पूूर्वजों की अनमोल देन हैं धरोहरें!

विश्व में मानव सभ्यता अपने चरम विकास पर है, जिसका इतिहास बेहद दिलचस्प और दुर्लभ भी है। इससे जुड़ी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक इमारतें, दुर्लभ स्मारक, प्राचीन महल, किले एवं अन्य महत्वपूर्ण स्थान यह सब हमारे अतीत की धरोहर हैं इसलिए इनका संरक्षण करना हमारा कर्तव्य है। इनके संरक्षण हेतु समस्त विश्व में जागरूकता लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने सभी देशों के साथ मिलकर वर्ष १९७२ में एक संधि बनाई जो कि समस्त विश्व की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक धरोहरों का समुचित संरक्षण करने हेतु प्रतिबद्ध है। इसके महत्व को देखते हुए और अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने हेतु प्रतिवर्ष १८ अप्रैल को ‘विश्व धरोहर’ अथवा ‘विश्व विरासत दिवस’ के रूप में समर्पित किया जाता है। पहला वैश्विक विरासत दिवस १८ अप्रैल १९८२ को ट्यूनीशिया में ‘इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ मोनुमेंट्स एंड साइट्स’ द्वारा मनाया गया। इसके अंतर्गत वैश्विक धरोहरों को ३ श्रेणियों में बांटा गया है। पहला प्राकृतिक धरोहर, दूसरा सांस्कृतिक धरोहर एवं तीसरा मिश्रित अर्थात जो प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहर दोनों हैं। संपूर्ण विश्व में कुल ९११ विश्व विरासत स्थल हैं, जिनमें ७०४ ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक और १८० प्राकृतिक और २७ मिश्रित विरासत स्थल हैं।
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरें हमारे पूर्वजों की दी हुई अनमोल एवं अनुपम देन हैं जो हमारी सभ्यता की आन-बान-शान हैं।  किसी भी राष्ट्र का इतिहास उसके वर्तमान और भविष्य की आधारशिला होती है। हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई विशाल इमारतें एवं अन्य स्थलों से हमारी ऐतिहासिक परंपरा गौरवान्वित होती है।
हमारे भारतवर्ष में भी ३२ स्थल ऐसे हैं जो संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थल की सूची में पंजीकृत है, जिनमें से २५ सांस्कृतिक एवं ७ प्राकृतिक स्थल हैं। इनमें ताजमहल-आगरा, कुतुबमीनार-दिल्ली, सूर्यमंदिर-ओडिशा, खजुराहो-छतरपुर, महाबोधि मंदिर-बौद्धगया, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान-असम, चोला मंदिर-तमिलनाडु, अजंता-एलोरा की गुफाएं-महाराष्ट्र, हिंदुस्थान की पर्वतीय रेलवे-पश्चिम बंगाल, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडू, फतेहपुर सीकरी-आगरा, ये सभी वैश्विक धरोहरों की सूची में हमारे भारतवर्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं। इनके अलावा सुंदर वन, सांची का स्तूप, हुंमायूं का मकबरा, नंदा देवी उद्यान, छत्रपती शिवाजी महाराज टर्मिनल, चंपानेर पावागढ़, लाल किला, जंतर-मंतर, नालंदा विश्वविद्यालय, कार्बुजिए की वास्तुकला, कंचनजंघा पुष्प उद्यान, भीम बैठका आदि भी विश्व विरासत में महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
हमें अपनी आनेवाली पीढ़ी के लिए इन सभी धरोहरों का संरक्षण करना होगा, जिसे हम उन्हें विरासत के रूप में सौंप सकें।  हालांकि यह भी उतना ही कटु सत्य है कि इन धरोहरों पर प्रदूषण और अतिक्रमण का खतरा मंडरा रहा है इसलिए इनके लिए अधिक संरक्षण नियम और जागरूकता की आवश्यकता है।
विश्व के सभी धरोहरों को संभालने का कार्य केवल देश ही नहीं करता बल्कि मुख्य संस्था यूनेस्को भी इन पर पूरी दृष्टि रखती है। इस कार्य में महिलाओं की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। इसका कारण है कि परिवार के संस्कार को आगे जारी रखने में मां के रूप में महिला की अहम भूमिका होती है। ऐसे ही यदि हमारी विरासतों को लेकर एक मां अपने बच्चों को जानकारी दे तो इन विरासतों को संजोए रखने में यह क्रांतिकारी कदम हो सकता है। वैसे इन सभी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों को संभालना एवं उनकी जानकारी रखना सबके लिए आवश्यक है। विदेशी सैलानी भारतवर्ष में इन्हीं धरोहरों की ओर मुख्य रूप से आकर्षित होकर हिंदुस्थान पधारते हैं। इनके द्वारा ही हमारे भारतवर्ष की अमूल्य ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं से विश्व परिचित होता है और विश्व में हिंदुस्थान की संस्कृति का परचम लहराता है। हमारी धरोहरें हमारी सभ्यता का सूचक है। हमारे पूर्वज हमारे लिए इतनी मनोरम, विशाल और अनुपम विरासत हमारे लिए छोड़ कर गए हैं जिन पर हमें गर्व है।
मौन नहीं, कुछ कहती हैं…
ये दीवारें कुछ टटोलती हैं,
ये संगमरमर की मीनारें,
ये समाधि में बैठे स्तूप,
विशाल मंडप और मंदिर,
ये धरोहरें हमारी हैं,
जो हमें अतीत से जोड़े रखती हैं…