कभी-कभी : मुफलिसी में हुआ अंत…!

फिल्मी पर्दे पर चमकने की ललक भला किसे नहीं होती। हर इंसान चाहता है कि अपने जीवन में एक बार ही सही वो फिल्मी पर्दे पर जरूर चमके। अब ये अलग बात है कि किसी को बिन मांगे मौका मिल जाता है तो कोई इसके लिए सारी जिंदगी एड़ियां घिसता रह जाता है। ऐसे ही एक छोटे कद के कलाकार थे नत्थू रामटेके उर्फ नत्थू दादा, जिन्हें तकदीर ने फिल्मी पर्दे पर चमकने का मौका दे दिया।
भिलाई में एक ‘प्रâी स्टाइल कुश्ती’ प्रतियोगिता का आयोजन १९६९ में हुआ, जिसमें दारा सिंह ने भाग लिया था। अपने एक दोस्त के कहने पर नत्थू दादा भी दारा सिंह की कुश्ती देखने स्टेडियम में पहुंच गए। स्टेडियम दर्शकों से खचाखच भरा था। हजारों की भीड़ वहां इकट्ठी थी। वहां इकट्ठी भीड़ को देखकर नत्थू दादा के तो पसीने छूट गए। कद में छोटा होने के कारण दारा सिंह को कुश्ती लड़ते हुए देख पाना उनके लिए मुमकिन नहीं था। अपने मन में दारा सिंह को देखने की ललक लिए आखिरकार वे किसी तरह अखाड़े के पास जहां कुश्ती हो रही थी, वहां पहुंच गए। कुश्ती भी अपनी समाप्ति की ओर थी। थोड़ी देर बाद ‘रुस्तम-ए-हिंद’ दारा सिंह ने अपने प्रतिद्वंद्वी पहलवान को हरा दिया। प्रतिद्वंद्वी पहलवान को हराने के बाद दारा सिंह अखाड़े के चारों तरफ घूम-घूमकर अपने प्रशंसकों से हाथ मिलाने लगे। तभी उनकी नजर अपने सबसे छोटे प्रशंसक यानी नत्थू दादा पर पड़ी। दो फीट के नत्थू दादा को दारा सिंह ने अपने एक हाथ में उठा लिया और दूसरे हाथ को हिला-हिलाकर वे दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करने लगे। दारा सिंह के हाथों में लटके नत्थू दादा की जान हलक में अटकी हुई थी। वे मन-ही-मन सोच रहे थे कि कहीं दारा सिंह उन्हें हवा में न उछाल दें। खैर, दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करने के बाद तो मानों चमत्कार ही हो गया। दारा सिंह ने नत्थू दादा को गले लगाते हुए पूछा, ‘फिल्मों में काम करोगे?’ अंधा क्या चाहता है, दो आंखें ही न। नत्थू दादा ने ‘हां’ की मुद्रा में अपना सिर हिला दिया। दारा सिंह के साथ ही नत्थू दादा भी मुंबई आ गए। दो दिनों बाद दारा सिंह ने उनकी मुलाकात ‘शो मैन’ राज कपूर से करवाई। उन दिनों राज कपूर फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ की प्लानिंग कर रहे थे। नत्थू दादा को देखकर राज कपूर बेहद खुश हुए क्योंकि उन्हें एक बौने कलाकार की जरूरत थी। ‘मेरा नाम जोकर’ ने उनके लिए फिल्म इंडस्ट्री के दरवाजे खोल दिए। इस फिल्म में उन्होंने जोकर की भूमिका निभाई। २९ मई, १९५० को जन्मे नत्थू दादा ने अपने २० साल के फिल्मी करियर में एक-दो नहीं, बल्कि डेढ़ सौ फिल्मों में काम किया। दारा सिंह, राज कपूर, अमिताभ बच्चन, राज कुमार, धर्मेंद्र, प्राणनाथ, अमजद खान, डैनी, फिरोज खान जैसे सितारों के साथ ‘शक्ति’, ‘राम बलराम’, ‘कसमें वादे’, ‘खोटे सिक्के’ सहित अनगिनत फिल्मों में काम करनेवाले नत्थू दादा की अंतिम फिल्म ‘धर्मकांटा’ थी। फिल्म ‘धर्मकांटा’ की शूटिंग के दौरान हुए हादसे में उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई। इसके बाद वे राजनांदगांव से आठ किलोमीटर दूर स्थित अपने गांव रामपुर चले गए। फिल्मी दुनिया से नाता टूटने के बाद उनका पूरा जीवन मुफलिसी में बीत गया। अपने पांच बच्चों के साथ रामपुर में खपरैल के मकान में रहते हुए अंतिम समय तक वे गरीबी और आर्थिक तंगी से जूझते रहे। बढ़ती उम्र और अपने खराब स्वास्थ्य के चलते उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया और अंतत: पिछले दिनों २८ दिसंबर, २०१९ को ७० वर्ष की उम्र में नत्थू दादा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। गुमनामी भरा जीवन बिताने को मजबूर और जिंदगी के हर रंग को करीब से देखनेवाले नत्थू दादा को हमारा आखिरी सलाम!