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मुंबई ‘मिस्ट्री’

मुंबई, महामारी और मौत, ‘रात का चोर’ बॉम्बे फ्लू!, नष्ट कर दी भारत की पांच फीसदी आबादी

१८९६ का प्लेग १८१९ के हैजे के बाद मुंबई के इतिहास की सबसे बड़ी विभी‌षिका थी। हालांकि बीच-बीच में चेचक, हैजा, एंथ्रेक्स, सार्स, स्वाइन फ्लू और डेंग्यू भी अपना जोर‌ दिखलाते रहे। इनमें सबसे हौलनाक था बीती सदी में १९९४ का प्लेग। प्लेग ने जब सूरत में तबाही मचाई तो नाक पर कपड़े बांधे लोग मुंबई की भी सड़कों, बसों और लोकल ट्रेनों में दिखने लगे। पर विनाश के लिहाज से इन सबमें १९१८ के ‘बॉम्बे फ्लू’ (स्पेनिश फ्लू) का कोई मुकाबला नहीं था। आज के कोरोना का भी, जो एक वायरस के रूप में धमकी इस वैश्विक महामारी के करीब सौ साल बाद आया है। बॉम्बे फ्लू कितना घातक था? इसका अंदाज आप इस बात से लगाइए कि तब अकेले भारत में उससे १.७० करोड़ से लेकर दो करोड़ लोगों के मारे जाने के अनुमान लगे थे, जो देश की तब की पांच फीसदी जनसंख्या के बराबर थे। पूरे विश्वभर में ५० करोड़ से ज्यादा लोग संक्रमित हुए थे, जिनमें करीब ५ से १० करोड़ लोग जान गंवा बैठे। यह संख्या उसी दौरान हुए प्रथम विश्वयुद्ध में मारे गए सैनिकों व नागरिकों की कुल संख्या से भी ज्यादा थी।
मुंबई आने से पहले स्पेनिश फ्लू अन्य देशों में पैâल चुका था। उस वक्त मुंबई के हेल्थ ऑफिसर रहे जे. ए. टर्नर ने जो लिखा है ‘यह रोग रात में चोर की तरह घुस आया’ बिलकुल सही है। दरअसल, इस बीमारी को मुंबई में और फिर मुंबई से दूसरी जगह पैâलाने का कारण एक जहाज था, जो विश्व युद्ध लड़ रहे भारतीय सैनिकों को लेकर २९ मई, १९१८ को मुंबई बंदरगाह पर पहुंचा था। यह जहाज व्यस्त होने के कारण बंदरगाह पर ही करीब ४८ घंटे फंसा रहा और संक्रमण फैलाता रहा। महामारी का पहला लक्षण दिखा १० जून को, जब बंदरगाह पर तैनात पुलिस वालों में से सात पुलिस वालों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। अब बारी आई मुंबई पोर्ट ट्रस्ट, हॉन्गकॉन्ग और शंघाई बैंक, टेलिग्राफ ऑफिस, करेंसी प्रेस और राशेल ससून मिल में काम करने वाले कामगारों की। २४ जून से बच्चों और बूढ़ों को दबोचते हुए इसने जोर पकड़ना शुरू किया और जुलाई तक अपने दूसरे चरण में सितंबर में तो भयानक हो गया। इस दौरान इसके ज्यादातर शिकार प्लेग की ही तरह मजदूर वर्ग और २०-४० आयु वय के लोग हुए। दिसंबर, १९१८-जनवरी-१९१९ में तीसरा चरण में यह सर्वग्रासी और प्रलयंकर बन गया। ट्रेनों के जरिए बीमारी दूसरे जगहों तक पैâल गई। गांवों से ज्यादा असर शहरों में था और मरने वालों में पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक थीं। भारत में हालात इसलिए और खराब हुए, क्योंकि इसी समय यहां अकाल पड़ा था, जिससे लोगों की रोगप्रतिरोधक क्षमता कम हो चुकी थी। तब तक रामबाण मानी जाने वाली पेनिसिलिन और एंटीबायोटिक दवाओं की खोज भी नहीं हो पाई थी। कोढ़ पर खाज यह कि इलाज करने के लिए तब देश में डॉक्टर भी नहीं थे। तमाम डॉक्टर सेना के साथ घायल सैनिकों के इलाज के लिए मोर्चे पर चले गए थे।
गांधी जी और मुंशी प्रेमचंद भी बीमार हुए
आज के कोरोना की तरह बॉम्बे फ्लू ने आम और खास-किसी को नहीं बख्शा। महात्मा गांधी की पुत्रवधू गुलाब और पोते शांति की मृत्यु तो इस महामारी से हुई ही, साबरमती आश्रम में स्वयं गांधी जी भी बीमार पड़ गए। विख्यात उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद इस बीमारी से संक्रमित हुए और विख्यात कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने भतीजे और अन्य परिजनों के साथ पत्नी मनोहरा देवी को भी हमेशा के लिए खो दिया। यह महामारी तब अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दादा को भी निगल गई। जान एम. बेरी ने ऊप उर्rीू घ्हfत्लर्हैa: ऊप Eज्ग्म् एूदrब् ध्f ऊप र्Dी्त्गेू झ्त्aुल घ्ह प्ग्ेूदrब् में भारत में इस महामारी के पैâलाव के बारे में लिखा है, ‘ट्रेन में सवार होते समय तो लोग अच्छे-भले होते थे, पर गंतव्य पहुंचते-पहुंचते मरणासन्न हो जाते थे।’ मुंबई में ६ अक्टूबर, १९१८ के एक ही दिन ७६८ लोग मारे गए। गंगा सहित देश की सारी नदियां लाशों से भर गई थीं। महामारी का पहला नजला टूटता था साफ-सफाई और शवों के दाह संस्कार में लगे लोगों पर। मौत बहुत ही कष्टजनक और भयानक होती थी। बुखार के साथ हड्डियों, आंख और विभिन्न अंगों सहित पूरे शरीर में भयानक दर्द होता था। सबसे ज्यादा असर मरीज के फेफड़ों पर पड़ता था। उसे असहनीय खांसी हो जाती थी और नाक व कान से खून बहने लगता था। बॉम्बे फ्लू का असर कम करने के लिए अंग्रेजों ने उस वक्त भी आज के कोरोना काल जैसे सेल्फ क्वॉरंटीन और बाहर निकलने पर रोक जैसे कई उपाय किए, पर सब निष्फल। इस सक्रांति काल के असली नायक थे गांधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल और जमीन से जुड़े स्थानीय और सामाजिक जातीय संगठन, जिन्होंने राहत कार्यों का सूत्र संभाला। असम में बने बीमारी के टीके ने बॉम्बे फ्लू के खात्मे की राह उजली की, ‌फिर भी उसने भारत से विदा लेने में मार्च, १९२० तक का समय ले लिया। बाकी दुनिया में यह जाकर खत्म हुआ दिसंबर में।
तब भी चीनी ही जिम्मेदार
‘जर्मन फ्लू’, ‘ब्राजीलियन फ्लूू’, ‘बोल्शेविक डिसीज’ नामक कई नामों से पुकारी जाने वाली यह महामारी दरअसल, ‘स्पेनिश फ्लू’ या स्पेन में उपजी बीमारी नहीं थी। दरअसल, यह उससे भी पहले अमेरिका, प्रâांस और ब्रिटेन में पहले पैâली थी, पर वहां की सरकारों ने इसकी खबरों को सेंसर करके छिपा लिया। प्रथम विश्वयुद्ध उन दिनों चरम पर था और उन्हें लगता था कि अगर परिजनों के इससे प्रभावित करने की खबरें मोर्चे पर तैनात सैनिकों ने सुनीं तो युद्ध के लिए उनका मनोबल गिर जाएगा। चूंकि स्पेन में इस तरह का सेंसर नहीं था और उसी ने सबसे पहले इस बीमारी के अस्तित्व को स्वीकार किया था, इसीलिए इसने ‘स्पेनिश फ्लू’ का नाम ले लिया। भारत में चूंकि यह मुंबई के रास्ते दूसरी जगह फैली, इसलिए ‘बॉम्बे फ्लू’, ‘बॉम्बे फीवर’ और ‘बाम्बे इन्फ्लूएंजा’ कहलाने लगी। संयोग की बात कि इसके लिए भी आज के कोरोना की ही तरह चीनियों और खरीदे गए दूषित मांस (खासकर सूअर के) को भी जिम्मेदार ठहराया गया। कहते हैं, तब एक दरवाजा-बंद गाड़ी में चीनी मजदूरों को कनाडा भेजे जाने के कारण यह रोग पैâला था।