" /> प्रचंड राजनीति पर ‘जूता’!

प्रचंड राजनीति पर ‘जूता’!

नेपाल की राजशाही का समूल नाश करने की कसम खाकर सशस्त्र आंदोलन में उतरे माओवादी नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने भी अपनी पहली पारी में वही किया, जो तब तक स्वार्थवश नेपाल के तमाम राजा करते आए थे। चीन की चाटुकारिता। नेपाल के पूर्ण प्रजातंत्र बनने के बाद नेपाल का पहला प्रधानमंत्री भी उसी पुरानी नीति पर चल रहा था, हिंदुस्थान विरोधी कट्टर रुख अपनाए हुए था। फिर इस प्रजातंत्र का दृष्टिकोण और संघर्ष राजतंत्र से अलग वैâसे हुआ? फिर राजा ज्ञानेंद्र और राजशाही को लेकर प्रचंड के मन में प्रचंड कड़वाहट क्यों थी? सवाल कायम थे। यहां हिंदुस्थानी अमले में भी तब तक प्रचंड को कुटिल करनी की वजह से संदेह की निगाहों से देखा जाने लगा था।

२००८ में नेपाल के संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र घोषित होते ही पहले प्रधानमंत्री बनने का सौभाग्य माओवादी नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ को मिला था। हालांकि मात्र ९ महीनों के भीतर ही उन्हें पदत्याग करना पड़ा। प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने सेनाध्यक्ष के निष्कासन को लेकर राष्ट्रपति से मतभेद पैदा कर लिए। उस पर सेना में माओवादियों की नियुक्ति की खबरों ने आग में घी डालने का काम किया। अलबत्ता, सहयोगियों ने समर्थन वापस ले लिया और प्रचंड को इस्तीफा देना पड़ा। उस इस्तीफे के तकरीबन ८ साल बाद २०१६ में प्रचंड की किस्मत ने एक बार फिर पलटी मारी और उन्हें नेपाल के ३९वें प्रधानमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल नसीब हुआ।
अब २०१६ में प्रचंड के नेतृत्व में उनकी पार्टी सीपीएन (माओवादी केंद्र) और नेपाली कांग्रेस के सहयोग से सरकार बनी थी। निवर्तमान प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को सत्ता से बेदखल करने के बाद मधेसी प्रâंट ने भी प्रचंड सरकार को समर्थन दिया था। हालांकि, तब भी इसे लेकर शंकाएं ही थीं कि क्या प्रचंड अपनी पुरानी गलतियों से सबक लेंगे? नेपाल की तराई में आकर बसे हिंदुस्थानी मूल के लोगों की चिंताओं का खयाल रख पाएंगे? हिंदुस्थान के साथ बिगड़ते रिश्ते सुधार पाएंगे? और सबसे अहम यह कि क्या वे चीन की गोद से उतर पाएंगे?
भारतवंशियों को थीं ‘प्रचंड’ उम्मीदें
अपने पहले कार्यकाल में २००८-२००९ के दौरान प्रधानमंत्री प्रचंड का हिंदुस्थान के साथ रवैया अच्छा नहीं था, लिहाजा दोनों देशों के राजनीतिक और कूटनीतिक संबंधों में गिरावट आई थी। प्रचंड ने नेपाल की प्रजातांत्रिक सत्ता का रुख चीन की ओर मोड़ दिया था। वे नेपाल की नीति बनाने से पहले चीन का हित देखा करते थे। दोनों देशों की साम्यवादी विचारधाराओं के साम्य की वजह से उन्होंने हिंदुस्थान को हमेशा नजरअंदाज किया। उन्होंने खुद को उसी तरह राष्ट्रवादी घोषित करने का प्रयास किया जिस तरह आज २०२० में प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली कर रहे हैं। बावजूद इसके महज ९ महीनों में ही उनके हाथ से सत्ता छिन गई थी। शायद तब उन्हें अपनी गलतियों का एहसास हुआ हो। इसीलिए जब उन्होंने नेपाली कांग्रेस से पावर शेयिंरग डील करके देश के ३९वें प्रधानमंत्री के रूप में पदभार संभाला तो अपनी नीतियों में सुधार लाने का वादा किया था। माना भी जा रहा था कि वे नेपाल के राजनीतिक दलों के साथ-साथ हिंदुस्थान के साथ भी बिलकुल नए तरीके से बर्ताव करेंगे। देश को राजनैतिक स्थिरता देने का प्रयास करेंगे। नेपाल के गणतंत्र में बदलने के बाद से राजनीतिक अस्थिरता का लंबा दौर चला था। देश तब ८ सालों में ८वें प्र्रधानमंत्री के तौर पर प्रचंड को देख रहा था। ओली भी मात्र ९ महीनों की सत्ता का ही उपभोग कर पाए थे। हां, तब प्रचंड जरूर ऐसे इकलौते कम्युनिस्ट नेता थे, जो नए प्र्रजातंत्र में दोबारा प्रधानमंत्री बने थे। नेपाली कांग्रेस और मधेसी संगठनों के समर्थन से। नेपाल के तराई इलाकों में रहनेवाले इन्हीं भारतवंशी मधेसियों को प्र्रचंड से ‘प्रचंड’ उम्मीदें थीं, संविधान में उन्हें अपेक्षित अहमियत दिलवाने की।
चीन की ‘प्रचंड’ फटकार
२०१६ में प्रचंड के दोबारा प्रधानमंत्री बनने से पहले देश की कमान ओली के हाथ थी, जिन्होंने सत्ता में रहते हिंदुस्थान के साथ संबंधों को काफी तल्ख कर दिया था। उन्होंने राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी की हिंदुस्थान यात्रा स्थगित की, हिंदुस्थान में नेपाल के राजदूत दीप कुमार उपाध्याय को हिंदुस्थान-समर्थक कहकर वापस बुला लिया और चीन के साथ एक विवादास्पद समझौता भी कर लिया। उस पर उन्होंने हिंदुस्थान पर उनकी सरकार गिराने और प्रचंड का समर्थन करने का आरोप भी लगा दिया था। उन्हीं प्रचंड के समर्थन का आरोप जो एक वर्ष पहले तक, २०१५ में नेपाल में आए भूकंप के बाद हिंदुस्थानी प्रयासों की आलोचना कर रहे थे और हास्यास्पद ढंग से उसे नेपाल की सुरक्षा-व्यवस्था को बढ़ता खतरा बता रहे हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह कल-परसों में ओली ने नेपाल में कोरोना के प्रसार के लिए हिंदुस्थान पर उटपटांग आरोप लगाए थे। खैर, प्रचंड हों या ओली, दोनों के ही पहले कार्यकाल में नेपाल-हिंदुस्थान के बीच कटुता पैदा हुई थी। इसीलिए जब प्रचंड के हाथ दोबारा कमान आई तो उनके पास इन संबंधों को संतुलित करने का मौका था। परंतु चीन की पैनी नजर के रहते ऐसा करना उनके लिए संभव तो बिल्कुल ही नहीं था। उस पर दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने पर प्रचंड ने पहले विदेश दौरे के लिए चीन की बजाय हिंदुस्थान को चुना तो चीन को बात चुभ गई। तब उसने यह कहकर कि नेपाल-चीन के रिश्‍ते प्रचंड की वजह से सबसे निचले स्‍तर पर चले गए हैं, जिनकी वजह से कई चाइनीज प्रोजेक्‍ट्स का काम रुका पड़ा है और इसका कारण है प्रचंड की हिंदुस्थान समर्थित नीतियां; प्रचंड पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। चीन ने तब नेपाल के प्रधानमंत्री को फटकार लगाते हुए यहां तक चेतावनी दे दी थी कि चीन को नेपाल-हिंदुस्थान की करीबी से काफी नफरत है।
चीन की चिंता का कारण
दरअसल, ओली के कार्यकाल में चीन ने तिब्‍बत के रास्‍ते रेल और हाइवे लिंक की योजना बनाई थी। चीन, नेपाल में हिंदुस्थान का प्रभाव सीमित करके अपना वर्चस्व बढ़ाने के लिए इन प्रोजेक्‍ट्स को जल्द-से-जल्द पूरा करना चाहता था, ताकि नेपाल की हिंदुस्थान पर निर्भरता लगभग खत्म हो जाए। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग चीन-नेपाल रेल लिंक जैसे चीनी प्रोजेक्‍ट्स में कोई तरक्‍की न होने से नेपाल से काफी नाराज थे। लिहाजा, चीन ने खुलकर कहना शुरू कर दिया था कि पिछले कुछ समय से प्रधानमंत्री प्रचंड और कम्‍यूनिस्‍ट पार्टी ऑफ नेपाल के चेयरमैन, चीन के लिए दोस्‍ताना रवैया रखते थे, लेकिन दूसरी बार पीएम बनते ही उन्‍होंने हिंदुस्थान का दौरा किया और हिंदुस्थान के राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी का नेपाल में स्‍वागत किया। चीन ने तब साफ कहा था कि प्रचंड की हिंदुस्थान समर्थित नीतियों की वजह से चीन-नेपाल के रिश्‍ते काफी कमजोर हो गए हैं। अपनी इस नाराजगी को और पुख्ता करने के लिए तब जिनपिंग ने दक्षिण एशिया का दौरा किया पर वे नेपाल नहीं गए। क्योंकि ओली के कार्यकाल में चीन के साथ हुई डील्स प्रचंड के समय आगे नहीं बढ़ पाई थीं। यहां नेपाल में भी यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि प्रचंड अब हिंदुस्थान के करीबी हैं। उनकी पार्टी के भीतर भी उन पर हिंदुस्थान के साथ साठ-गांठ करने के आरोपों को हवा दी गई। हालांकि प्रचंड का दावा था कि उन्होंने अपने ‘दूसरे’ ९ महीनों के कार्यकाल में संतुलित विदेश नीति का अनुसरण कर पड़ोसियों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने व विश्वास बहाली में सफलता हासिल की थी।
अब ‘प्रचंड’
संयम की जरूरत
आज प्रचंड अपनी खोई हुई करिश्माई पहचान को दोबारा पाने के लिए ‘प्रचंड’ बेचैन हैं। लिहाजा, अब फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। वैसे भी फिलहाल चीन का दांव ओली पर लगा है। इसीलिए शायद वे उपयुक्त समय का इंतजार कर रहे हों, संयम बरत रहे हों। २०१८ आते-आते, प्रचंड का एक बदला हुआ व्यक्तित्व नजर आया था। शायद सत्ताधारी पार्टी के सह-अध्यक्ष के रूप में उन्होंने सुनिश्चित किया हो कि वे हिंदुस्थान को भी प्राथमिकता में रखेंगे। शायद वे समझ गए हों कि नेपाल के लिए चीन से ज्यादा हिंदुस्थान का महत्व है। इसलिए आज जब प्रधानमंत्री ओली हिंदुस्थान विरोधी बयान देते हैं तो प्रचंड मुखरता से विरोध भी करते हैं। ओली, एक के बाद एक हिंदुस्थान विरोधी धमाकों से अपने आका को खुश करने की कोशिश कर राजनैतिक अपरिपक्वता दर्शाते हैं तो प्रचंड एक परिपक्व राजनेता होने के संकेत देते हैं। शायद वे प्रतिस्पर्धी लोकतांत्रिक राजनीति को अब बेहतर समझते हैं। तभी तो ओली के हिंदुस्थान विरोधी बयान पर वे कहते हैं कि ‘न तो यह राजनीतिक रूप से सही हैं और न ही कूटनीतिक तौर पर उचित’। २०१६ में नेपाली कांग्रेस से हुई सत्ता की डील के मुताबिक पदत्याग करते वक्त उन्होंने कहा था कि नेपाल की राजनीति में भरोसे का अभाव है और मैं नैतिकता के इस सूखेपन को तोड़ना चाहता हूं। उनकी इस घोषणा की पहली पंक्ति शत-प्रतिशत सच भी हो तब भी दूसरी पंक्ति पर लोगों का भरोसा नहीं बैठता, क्योंकि जिन मधेसियों के साथ समझौता करके वे सत्ता में आए थे, उन्हीं को बाद में उन्होंने भुला दिया। जिस तरह कभी हिंदुस्थान को भुलाया था।
दरअसल, नेपाल को समाजवादी-साम्यवादी गणतंत्र में बदलने की उनकी राजशाही के खिलाफ १० साल की खूनी लड़ाई निरर्थक ही है। आज नेपाल से राजशाही उखाड़ फेंकने वाले सत्ताधारी पार्टी के सह-अध्यक्ष प्रचंड के ऊपर यदि कोई युवक सार्वजनिक समारोह के दौरान जूता फेंकता है तो साफ हो जाता है कि प्रचंड विरोधी खेमा जनता के मन में प्रचंड के खिलाफ प्रचंड नफरत भरने में कामयाब हो चुका है। जिसके लिए प्रचंड का खुद का डावांडोल रवैया भी काफी हद तक जिम्मेदार है।
अगला भाग- ओली की अड़चन!