परेल टू डोंबिवली @१० घंटे!

गत सोमवार की रात भारी बारिश के बीच ‘दोपहर का सामना’ के वरिष्ठ उपसंपादक पुष्पराज मिश्र ऑफिस से घर जाने को निकले। रात ११ बजे मध्य रेलवे के परेल स्टेशन पर उन्होंने लोकल ट्रेन पकड़ी और पूरे १० घंटे बाद अगली सुबह ९ बजे वे डोंबिवली स्थित अपने घर पहुंचे। यहां पेश है उनकी कलम से इस अनोखी यात्रा का आंखो देखा हाल …
प्रकृति के सामने पूरी दुनिया पस्त होती है, यह नजारा कल लोकल यात्रा के दौरान देखने को मिला। ऑफिस में रोज की तरह काम निपटाने के बाद विश्व कप मैच का थोड़ा आनंद लेने लगा। श्रीलंका और वेस्ट इंडीज का मैच बेहद रोमांचक दौर में था। पूरन और ऐलन बड़ी धुआंधार बैटिंग कर रहे थे। एक समय ४२ गेंद पर ८५ रन चाहिए था। ऐलन की विस्फोटक बल्लेबाजी की बदौलत मैच ३१ गेंद में ४५ पर आ गया। लगभग ११ बजे ऐलन के आउट होते ही मैं अपने सहयोगियों कमलेश सिंह और जितेंद्र मल्लाह के साथ अपने घर (डोंबिवली) के लिए ऑफिस से निकल पड़ा। कमलेश सिंह और जितेंद्र मल्लाह तो प्रभादेवी स्टेशन की ओर मुड़ गए और मैं परेल स्टेशन पर आ गया। स्टेशन पर पहुंचा तो प्लेटफॉर्म नंबर-१ पर ठाणे की ट्रेन लगी थी जबकि प्लेटफॉर्म नंबर-२ पर १०.४९ की अंबरनाथ लोकल लगी थी। यह ट्रेन परेल स्टेशन से ही बनती है। ट्रेन ३१ मिनट लेट थी। ११.२० बजे ट्रेन स्टेशन से रवाना हो गई। लगभग ३-४ मिनट में दादर स्टेशन पहुंची और थोड़ी देर वहां रुकने के बाद अगले स्टेशन की ओर बढ़ चली। लगभग ११.२६ बजे ट्रेन माटुंगा पहुंची और वहीं खड़ी हो गई। लोकल की इस असली महायात्रा की शुरुआत तो यहीं से हुई।
१०-१५ मिनट बीत जाने के बाद भी जब लोकल प्लेटफॉर्म पर ही खड़ी रही तो सभी यात्री व्याकुल होने लगे। एक के बाद एक ट्रेनों की कतार लग गई। सभी सिग्नल लाल थे। देखते ही देखते एक घंटा बीत गया बस इसी इंतजार में कि ट्रेन अब चलेगी कि तब चलेगी! प्लेटफॉर्म की कैंटीन पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था। क्षुधा पीर मुझसे भी नहीं सही जा रही थी। आखिरकार मैं भी पेट पूजा के लिए कैंटीन पर पहुंच गया। मैंने कैंटीनवाले से वड़ा-पाव मांगा। लेकिन उसने कहा कि अभी तो खत्म हो चुका है लेकिन १० मिनट बाद गरमा-गरम वड़ा-पाव मिलेगा। तकरीबन १५ मिनट बाद गरमा-गरम वड़ा-पाव पर ताव मारकर मैं अपनी सीट पर आकर बैठ गया। मेरे सीट पर बै’ते ही रेलवे की तरफ से घोषणाएं शुरू हो गर्इं कि अगली सूचना मिलने तक न तो कोई ट्रेन जाएगी और न ही आएगी। सूचना सुनते ही मैं समझ गया कि अब तो लंबा लटक गए गुरु। इतने में मेरे कार्यालयीन सचिव दत्ता हारुगडे का फोन आया, ‘कहां हो दादा?’ मैंने बताया कि ‘माटुंगा स्टेशन पर अंबरनाथ जानेवाली ट्रेन के पिछले कोच में हूं।’ दत्ता ने कहा, ‘मैं भी आपके पीछेवाली ठाणे लोकल में हूं, जो दादर और माटुंगा के बीच खड़ी है। मैं कुछ देर बाद वापस ऑफिस चला जाऊंगा।’ आधे घंटे बाद दत्ता ऑफिस चला गया। अब बैठे-बैठे मेरे मन में पत्रकारिता जाग उठी। मैं भी चाहता तो ऑफिस या फिर वडाला अपने रिश्तेदार के यहां जा सकता था लेकिन मैंने मन-ही-मन सोचा कि देखते हैं आगे क्या होता है? अब खबर के दृष्टिकोण से मैं काम पर लग गया। लोगों को क्या परेशानी हो रही है? कौन कहां से आ रहा है और कहां जाएगा? इसी क्रम में मैं आगेवाले मोटरमैन की केबिन तक पहुंच गया। मोटरमैन की केबिन बंद थी और वो अपनी केबिन से नदारद था। लोग वहीं पर खड़े होकर चर्चा कर रहे थे। कोई कह रहा था कि सिग्नल सिस्टम फेल हो गया है, तो कोई बता रहा था कि आगे पानी भरा है। मेरी पहचानवाले आगे की ट्रेनों में फंसे हैं। वे ट्रेनें भी वहीं खड़ी हैं। उस सबके बीच एक हल्की-सी दाढ़ीवाला आदमी भी खड़ा था, जो बहुत ही तार्किक जवाब दे रहा था। वो दूसरा कोई और नहीं बल्कि मोटरमैन ही था, ये बात मुझे बाद में पता चली। मैं पुन: पीछे आया और अपनी कोच में आकर बैठा ही था कि ‘नवभारत टाइम्स’ के राजनीतिक संपादक अभिमन्यु शितोले जी का मैसेज आया कि ‘पुष्पराज, छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस से ‘ठाणे की सभी सर्विस रद्द कर दी गई है।’ अब मैं निश्चिंत हो गया कि सफर में कई घंटे लगनेवाले हैं। इतने में मेरी बगल में एक बहुत ही सज्जन यात्री आकर बै’े और उन्होंने मुझसे पूछा, ‘भाई साहब, कब से ट्रेन खड़ी है?’ मैंने उन्हें बताया, ‘तकरीबन २ घंटे हो गए।’ वे सज्जन अयोध्या के रहनेवाले थे और उन्हें विक्रोली जाना था। भूलेश्वर में कहीं धंधा लगाते हैं। दूसरे यात्री थे जो वडाला के हरियाली बार में ड्यूटी करते हैं। उन्हें भी कोपर जाना था। फिर चर्चाएं शुरू हो गर्इं और टाइम पास किया जाने लगा। थोड़ी दूर पर एक माताजी बहुत परेशान थीं। हमने उनसे पूछा, ‘कहां जाना है?’ बोली, ‘बेटा, मुलुंड जाना है। घरवाले परेशान होंगे।’ मैंने कहा, ‘फोन कर दो।’ उन्होंने कहा, ‘मेरे पास फोन नहीं है।’ मैंने कहा, ‘मेरे मोबाइल से फोन कर लो।’ माताजी ने कहा, ‘उन्हें नंबर याद नहीं है।’
थोड़ी देर बाद सभी यात्री एक-एक सीट पर सो गए। रात्रि के ३ बजे के करीब एक ट्रेन सीएसएमटी जाने के लिए आई। मैंने उस ट्रेन के यात्रियों से पूछा तो उन्होंने बताया कि घाटकोपर से सायन तक बहुत पानी भरा है। सवा २ घंटे के इंतजार के बाद करीब ५ बजकर १५ मिनट पर ट्रेन माटुंगा से छूटी और सायन स्टेशन से करीब २०० मीटर की दूरी पर जाकर खड़ी हो गई। ट्रेन के नीचे लगभग ६ इंच पानी रहा होगा। ट्रेन यहां करीब १ घंटे ४० मिनट तक खड़ी रही। कुछ यात्री कोसने लगे कि माटुंगा प्लेटफॉर्म पर ट्रेन खड़ी थी तो अच्छा था। सामने की पटरियों पर दो मेल ट्रेनें भी खड़ी थीं। उनमें से एक ट्रेन थी जो लगभग ४.१५ बजे माटुंगा से गुजरी थी। फिर ट्रेन चली और सायन स्टेशन पहुंची। पटरी पर २ से ढाई फुट पानी था। स्टेशन पर करीब ५ मिनट रुकने के बाद ट्रेन चली तो मानो ऐसा लगा जैसे पानी में कोई बोट चल रही हो। पानी के अंदर डूबी पटरियों का पता नहीं लगा रहा था। चारों ओर सिर्फ पानी ही पानी दिखाई दे रहा था। ३ से ४ फुट पानी चारों ओर दिखाई दे रहा था। ७ बजकर ४५ बजे ट्रेन कुर्ला स्टेशन पहुंची। वहां स्टेशन पर तो पानी नहीं था लेकिन जैसे ही ट्रेन आगे बढ़ी तो सायन से भी ज्यादा पानी ट्रैक पर था। ट्रेन ५ मिनट चलती और रुक जाती। ट्रेन के पास बनी बिल्डिंगों से लोग किसी अजूबे की तरह ट्रेन को पानी पर तैरते हुए देख रहे थे। सबसे भयानक स्थिति तो सांताक्रुज-चेंबूर लिंक रोड के ब्रिज के नीचे की थी। यहां नाले का पानी काफी तेज बहाव से ट्रैक पर आ रहा था, जबकि वह नाला ट्रैक का पानी खींचने के लिए बनाया गया था। धीरे-धीरे ट्रेन लगभग ८.२० बजे विद्याविहार स्टेशन पहुंची। ट्रेन के वहां पहुंचते ही यात्रियों ने राहत की सांस ली क्योंकि यात्रियों को पता था कि आगे ट्रैक पर बिल्कुल भी पानी नहीं है। विद्याविहार से छूटने के बाद लोकल ने अपनी रफ्तार पकड़ ली। घाटकोपर पहुंचते ही ट्रेन एकदम से पैक हो गई। भीड़ इसलिए भी थी कि जो लोग साउथ मुंबई में फंसे थे वे पश्चिम रेलवे से अंधेरी और अंधेरी से मेट्रो पकड़कर घाटकोपर पहुंचे थे। ट्रेन लगभग ८.४५ बजे ‘ाणे पहुंची। यहां पहुंचते ही ट्रेन को कैंसिल कर यार्ड में भेज दिया गया। अब २ नंबर प्लेटफॉर्म से मैं तीन नंबर प्लेटफॉर्म पर पहुंचा। वहां बदलापुर की ट्रेन लगी थी। उसे पकड़कर ही मैं ९ बजकर २० मिनट पर डोंबिवली पहुंचा। इस दौरान रेलवे की तरफ से न तो कोई व्यवस्था की गई थी और न ही कोई ये पूछनेवाला था कि यात्रियों का क्या हाल है?
बारिश आए, जी घबराए
लाइफ लाइन की इस लाइव कहानी में कई तथ्य चौंकानेवाले सामने आए। एक तो रेल प्रशासन की तरफ से न तो कोई पूछनेवाला था और जिस तरह पुलिसिया बंदोबस्त होना चाहिए था, वो नहीं था। माटुंगा स्टेशन पर रात १२ बजे के बाद हर आधे घंटे में मूसलाधार बारिश हो रही थी। बारिश के तेज होते ही यात्रियों के माथे पर बल पड़ जाते कि अब यहीं अटके रहेंगे। सवेरा होते ही कुछ लोग तो ट्रेन से उतरकर ट्रैक पर पैदल ही अपने गंतव्य की ओर बढ़ चले। कुल मिलाकर कहा जाए तो यात्रियों का हाल बुरा था।