" /> भीड़तंत्र!… सुनवाई के बगैर सजा से कानून बना मजाक

भीड़तंत्र!… सुनवाई के बगैर सजा से कानून बना मजाक

निरंकुश हुजूम के नाजायज निर्णय पर रोक की जरूरत
बलि चढ़ सकते हैं निरपराध लोग

देश में भीड़तंत्र द्वारा कानून को हाथ में लेने यानी मॉब लिंचिंग के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में मुंबई से सटे पालघर जिले में देखने को मिला था। जहां दो साधुओं को निरंकुश भीड़ ने महज अफवाह के चलते पुलिस के सामने पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया था। ऐसा प्राय: गलतफहमी, अफवाह या किसी के द्वारा गुमराह किए जाने के कारण होता है। यूपी-बिहार में पशु, बच्चा चोरी या गोवंश हत्या के नाम पर बीते कुछ वर्षों में भीड़तंत्र के निरंकुश निर्णय के चलते कई लोगों को जान गंवानी पड़ी है। करीब सालभर पहले आसाम में हुई मॉब लिंचिंग के ऐसे ही एक मामले में जोरहट की सेशन कोर्ट का फैसला आ गया है। कोर्ट ने ७३ वर्षीय डॉक्टर की हत्या के लिए २५ लोगों को दोषी ठहराया है, जिनमें से एक को फांसी तथा शेष २४ लोगों को उम्रकैद की सजा मिली है।
धरती पर डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप माना जाता है। डॉक्टर अपने ज्ञान और उपलब्ध औषधियों के सहारे मरते हुए बीमार को बचाने के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं लेकिन हर बार मरीज बच ही जाए, यह जरूरी नहीं है। कई बार दुर्भाग्य से मरीज की मौत भी हो जाती है। ऐसे समय में मौत के लिए डॉक्टर को दोषी ठहराना, उन पर हमला करना गैरकानूनी तो है ही अमानवीय कृत्य भी है। ऐसा ही गैरकानूनी और अमानवीय कृत्य करीब सालभर पहले असम के जोरहट जिले में किया गया था। वहां चाय बागान में काम करनेवाले मजदूरों ने अपने बीमार साथी की मौत से आहत होकर एक ७३ वर्षीय डॉक्टर को बुरी तरह पीट दिया था, जिसके कारण डॉक्टर की मौत हो गई थी। एक ७३ वर्षीय बुजुर्ग डॉक्टर जो दूसरे बीमारों को जिंदगी देने का प्रयास करते थे, उसी को भीड़ ने मार डाला था। यह घटना २ सितंबर, २०१९ को हुई थी।
बताया जाता है कि टीओके चाय बागान में काम करनेवाला मजदूर सोमरा माझी बीमार हो गया था। उसके साथी उसे अस्पताल में इलाज के लिए लाए थे। वहां ७३ वर्षीय डॉक्टर देबेन दत्ता, सोमरा माझी का इलाज कर रहे थे लेकिन दुर्भाग्य से इलाज के दौरान सोमरा माझी की मौत हो गई थी, जिसके बाद सोमरा के साथी चाय बागानकर्मियों ने डॉक्टर देबेन दत्ता पर हमला कर दिया। हमलावर चाय बागानकर्मी डॉ. देबेन दत्ता पर लापरवाही बरतने और सोमरा को गलत दवा देने का आरोप लगा रहे थे। करीब २५० लोगों की भीड़ के हाथों डॉक्टर देबेन दत्ता असहाय अवस्था में पिटते रहे लेकिन कोई उनकी मदद को आगे नहीं आया। चाय बागानकर्मियों ने डॉ. देबेन दत्ता के अस्पताल को घेर रखा था। यहां तक की जब डॉक्टर दत्ता भीड़ के हाथों पिटने के बाद बुरी तरह घायल हो गए तब उन्हें इलाज के लिए समय पर अस्पताल भी नहीं ले जाया गया क्योंकि भीड़ ने एंबुलेंस का रास्ता रोक दिया था। काफी देर बाद पुलिस, कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से भीड़ को समझाने में सफल हुई लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जोरहट चिकित्सा महाविद्यालय और अस्पताल पहुंचने पर वहां के डॉक्टरों ने डॉ. देबेन दत्ता को मृत घोषित कर दिया था। इस घटना के बाद जब डॉक्टरों ने देशव्यापी आंदोलन छेड़ा। डॉक्टरों ने ३ सितंबर को पूरे राज्य में २४ घंटे की हड़ताल का एलान किया, तब पुलिस हरकत में आई। पुलिस ने चाय बागानकर्मियों की भीड़ के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया और ३२ लोगों को गिरफ्तार किया था। डॉ देबेन दत्ता की सामूहिक भीड़ द्वारा हत्या किए जाने के २२ दिन के भीतर १०६ पन्नों की चार्जशीट पुलिस ने दाखिल कर दी थी। इस मामले में अब सत्र न्यायालय ने संजय राजवार नामक चाय बागानकर्मी को भीड़ को उकसा कर डॉ. देबेन दत्ता की हत्या कराने के मामले में दोषी करार देते हुए मृत्युदंड की सजा दी है। जबकि संजय राजवार के उकसावे में आकर डॉक्टर देबेन दत्ता को मौत के घाट उतारनेवाले २४ अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इस मामले में कोर्ट ने ६ लोगों को बरी कर दिया है। कोर्ट का यह निर्णय कानून हाथ में लेकर खुद फैसला करनेवालों के लिए एक चेतावनी की तरह है।