २ बड़े झटके लगे हैं। पार्टी के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्या, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और ब्रजेश पाठक बसपा छोड़कर चले जाए। ये सभी बसपा के ऐसे नेता थे जिन पर मायावती काफी भरोसा करती थीं। सिद्दीकी ने तो मायावती द्वारा पैसे मांगे जाने का ऑडियो क्लिप वायरल करके बहनजी की काफी किरकिरी कराई। राजनीतिक गलियारों में तो इस तरह की चर्चाएं काफी पहले से होती रही हैं कि टिकट देने के बदले बहनजी करोड़ों रुपए नकद लेती हैं। सिद्दीकी के क्लिप के बाद इसे काफी बल मिला। हालांकि बाद में मायावती ने सफाई दी कि उनके कार्यकर्ता श्रद्धावश पैसे दान में देते हैं ताकि पार्टी सुचारू रूप से चल सके। स्वामी प्रसाद मौर्या एक समय मायावती के दाहिने हाथ कहे जाते थे लेकिन उन्होंने भगवा गमछा ओढ़ लिया। यही कहानी नसीमुद्दीन सिद्दीकी के साथ दोहराई गई और उन्होंने कांग्रेस का हाथ थाम लिया।
‘मायावती सुखाय, मायावती हिताय।’
दलित नेता कांसीराम की पार्टी बसपा की मौजूदा अध्यक्ष मायावती ने परिवार की पार्टी बना दी है। यह आरोप लगाते हुए दलित चिंतक एसआर दारापुरी ने कहा, ‘मायावती ने भाई आनंद कुमार को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और भतीजे आकाश आनंद को नेशनल कॉर्डिनेटर बनाया है। जिस पार्टी से कांसीराम ने अपने परिवार को दूर रखा, उस पार्टी पर अब मायावती परिवार का कब्जा हो गया है। इतना ही नहीं, पार्टी के चंदे का दुरूपयोग हो रहा है। मायावती के भाई की कंपनियों में पैसा लगाया जा रहा है।’ दारापुरी ने कहा कि कांसीराम के जमाने में बसपा का नारा था, ‘बहुजन सुखाय-बहुजन हिताय, मायावती ने पहले कांसीराम के नारे को २००७ में बदल कर ‘सर्वजन सुखाय-सर्वजन हिताय’ कर दिया। अब बसपा का नारा है, ‘मायावती सुखाय, मायावती हिताय।’